नागरिकता संशोधन कानून पर कांग्रेस की दोमुंही नीति

राजनीति में एक नई परिपाटी चल निकली है कि सत्ता पक्ष द्वारा कोई भी निर्णय लिया जाए, वह जन सरोकार से संबंधित हो या फिर वास्तव में जनविरोधी, विपक्षी दल द्वरा उसका विरोध किया ही जाएगा. ऐसे एक नहीं, अनेको उदाहरण है. अभी हाल ही में नागरिकता संशोधन कानून को लेकर पूरे देश में राजनीतिक ताप चरम पर है. दिल्ली के शाहीन बाग में बड़ा विरोध प्रदर्शन हो रहा है. हालांकि इसे नागरिकों का आंदोलन कहा जा रहा है लेकिन विपक्षी दलों द्वारा इसे खाद पानी के रूप में समर्थन भी दिया जा रहा है.

| गंभीर समाचार डेस्क

गंभीर समचार 23 Apr 2020

नागरिकता संशोधन कानून का सबसे मुखर विरोध करने वाली कांग्रेस के 2004 से 2014 तक प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह ने 2003 में राज्यसभा में इन धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता दिए जाने की मांग की थी. उस समय के गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने उनकी मांग का अनुमोदन किया था. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस संशोधन का विरोध करने वाले मार्क्सवादियों के उस समय के महासचिव प्रकाश करात ने उन्हें पत्र लिखा था कि पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश से प्रताड़ित होकर भारत आए धार्मिक अल्पसंख्यक काफी दुर्दशा में हैं. उन्हें भारतीय नागरिकता दी जानी चाहिए. इस संशोधन का सबसे उग्र विरोध कर रही तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी संसद और उसके बाहर मजहबी असहिष्णुता के कारण बांग्लादेश और पाकिस्तान से भारत आए इन लोगों के पक्ष में आवाज उठाती रही हैं.

यह संशोधन इन सभी की अब तक व्यक्त की जाती रही भावना के अनुरूप ही हुआ है. फिर उसका विरोध क्यों किया जा रहा है? भारत के शीर्ष नेताओं ने स्वतंत्रता प्राप्ति के समय पाकिस्तान के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को वचन दिया था. यह वचन स्वयं महात्मा गांधी ने दिया था. वे भारत के विभाजन के विरुद्ध थे और कांग्रेस के उस समय के बड़े नेताओं को चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा था कि विभाजन करके हम अपने पड़ोस में अपना एक स्थायी शत्रु पैदा कर देंगे. उन्होंने यह भी देख लिया था कि नफरत के जिस आधार पर पाकिस्तान बनवाया जा रहा था, वहां गैर मुसलमानों का रहना संभव नहीं होगा. अंग्रेजों के उकसावे पर मुस्लिम लीग विभाजन पर अड़ी हुई थी और मोहम्मद अली जिन्ना निरंतर यह घोषणा करते रहे कि हिन्दू और मुसलमान साथ-साथ नहीं रह सकते. स्वयं मौलाना अब्दुल कलाम आजाद यह स्वीकार कर चुके थे कि पाकिस्तान बना तो हिन्दुओं के प्रति नफरत के कारण वह उन्हें अपने यहां नहीं रहने देगा. इसलिए यह सबको स्पष्ट था कि पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों का रहना मुश्किल होने वाला है. विभाजन के समय की घटनाओं ने इस आशंका को सही सिद्ध किया. महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता मिलने से पहले 7 जुलाई 1947 को यह वचन दिया था कि हिन्दू और सिख आदि अगर पाकिस्तान में न रहना चाहे तो भारत में उन्हें नागरिकता के साथ-साथ जीवनयापन की सभी सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएंगी. ऐसा करना भारत का कर्तव्य होगा. आजादी मिलने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने यह वचन दोहराया था. उसके बाद 19 नवंबर 1947 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की कार्यकारिणी ने और उसके एक सप्ताह बाद 25 नवंबर 1947 को उसकी महासमिति ने एक प्रस्ताव पारित करके पाकिस्तान के गैर-मुस्लिम धार्मिक अल्पसंख्यकों को वचन दिया था कि वे प्रताड़ना के कारण जब भी भारत आएंगे, उन्हें नागरिकता प्रदान की जाएगी. उन्होंने अपने इस वचन को केवल विभाजन के समय पलायन करके भारत आने वाले धार्मिक अल्पसंख्कों तक सीमित नहीं रखा था. उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि वे जब भी भारत आएंगे उन्हें भारत की नागरिकता पाने का अधिकार होगा.

कांग्रेस के नेताओं को 1947 में दिया गया अपना यह वचन याद नहीं रहा. उस समय जो लोग पाकिस्तान से पलायन करके भारत आए थे, उनके पुर्नस्थापन के लिए बड़े पैमाने पर प्रयत्न किए गए. भारत सरकार ने उसके लिए विशेष प्रावधान किए. फिर भी भारतीय समाज में अपनी जगह बनाने के लिए उन्हें कम संघर्ष नहीं करना पड़ा. उसके बाद भी पाकिस्तान से विस्थापन बना रहा. पश्चिमी पाकिस्तान में तो अधिकांश हिन्दू, सिख आदि को बंटवारे के समय ही पलायन के लिए विवश कर दिया गया था. पश्चिमी पाकिस्तान में बंटवारे से पहले वे वहां की कुल आबादी का 20 प्रतिशत थे. बंटवारे के बाद वहां वे केवल डेढ़ प्रतिशत रह गए. लेकिन पूर्वी पाकिस्तान में जहां एक तिहाई आबादी हिन्दू थी, बंटवारे के बाद 22 प्रतिशत रह गई. पश्चिमी पाकिस्तान के सिंध में जो हिन्दू आबादी बची थी, वह बहुत मामूली थी. पर उन पर भी अत्याचार और बर्बरता की खबरें आती रहीं. फिर अफगानिस्तान में गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों का रहना दूभर होने लगा. बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक अल्पसंख्यकों का पलायन निरंतर होता रहा. आज बांग्लादेश में केवल आठ प्रतिशत हिन्दू रह गए हैं. उनका भविष्य भी बहुत सुरक्षित नहीं है. बाद में आए इन सभी लोगों को काफी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता रहा है. समय-समय पर उनके पक्ष में आवाज उठती रही. लेकिन उनकी ओर न 1955 में नागरिकता कानून के प्रावधान तय करते समय ध्यान दिया गया और न उसके बाद.

एक राजनैतिक दल के रूप में उन्हें नागरिकता देने का संकल्प भारतीय जनता पार्टी दोहराती रही थी. पर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के काल में नागरिकता संशोधन कानून में यह संशोधन नहीं हो पाया. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के दो वर्ष बाद 2016 में लोकसभा में यह संशोधन पारित हुआ, पर राज्यसभा में विपक्षी विरोध के कारण उसे पारित नहीं करवाया जा सका. देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के सात दशक बाद नागरिकता कानून में संशोधन करके उन हतभाग्य भारतीयों को नागरिकता देने का कानून बनाया गया है, जो भारत के विभाजन के शिकार हुए थे. मूलत: यह दायित्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का था, जिसे 1947 में भारत में सरकार बनाने का अवसर मिला था. उसके सभी शिखर नेता पाकिस्तान के गैर-मुस्लिम धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता देने के लिए वचनबद्ध थे. इसलिए सबसे पहले यह बताना उनकी जिम्मेदारी है कि उन्होंने अपने इस दायित्व का निर्वाह क्यों नहीं किया. उनकी जगह अगर भारतीय जनता पार्टी ने यह दायित्व पूरा किया है तो इससे यह कानून दोष पूर्ण कैसे हो जाता है. कांग्रेस की आपत्ति यह है कि इस संशोधन से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों को अलग रखा गया है और इसका एकमात्र कारण यह है कि भाजपा भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहती है. इस संशोधन में हिन्दू राष्ट्र के बीज कहां छिपे हैं, यह समझना बड़ा मुश्किल है.

भारत के नागरिकता कानून में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं किया गया. यह संशोधन नागरिकता की अर्हता को संकुचित नहीं करता, उसमें केवल वृद्धि करता है. उसके नागरिकता संबंधी मूल प्रावधान जस के तस हैं. केवल यह जोड़ दिया गया है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 2014 तक प्रताड़ित होकर जो हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई भारत आए हैं, उन्हें नागरिकता दी जाएगी. 1947 में महात्मा गांधी सहित कांग्रेस के सभी नेता और पिछले कई दशकों से, आज इस संशोधन का विरोध कर रहे दलों के नेता गैर-मुस्लिम धार्मिक अल्संख्यकों को ही नागरिकता दिए जाने की मांग कर रहे थे. किसी ने पाकिस्तान के उन मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भारत आमंत्रित नहीं किया था, जो सुन्नी कट्टरता का शिकार हैं. कांग्रेस के नेता शिया या अहमदियों के बहाने नए कानून का विरोध कर रहे हैं. क्या उन्होंने इससे पहले कभी उनके लिए आवाज उठाई थी? अगर कांग्रेस को सचमुच पाकिस्तान के प्रताड़ित या अल्पसंख्यक मुसलमानों की चिंता थी तो 1947 में जवाहरलाल नेहरू ने क्यों कलात के राजा द्वारा अपने राज्य के भारत में विलय के अनुरोध को ठुकरा दिया था. क्यों सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान की इस टिप्पणी को नजरअंदाज किया गया था कि विभाजन करके उन्हें भेड़ियों के हवाले कर दिया गया है. पाकिस्तान में न बलूच शामिल होना चाहते थे न पठान. पाकिस्तान बनने के बाद उन पर निरंतर अत्याचार हुए. क्या लंबे समय तक सत्ता में रही कांग्रेस के किसी नेता ने उनके पक्ष में अपनी आवाज उठाई?

पाकिस्तान कश्मीरियों पर होने वाले कल्पित अत्याचारों का ढिढ़ोरा दुनियाभर में पीटता रहा. हम बलूचों और पठानों पर होने वाले वास्तविक अत्याचारों पर अपना मुंह सिए रहे. उसके बाद पाकिस्तान में जिए सिंध आंदोलन शुरू हुआ. जिए सिंध के नेताओं ने अनेक बार भारत आकर पाकिस्तान में सिंधिओं के साथ होने वाले अन्याय की आवाज उठानी चाही, लेकिन किसी कांग्रेस सरकार ने उन्हें अनुमति नहीं दी. विभाजन के समय जो मुसलमान इस्लामी राष्ट्र का सपना लेकर भारत से पलायन करके पाकिस्तान चले गए थे, उन्हें जब वहां की स्थिति विकट दिखाई दी तो उन्होंने भारत की ओर आशा भरी नजरों से देखना शुरू किया. अनेक मुहाजिर नेताओं ने भारत में शरण लेने या यहां आकर अपनी बात दुनिया के सामने रखने की कोशिश की. कोई कांग्रेसी सरकार उन्हें भारत में आने की अनुमति देने के लिए तैयार नहीं हुई. एकमात्र अपवाद बांग्ला मुक्ति वाहिनी है, जिसके कुछ नेताओं को बांग्लादेश बनने तक भारत में शरण मिली. भारत ने बंटवारे के समय और उसके बाद भी संसदीय संकल्प द्वारा यह घोषित किया था कि हमारे इतिहास और भूगोल ने भारत को जो स्वरूप दिया था, उसमें हमारी अटूट निष्ठा है और भारत के उस स्वरूप की पुन: प्राप्ति में हम लगे रहेंगे. लेकिन भारत का विभाजन करने वाली नेहरू कांग्रेस ने स्वयं कभी अखंड भारत का सपना नहीं देखा था. हमने जब मुजीब की मुक्ति वाहिनी के नेताओं को अपने यहां शरण दी थी तो हम उसके परिणाम जानते थे. उसका परिणाम पाकिस्तान के विभाजन और बांग्लादेश के उदय में ही हो सकता था. अगर पाकिस्तान के बलूचों या पठानों की मदद करते तो वह भी पाकिस्तान को विभाजन की ओर ले जाता.

पाकिस्तान में शियाओं और अहमदियों पर घोर अत्याचार हुए हैं. शिया पाकिस्तान की आबादी का 20 प्रतिशत है. क्या शिया आदि प्रताड़ित मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए भारत के दरवाजे खोलने का अर्थ यह नहीं होगा कि हम पाकिस्तान को आंतरिक बिखराव की ओर धकेल रहे हैं? क्या पाकिस्तान के नेता दुनियाभर में यह आरोप लगाते नहीं घूमेंगे कि भारत षड्यंत्रपूर्वक उन्हें बांटने और बिखेरने में लगा है. क्या विश्व बिरादरी भारत को आसानी से ऐसा करने देगी? भारतीय जनता पार्टी घोषित रूप से अखंड भारत की बात करती रही है. अगर वह पाकिस्तान के प्रताड़ित मुस्लिम अल्पसंख्यकों को नागरिक संशोधन कानून में जगह देती तो यह उसके ‘एजेंडे’ के अनुरूप ही होता. पाकिस्तान आदि को बिखेरकर वह अखंड भारत की ओर ही कदम बढ़ा रही होती. कांग्रेस नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध करने के लिए उसमें मुसलमान अल्पसंख्यकों को शामिल करने का जो आग्रह कर रही है, वह उसे उसी दिशा में ले जाता है. उसने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में दिए गए अपने तर्कों की इस परिणति पर गौर नहीं किया. कांग्रेस का दूसरा तर्क यह है कि नागरिकता संशोधन कानून में पहली बार धर्म को आधार बनाया गया है. यह संविधान के मूल स्वरूप से खिलवाड़ है. इस संशोधन के बाद भी भारत की नागरिकता का कोई धर्म न एकमात्र आधार है, न मुख्य आधार.

नागरिकता के सामान्य प्रावधानों को जस का तस रखते हुए केवल विभाजन पूर्व भारत के गैर-मुस्लिम धार्मिक वर्गों को, जो 1947 से 2014 की सीमित अवधि में भारत आए, उन्हें नागरिकता प्रदान करने के लिए यह संशोधन किया गया है. इससे धर्म नागरिकता का आधार कैसे हो जाता है और उससे संविधान का मूल स्वरूप कैसे बदल जाता है? क्या हमारे संविधान निमार्ताओं ने भारत के नागरिकों के धार्मिक रूप से पहचान किए जाने का निषेध किया था? अगर सचमुच ऐसा था तो कांग्रेस सरकारों ने धार्मिक अल्पसंख्यक के रूप में अनेक वर्ग कैसे बना दिए? संविधान में धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक बनाए जाने का कोई प्रावधान नहीं है. उसके बाद भी कांग्रेस सरकारों ने धार्मिक अल्पसंख्यकों की एक अलग श्रेणी बनाकर उन्हें अनेक तरह के विशेषाधिकार दिए. क्या इससे संविधान के मूल स्वरूप में अंतर नहीं पड़ा? इन प्रावधानों पर हमारे संविधानविदों ने और संविधान की रक्षक न्यायपालिका ने ठीक से गौर नहीं किया. किसी देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों को विशेषाधिकार तभी दिए जाते हैं, जब यह माना जाता हो कि वहां की पूरी व्यवस्था बहुसंख्यक धर्मांवलंबियों की मान्यताओं के आधार पर खड़ी है और उसके कारण भिन्न मान्यताओं वाले अल्पसंख्यक धार्मिक वर्गों को संरक्षण दिए जाने की आवश्यकता है. पर अपने यहां तो सभी सार्वजनिक व्यवस्थाओं को धर्म से दूर रखा गया है. फिर धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक घोषित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? कांग्रेस और वामपंथियों की सरकारों द्वारा धार्मिक अल्पसंख्यकों को दिए गए विशेषाधिकारों से देश में बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो गई है.

देश के बहुसंख्यक धर्मावलंबियों को वे सब अधिकार और सुविधाएं प्राप्त नहीं है, जो धार्मिक अल्पसंख्यकों को दे दी गई हैं. दुनिया में शायद ही ऐसा कोई देश हो, जहां भेदभाव का शिकार बहुसंख्यक धार्मिक समुदाय हो. हमारी आत्महीनता की हालत यह है कि हम इस ओर देखने से भी कतराते हैं. जिस कांग्रेस को कभी धार्मिक अल्पसंख्यकों के नाम पर राजनीति करने में संकोच नहीं हुआ, जो संविधान में बिना किसी उल्लेख के धार्मिक अल्पसंख्यकों की एक अलग श्रेणी बनाकर उन्हें विशेषाधिकार देने में देश की मुख्य धारा के साथ हो रहे अन्याय को नहीं देख पाती, उसे एक निर्दोष नागरिकता संशोधन कानून में संविधान का उल्लंघन दिखाई दे रहा है. इससे बड़ी विडंबना की बात और क्या होगी. लेकिन नागरिकता संशोधन कानून 2019 में धार्मिक वर्गों के उल्लेख मात्र से जिस तरह की आपत्ति कांग्रेस और वामपंथी कर रहे हैं, उससे एक और बड़ा खतरा पैदा होता है. अंग्रेजों ने भारत के नागरिकों की केवल अपने शासन में निष्ठा स्थिर करने के लिए उनकी स्थानीय, क्षेत्रीय, जातीय और धार्मिक सब तरह की पहचान मिटाने की कोशिश की. उसके बाद से हमारे सभी नेता यह रट लगाते रहे हैं कि हमें राजनैतिक व्यवस्थाओं को जाति, धर्म और क्षेत्र से परे रखना है. इसकी जितनी दोषी कांग्रेस और वामपंथी हैं, उतनी ही भाजपा भी है.

भाजपा का राष्ट्रवाद भी समाज की अन्य सभी निष्ठाओं के निषेधपूर्वक राष्ट्र को उनसे ऊपर रखता है. उन्हें भी यह समझ में नहीं आता कि हमारी परिवार में, कुल में, जाति में, गांव में, जनपद में, अपनी भाषा और संस्कृति में, अपने संप्रदाय और धर्म में निष्ठा ही हमारी राष्ट्र में निष्ठा को दृढ़ कर सकती है. कांग्रेस का नेतृत्व जब तक महात्मा गांधी के हाथ में रहा, उसकी राजनीति के मूल विचार हमारी सभ्यता से, सनातन परंपरा से लिए गए. भारतीय सभ्यता का मूल आधार सनातन धर्म ही रहा है. गांधी जी ने बार-बार दोहराया कि परिवार और गांव से आरंभ होकर जाति, भाषा और धर्म से होते हुए हमारी निष्ठा राष्ट्र तक पहुंचती है. इन सभी निष्ठाओं को मिलाकर ही राष्ट्र बनता है. उन्हें छोड़कर हमारी निष्ठा राष्ट्र की बजाय राज्य में सीमित हो जाएगी. राज्य का अर्थ शासक दल या शासक नेता ही हो जाता है. उसमें निष्ठा हमें फांसीवाद की ओर ही ले जा सकती है. कांग्रेस इस नागरिकता संशोधन कानून के बहाने भाजपा को फासिस्ट घोषित कर रही है. जबकि इस कानून के खिलाफ उसका तर्क ही देश को फासीवाद की ओर ले जा रहा है. वामपंथियों ने अपनी बुद्धि एक यूरोपीय विचारधारा की बंधक बनाकर अपने आपको विवेकशून्य कर लिया है. कांग्रेस की यह गति एक परिवार के राजनैतिक हित की बंधक बनकर हो गई है. यह विचित्र बात लगती है कि कांग्रेस असम और पूर्वोत्तर राज्यों में बांग्लादेश से प्रताड़ित होकर आए हिन्दुओं को नागरिकता दिए जाने का विरोध कर रही है. दूसरी तरफ शेष भारत में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के मुसलमानों को नागरिकता दिए जाने का आग्रह कर रही है. बावजूद इसके कि इन देशों से किसी मुस्लिम समूह ने भारत की नागरिकता पाने की कोशिश नहीं की.

 

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