कोणार्क मंदिर की सुरक्षा सीआइएसएफ के हाथों

विश्व प्रसिद्ध कोणार्क मंदिर की सुरक्षा का उत्तरदायित्व जल्द ही सीआइएसएफ को सौंपा जाएगा. मंदिर की सुरक्षा के लिए भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआइ) और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआइएसएफ) के मध्य करार हो चुका है.

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गंभीर समचार 04 May 2020

विश्व प्रसिद्ध कोणार्क मंदिर की सुरक्षा का उत्तरदायित्व जल्द ही सीआइएसएफ को सौंपा जाएगा. मंदिर की सुरक्षा के लिए भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआइ) और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआइएसएफ) के मध्य करार हो चुका है. सुरक्षा की दृष्टि से मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगेज स्कैनर लगाने के साथ अत्याधुनिक मेटल डिटेक्टर भी लगाया जाएगा. वर्तमान कोणार्क मंदिर की सुरक्षा निजी सुरक्षा एजेंसी के जिम्मे है. ये निजी सुरक्षा गार्ड तीन शिफ्ट में मंदिर की सुरक्षा में नियोजित हैं. सीआइएसएफ के तकरीबन 100 सुरक्षा कर्मी इस विश्व प्रसिद्ध मंदिर की सुरक्षा के लिए नियोजित किए जाएंगे. सीआइएसएफ जवानों के लिए अलग से आवास निर्माण का काम चल रहा है, इसके पूरा होते ही कोणार्क मंदिर की सुरक्षा सीआइएसएफ के हवाले कर दी जाएगी. सूत्रों के अनुसार, कोणार्क में प्रवेश और प्रस्थान के लिए अलग व्यवस्था किए जाने पर भी विचार चल रहा है.

सूर्य की पूजा करने के लिए हिंदू धर्म के वेदों में बताया गया है. हर प्राचीन ग्रंथों में सूर्य की महत्ता का वर्णन किया गया है. कहा जाता है सूर्य भगवान की आराधना करने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा आती है. हिंदू धर्म के सूर्य ही एक ऐसे देवता हैं जो प्रत्यक्ष रूप से आंखों के सामने हैं. हम सूर्य भगवान की आराधना उनको देख कर कर सकते हैं. लेकिन जैसा कि हमारे देश में प्रथा है भगवान के मंदिर बनवाने की इसी के आधार पर बरसों पहले कुछ हिंदू राजाओं ने एक भव्य सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया. 

ओडिशा में स्थित कोणार्क का सूर्य मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित है. ये मंदिर भारत की प्राचीन धरोहरों में से एक है. इस मंदिर की भव्यता के कारण ये देश के सबसे बड़े 10 मंदिरों में गिना जाता है. 

कोणार्क का सूर्य मंदिर ओडिशा राज्य के पुरी शहर से लगभग 23 मील दूर नीले जल से लबरेज चंद्रभागा नदी के तट पर स्थित है. इस मंदिर को पूरी तरह से सूर्य भगवान को समर्पित किया गया है इसीलिए इस मंदिर का संरचना इस प्रकार की गई है जैसे एक रथ में 12 विशाल पहिए लगाए गये हों और इस रथ को 7 ताकतवर बड़े घोड़े खींच रहे हों और इस रथ पर सूर्य देव को विराजमान दिखाया गया है. मंदिर से आप सीधे सूर्य भगवान के दर्शन कर सकते हैं. मंदिर के शिखर से उगते और ढलते सूर्य को पूर्ण रूप से देखा जा सकता है. जब सूर्य निकलता है तो मंदिर से ये नजारा बेहद ही खूबसूरत दिखता है. जैसे लगता है सूरज से निकली लालिमा ने पूरे मंदिर में लाल-नारंगी रंग बिखेर दिया हो. 

मन्दिर के आधार को सुन्दरता प्रदान करते ये बारह चक्र साल के बारह महीनों को परिभाषित करते हैं तथा प्रत्येक चक्र आठ अरों से मिल कर बना है, जो अर दिन के आठ पहरों को दर्शाते हैं. यहां पर स्थानीय लोग प्रस्तुत सूर्य-भगवान को बिरंचि-नारायण कहते थे. यह मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए दुनियाभर में मशहूर है और ऊंचे प्रवेश द्वारों से घिरा है. इसका मूख पूर्व में उदीयमान सूर्य की ओर है और इसके तीन प्रधान हिस्से- देउल गर्भगृह, नाटमंडप और जगमोहन (मंडप) एक ही सीध में हैं. सबसे पहले नाटमंडप में प्रवेश द्वार है. इसके बाद जगमोहन और गर्भगृह एक ही जगह पर स्थित है. 

इस मंदिर का एक रहस्य भी है जिसके बारे में कई इतिहासकरों ने जानकारी इकट्ठा की है. पुराणानुसार कहा जाता है कि श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को श्राप से कोढ़ रोग हो गया था. उन्हें ऋषि कटक ने इस श्राप से बचने के लिये सूरज भगवान की पूजा करने की सलाह दी. साम्ब ने मित्रवन में चंद्रभागा नदी के सागर संगम पर कोणार्क में बारह वर्ष तपस्या की और सूर्य देव को प्रसन्न किया. सूर्यदेव, जो सभी रोगों के नाशक थे, ने इसका रोग भी अन्त किया.

कोणार्क के बारे में एक मिथक और भी है कि यहां आज भी नर्तकियों की आत्माएं आती हैं. अगर कोणार्क के पुराने लोगों की मानें तो आज भी यहां आपको शाम में उन नर्तकियों के पायलों की झंकार सुनाई देगी जो कभी यहाँ यहां राजा के दरबार में नृत्य करती थीं.

 

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