देश में बढ़ रही हैं गृहणियों की आत्महत्याएं

कहा जाता है कि घर को गृहणियां ही संवारती है लेकिन आंकड़े बेचैन करते हैं. इंडियास्पेंड ने एक तहकीकात की जिससे यह निकल कर आया कि 2018 में रोज़ाना औसतन 63 गृहणियों ने आत्महत्या की थी, यह कुल आत्महत्याओं का 17.1% था. 2001 से, हर साल 20,000 से अधिक गृहणियों ने आत्महत्या की है. यह देश के सामाजिक ताने-बाने को झंकझोंरने वाला है.

| कपिल काजल

गंभीर समचार 04 May 2020

शिवानी (बदला हुआ नाम) की शादी को 16 साल हो गए थे. 36 वर्षीय शिवानी ने बताया कि शादी के शुरुआती साल से ही वह डिप्रेशन में थी क्योंकि हरियाणा के रोहतक में उनके पति और उनका परिवार उनके साथ एक नौकरानी की तरह व्यवहार करते थे और उन्हें घर के अंदर तक ही सीमित रखा जाता था. ज़्यादा वज़न होने और अक़्सर बीमार रहने के कारण उनके पति उनका अपमान करते थे. अगस्त 2017 में, शिवानी ने एक साथ बहुत सारी नींद की गोलियां खाकर खुद को मारने की कोशिश की थी.

शिवानी की सास ने उन्हें नींद की गोलियों के एक ख़ाली पैक के साथ बेहोश देखा और उनके भाई को फ़ोन किया. शिवानी को वह पास के एक अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टर ने उन्हें होश में लाने के बाद उल्टी कराने के लिए एक दवा दी. शिवानी बच गई.

शिवानी उन 2,075 भारतीयों में से एक हैं जिन्होंने आत्महत्या करने की नाकाम कोशिश की थी, यह उन लोगों की संख्या का बहुत छोटा हिस्सा है जिन्होंने अपना जीवन समाप्त (1,34,516) किया था, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार. गृहणियां, 2018 में देश में आत्महत्या करने वाले सबसे बड़े समूहों में से एक थीं. 2018 में रोज़ाना औसतन 63 गृहणियों ने आत्महत्या की थी, यह कुल आत्महत्याओं का 17.1% था. 2001 से, हर साल 20,000 से अधिक गृहणियों ने आत्महत्या की है, देशभर के आंकड़ों के हमारे विश्लेषण के अनुसार.

यह दिहाड़ी मज़दूरों के बाद दूसरा सबसे ज़्यादा आंकड़ा है, जो बेरोज़गारी, कृषि संकट और असगंठित क्षेत्र की धीमी वृद्धि की वजह से गरीबी और डिप्रेशन के चलते आत्महत्या करते हैं.

दुनिया में 2016 में आत्महत्या करने वाली महिलाओं में एक तिहाई से अधिक (36.6%) भारत से थीं, यह आंकड़ा 1990 में 25.3% का था, द लांसेट की 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार.  देश में महिलाओं की आत्महत्या में शादीशुदा महिलाओं का अनुपात सबसे अधिक है. इसके पीछे जल्द शादी होना, कम उम्र में मां बनना, निचला सामाजिक दर्जा, घरेलू हिंसा और वित्तीय निर्भरता जैसे कारण हैं, जैसा कि इस रिपोर्ट में कहा गया था.

शिवानी के मामले की जानकारी अस्पताल ने पुलिस को दे दी थी, लेकिन शिवानी और उनके परिवार ने एक पत्र पर हस्ताक्षर किए जिसमें लिखा था कि उनके आत्महत्या करने की कोशिश के पीछे उनके पति कारण नहीं थे. इसलिए कोई मामला दर्ज नहीं हुआ.

आत्महत्या की ज़्यादातर ऐसी कोशिशों में, पुलिस में मामले दर्ज नहीं होते और सही स्थिति की पुष्टि करना मुश्किल होता है.

“महिलाएं स्वयं विवाह को लेकर काफ़ी उत्साहित होती हैं लेकिन जब विवाह की वास्तविकता सामने आती है, तो यह बहुत सी महिलाओं के लिए एक उत्पीड़न वाली जेल बन जाता है,” सामाजिक वैज्ञानिक और किताब चुपः ब्रेकिंग द साइलेंस अबाउट इंडियाज़ वीमेन की लेखिका, दीपा नारायण ने कहा. उन्होंने बताया कि बहुत सी ऐसी युवा महिलाएं डिप्रेशन का सामना करती हैं लेकिन वह सहायता नहीं लेती और अक़्सर, जब वे सहायता लेती हैं, तो उन्हें आवश्यक सहायता नहीं मिलती है.

“उनके साथ ग़लत व्यवहार होने पर भी, आमतौर पर उनका परिवार उनसे ‘चुप रहने’ को कहता है, जिससे उन्हें और निराशा और अकेलापन होता है,” दीपा नारायण ने कहा. उन्होंने कहा कि यह महिलाओं के आत्महत्या करने का एक बड़ा कारण है. शिवानी का विवाह उनके परिवार ने तय किया था. विवाह के पहले ही साल से, वह अपने परिवार को बता रही थीं कि वह अपने पति को तलाक़ देना चाहती हैं लेकिन परिवार ने उन्हें तलाक़ नहीं देने की सलाह दी थी.

महिलाओं की आत्महत्याओं का सही आंकड़ा नहीं

2018 में आत्महत्या करने वाली गृहणियों की संख्या (22,937) 2017 (21,453) के मुक़ाबले 6.9% बढ़ी थी, एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक़. आत्महत्याओं में बढ़ोत्तरी या ऐसे मामलों की पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने में बढ़ोत्तरी इसके कारण हो सकते हैं.

शिवानी की जेठानी ने 2012 में आत्महत्या की थी. उनके पति के परिवार का दावा है कि उस आत्महत्या का कारण माइग्रेन की बीमारी थी लेकिन शिवानी ने बताया कि उनकी जेठानी ने कभी माइग्रेन की शिकायत नहीं की थी. पुलिस में कोई मामला दर्ज नहीं हुआ था.

एनसीआरबी के यह आंकड़े वास्तविक संख्या से कम हो सकते हैं क्योंकि परिवार ऐसे मामलों की पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करने से कतराते हैं, जैसा शिवानी और उनकी जेठानी के मामले में हुआ था.

“परिवार के लिए यह बुरा दिखता है कि कोई व्यक्ति इतना डिप्रेशन में या ऐसी ख़राब स्थिति में था कि उसने आत्महत्या करने का आख़िरी हल चुना. अगर बहू आत्महत्या करती है तो इसे शर्मनाक भी माना जाता है, इस वजह से परिवार अन्य कारण बताते हैं,” दीपा नारायण ने कहा.

 “महिलाओं की सभी आत्महत्याओं में से कम से कम 50% दहेज़ के कारण हो सकती हैं, लेकिन इनकी रिपोर्ट कम दर्ज होती है क्योंकि लड़की के अभिभावक दहेज़ देने में शामिल होते हैं और दहेज़ देना भी एक अपराध है,” महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाले ग़ैर सरकारी संगठन, विमोचना की डॉना फर्नांडिस ने बताया. उन्होंने कहा कि दहेज़ हत्याओं में से कई की आत्महत्या के बजाय दुर्घटना में मृत्यु के तौर पर रिपोर्ट दर्ज होती है, जैसे कि जलना, स्टोव फटना, बाथरूम में गिरना आदि.

मुंबई के सेंटर फ़ॉर एनक्वायरी इनटू हेल्थ एंड अलाइड थीम्स और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ की ओर से किए गए 2016 के अध्ययन, “बस्टिंग द किचन एक्सीडेंट मिथः केस ऑफ़ बर्न इंजरीज़ इन इंडिया” के अनुसार, ससुराल वालों या महिलाओं की ओर से स्वयं जलने और मृत्यु के बहुत से मामलों को दुर्घटना के वर्ग में रखा जाता है. इंडियास्पेंड ने इस अध्ययन के बारे में जनवरी 2017 में रिपोर्ट किया था. अध्ययन में महिलाओं के जलने से घायल होने के 22 मामलों का विश्लेषण किया गया था, इनमें से 15 की रिपोर्ट दुर्घटना के तौर पर की गई थी. जांच से पता चला था कि इनमें से केवल तीन दुर्घटनाएं थीं. अध्ययन में यह भी पता चला था कि 22 महिलाओं में से 19 उस समय घरेलू हिंसा का सामना कर रही थीं.

आत्महत्या करने की प्रवृति (आत्महत्या के विचार और वास्तविक कोशिशें) पुरुषों (4.1%) की तुलना में महिलाओं (6%) में अधिक थी, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज़ के जनवरी 2020 के एक अध्ययन के अनुसार. यह अध्ययन नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे 2015-16 के आंकड़ों पर आधारित था. अध्ययन में पाया गया था कि 40-49 साल की उम्र की महिलाओं में आत्महत्या की प्रवृति सबसे अधिक थी.

एनसीआरबी के आंकड़ों से पता चलता है कि आत्महत्या करने वाली महिलाओं में गृहणियां दूसरा सबसे बड़ा समूह है, जैसा कि हमने पहले बताया था.

देश में हर रोज़ औसतन दहेज़ से जुड़ी 20 मौतों, दहेज़ के 35 मामलों और पति या उसके रिश्तेदारों की ओर से क्रूरता के 283 मामलों की रिपोर्ट दर्ज कराई जाती है, एनसीआरबी के 2018 के आंकड़ों के अनुसार.

“हमारे समाज में, पुरुष की आवाज़ को अधिक, जबकि एक महिला की आवाज़ को कम महत्व दिया जाता है,” सामाजिक वैज्ञानिक, दीपा नारायण ने कहा.

ऑक्सफ़ैम इंडिया के उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ राज्यों से 2018 में किए गए एक सर्वे में शामिल 1,000 लोगों में से आधे से अधिक (53%) ने कहा था कि अगर कोई महिला अपने बच्चों की अच्छी देखभाल करने में असफ़ल रहती है तो उसकी कड़ी निंदा करनी चाहिए और 33% ने कहा था कि इसी कारण से किसी महिला को पीटना सही है

ज़बरदस्ती शादी, बांझपन, घरेलू हिंसा, पति का धोखा देना, दहेज़ की मांगें और शिक्षा या काम जारी रखने में अक्षमता से  महिलाओं में डिप्रेशन होता है और बाद में यह आत्महत्या तक पहुंच जाता है, सामाजिक और लैंगिक समानता पर ज़ोर देने वाले दिल्ली के संगठन, फ़ाउंडेशन फ़ॉर इंस्टीट्यूशनल रिफ़ॉर्म एंड एजुकेशन की संस्थापक और वकील, कर्णिका सेठ ने बताया.

आमतौर पर महिला के माता-पिता मानते हैं कि उनकी बेटी की शादी हो जाने पर उसके प्रति उनकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो जाती है. इस वजह से महिला अपने ससुराल वालों, विशेष तौर पर एक संयुक्त परिवार में तालमेल बिठाने को लेकर संघर्ष करती है. उसे यह चुपचाप सहना पड़ता है या क़ानूनी विकल्प का इस्तेमाल करना होता है. लेकिन क़ानूनी सहायता बहुत कम ली जाती है, विशेष तौर पर अगर महिला के बच्चे हैं. इसका कारण बदनामी का डर और सिंगल पेरेंट के तौर पर ख़र्चा चलाने में सक्षम नहीं होना होता है, कर्णिका सेठ ने आगे बताया.

गृहणियों के बड़ी संख्या में आत्महत्या करने का कारण सामाजिक ही नहीं, बल्कि बायोलॉजिकल भी है, मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराने वाले बेंगलुरु के संगठन, द माइंड रिसर्च फ़ाउंडेशन के साइकोलॉजिस्ट, देबदत्या मित्रा ने बताया.

युवा महिलाओं में माहवारी से जुड़ा डिप्रेशन सामान्य है. पुरुषों में प्रोजेस्टेरोन तनाव के स्तरों को बढ़ने से रोकता है, जो महिलाओं में नहीं होता, इससे उन्हें तनाव होने के ज़्यादा आसार रहते हैं, देबदत्या मित्रा ने बताया.

इससे पीड़ित महिलाओं में से कुछ ही प्रोफ़ेशनल सहायता लेती हैं. इनमें से अधिकतर के लिए डिप्रेशन कोई बड़ी समस्या नहीं है क्योंकि वह खाने और घर की देखभाल जैसी अन्य मूलभूत समस्याओं से जूझ रही होती हैं, देबदत्या मित्रा ने कहा.

मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा इतना संवेदनशील है कि महिलाएं इसके बारे में बात करना नहीं चाहती हैं, दीपा नारायण ने कहा.

राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) के साथ एक मीडिया कंसल्टेंट, नांग तन्वी मनपोंग ने बताया कि एनसीडब्ल्यू घरेलू हिंसा का सामना कर रही महिलाओं को काउंसलिंग देता है और उन्हें न्यायिक सहायता के लिए सीधे डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट से जोड़ने में सहायता करता है. लेकिन अधिकतर महिलाएं इसके बारे में बात या सहायता के लिए उपलब्ध विकल्पों का इस्तेमाल नहीं करतीं.

एनसीडब्ल्यू इस बारे में जागरूकता कार्यक्रम भी चलाता है. उन्होंने कहा कि महिलाओं को लेकर समाज के व्यवहार में बदलाव और क़ानून को सख़्ती से लागू करने की आवश्यकता है.

इस पुरुष प्रधान रवैये को बदलने के लिए, न केवल जागरूकता, बल्कि समाज की धारणा को भी बदलना होगा. परिवार में महिलाओं का शिक्षित होना और उन्हें सम्मान मिलना ज़रूरी है, और लड़के और लड़कियों को यह नहीं मानना चाहिए कि लड़कों का जन्म घर से बाहर रोज़गार के लिए होता है और लड़कियों को घर के काम करने होते हैं, द माइंड रिसर्च फ़ाउंडेशन की सह-संस्थापक, विश्वकीर्ति भान छाबड़ा ने कहा.

“हम स्वच्छ भारत के ज़रिए देश को साफ़ कर रहे हैं, लेकिन अपने दिमाग़ साफ़ नहीं कर रहे हैं. समय आ गया है कि पुरुषों को यह समझना चाहिए कि महिलाएं उनकी संपत्ति नहीं हैं और उनका भी एक जीवन है,” दीपा नारायण ने कहा.

मुश्किलों से उबरने के बाद, शिवानी ने अपने भाई और अपने दोस्तों की मदद से कपड़े और वज़न घटाने के उत्पाद बेचने शुरू किए. वह अपने पति को तलाक़ दे चुकी हैं, उन्हें प्यार हुआ और दोबारा उनकी शादी हो चुकी है.

“महिलाओं को अपनी आवाज़ उठानी चाहिए. मैंने अपनी आवाज़ उठाई थी, समाज काफ़ी कुछ कहता है, लेकिन महिलाओं को मज़बूत रहना चाहिए. अब मैं यह सोचकर बहुत खुश होती हूं कि मैंने अपना जीवन बदला है. मैं अन्य महिलाओं को यह बताना चाहती हूं कि आत्महत्या कोई विकल्प नहीं है. केवल अपने लिए कदम उठाएं, दुनिया से लड़ें,” शिवानी ने कहा. उन्होंने महसूस किया कि उनके भाई से उन्हें काफ़ी मदद मिली थी और उससे वह आत्महत्या करने के बजाए मुश्किलों से उबर सकी थीं. उन्होंने कहा, “जीवन बहुत कीमती है.”

 

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