बंद गली में पत्रकारिता

मीडिया , , बुधवार , 16-08-2017


Journalism in the closed street

फ़ज़ल इमाम मल्लिक

एक सवाल शिद्दत से भीतर कौंधता है. बरसों पत्रकारिता में रहने के बाद यह सवाल और भी परेशान व बेचैन करता है. यह        बेचैनी तब भी थी, जब आपातकाल लगा था और अख़बारों  पर सरकार के ख़िलाफ़ खबर छापने पर पाबंदी लगा दी गई थी. यह बेचैनी तब भी थी जब राजीव गांधी ने प्रेस को साधने के लिए कानून बनाया था. बेचैनी का आलम तब भी था जब बिहार में जगन्नाथ मिश्रा प्रेस के खिलाफ काला कानून लेकर आए थे. लेकिन उस बेचैनी में सवाल नहीं थे, उम्मीदें थीं. एक बेहतर कल की उम्मीदें जहां पत्रकारिता के लिए खुला खुला आसमान और लंबी-चौड़ी धरती थी. लेकिन आज सिर्फ बेचैनी ही नहीं है बल्कि सवाल भी भीतर कौंध रहे हैं. यह सवाल इसलिए कौंध रहे हैं क्योंकि तब पत्रकारिता सत्ता और सरकार की आंखों में आंखें डाल कर सवाल करती थी, लेकिन आज पत्रकारिता हर तरह के सवालों से बचती हुई उनके साथ कदमताल कर रही है. यह स्थिति ख़तरनाक है और इसलिए सवाल भी है और बेचैनी भी है.

करीब बारह साल पहले बिहार में नीतीश कुमार के सत्ता में आने के बाद मीडिया को साधने की कवायद शुरू हुई थी. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने पहला काम मीडिया को साधने का किया था. बाद में भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों ने उनके इस फार्मूले पर अमल किया. विपक्ष की भूमिका निभाने वाला मीडिया सत्ता के साथ खड़ा नजर आने लगा. हालांकि जब नीतीश को धीरे-धीरे मीडिया को साधने की कवायद शुरू की थी तब किसी ने इसका विरोध नहीं किया था. बिहार में तब विपक्ष गौढ़ था. कहीं कुछ खबरें विपक्ष की छपतीं भीं थीं तो अंदर के किसी पन्ने पर लेकिन उस तरह से नहीं जिस तरह से छपनी चाहिए. पत्रकारिता की भाषा में बात करें तो उन ख़बरों को अंडरप्ले कर दिया जाता था. नीतीश का खुफिया अखबार के दफ्तरों पर नजर रखने लगा था और विपक्ष की प्रेस विज्ञप्तियां तक नीतीश की नजर से गुजरने लगीं थीं. बिहार में तब एक तरह से अघोषित सेंसरशिप था. कोई कुछ नहीं बोल रहा था. विपक्ष मौन था. पत्रकार वही सब कुछ लिख पढ़ रहे थे जो नीतीश चाहते थे. मीडिया घरानों को नीतीश ने विज्ञापन की धौंस दिखा कर अपने साथ खड़ा कर लिया था. सुशासन की खबरें पर लगा कर उड़तीं और देश के कोने-कोने तक जा पहुंचतीं. यहां तक कि कोसी में आई बाढ़ के बाद भी किसी अख़बार ने सरकार के खिलाफ कोई खबर नहीं छापी लेकिन उन अखबारों ने दर्जनों फोटो के साथ नीतीश की मां के श्राद्ध पर आयोजित कार्यक्रम की खबरें पहले पेज पर आठ कालम में बैनर बना कर छापीं थीं. पत्रकारिता के पतन की यह शुरुआत थी जो आज अपने चरम पर है. नीतीश ने जिस पत्रकारिता की बुनियाद डाली थी, नरेंद्र मोदी ने उस पत्रकारिता को और आगे बढ़ाया है. 

नीतीश के महिमामंडन के खेल में सालों से लगी मीडिया उनके खिलाफ मोर्चा तब खोला जब नीतीश का भाजपा से मोह भंग हुआ या इसे यों भी कह सकते हैं कि नीतीश के रातों-रात धर्मनिरपेक्ष बनने के बाद मीडिया नीतीश के खिलाफ मुखर हुआ था. नीतीश कुमार के अघोषित सेंसरशिप पर चुप्पी ने सत्ता पर बैठे लोगों के लिए नई राहें खोलीं और आज इसका इस्तेमाल सत्ता अपने लिए खुलकर रही है और मीडिया उनके पाप में बराबर का हिस्सेदार बना बैठा है. बिहार में लालू प्रसाद यादव की पंद्रह साल तक सत्ता रही थी, लेकिन मीडिया उस दौर में सत्ता के साथ नहीं खड़ा था. सारी खामियों के बावजूद लालू प्रसाद यादव ने मीडिया को यह नहीं बताया कि उन्हें क्या लिखना चाहिए या क्या नहीं लिखना चाहिए. लेकिन नीतीश कुमार ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने मीडिया को साध कर उन्हें बताया कि जो सरकार कहे उसे ही उन्हें छापना है. नरेंद्र मोदी की सरकार ने इसे विस्तार दिया. केंद्र में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद ही पत्रकारिता का चाल, चेहरा और चरित्र बदला. नीतीश ने अखबारों को साधा था और नरेंद्र मोदी ने अखबारों के साथ-साथ समाचार चैनलों पर भी नकेल कसी.

बात सिर्फ सरकार के क़सीदे पढ़ने तक ही सीमित नहीं रही, मीडिया का एक बड़ा वर्ग देशभक्ति का अलमबरदार बन बैठा और हर उस शख्स को देशद्रोही कहने से भी नहीं चूकने लगा जो सरकार की आलोचना में जुटा था. चैनल अपने एजंेडे सरकार के इशारे पर चलाने लगे और देश में एक सांप्रदायिक उन्माद लगातार फैलाया जाने लगा. चैनल अदालतों की भूमिका निभाने लगे और पिछले तीन साल से चैनलों पर बहस के केंद्र में सामाजिक सरोकार की बजाय हिंदू-मुसलमान ज्यादा रहे हैं. चैनलों पर जिस तरह से ऐंकर से लेकर बहस में हिस्सा लेने वाले चीख-चिल्ला कर एक अलग तरह का सांप्रदायिक उन्माद लगातार फैला रहे हैं. यह खतरनाक है. पिछले दो-तीन सालों में कितने सामाजिक सरोकारों पर बहस होते आपने देखी है. कुछ खास विषय और हिंदू-मुसलमानों के बीच विभाजन रेखा खींचने की कोशिश क्या कम हुई है. एंकर जजों की भूमिका में नजर आने लगे हैं और सामाजिक सरोकार पीछे छूट गए हैं. अपना-अपना एजंेडा और अपने-अपने राग दरबारी. 

शायद यही वजह है कि चैनलों की विश्वसनीयता पर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं. देशभक्ति का राग तब सुनाई नहीं पड़ता जब भारत पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच होता है. तब पैसे कमाने की होड़ में सारी देशभक्ति कहीं गुम हो जाती है और पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी चैनलों पर खूब-खूब क्रिकेट खेलते हैं. पाकिस्तानी चैनलों के बायकाट की बात आम दिनों में जोर-शोर से करने वाले भारतीय चैनल तब पाकिस्तान के चैनलों के साथ युगलबंदी करते दिखाई देते हैं, तब न तो उनके लिए आतंकवाद कोई मुद्दा होता है और न ही घुसपैठ और न ही सेना के शहीद जवान की याद उन्हें आती है. तब सारा खेल टीआरपी का होता है और देशभक्ति इसमें कहीं खो जाती है. चैनलों के अपने-अपने एजंडे हैं और पत्रकार चाटुकार बन जाएगा तो कोई भी उसे लतियाएगा. कोई तो दूध का धुला नहीं है, मैं लालू यादव का हिमायती नहीं हूं लेकिन उनके कार्यकाल में उनके खिलाफ खूब खबरें छपतीं थीं. लालू ने कभी मीडिया पर पहरा नहीं लगाया. लेकिन आज ऐसा हो रहा है और लगभग सभी सरकारें पहले मीडिया को ही साधती हैं. मीडिया जब सत्ता के आगे घुटने टेक देगा तो कोई लालू या कोई और ऐरा गैरा नेता उसे कुछ भी कर सकता है. 

मीडिया आज के दौर में जजमेंटल हो गया है. वह फैसले सुनाने लगा है. वह किसी को देशभक्त और किसी को राष्ट्रद्रोही बताने में एक मिनट की भी देर नहीं लगाता. ज्यादा दिन नहीं हुए स्वर्ण मंदिर में खालिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे लेकिन जेएनयू पर कई दिनों तक बहस चलाने वाले चैनलों ने किसी मामूली खबर की तरह उसे चलाया और यह सवाल नहीं पूछा कि आपरेशन ब्लूस्टार की बरसी क्यों मनाई जाती है? दरअसल इससे चैनलों और मीडिया की विश्वसनीयता खत्म हुई है और पत्रकारिता बंद गली में गुम हो गई है. फिलहाल तो इस बंद गली में रोशनी का कोई नन्हा सा कतरा भी नहीं दिखाई दे रहा है. हालात नहीं बदले तो यह पत्रकारिता के लिए ही नहीं देश और समाज के लिए भी बड़ा ख़तरा है. अभी भी वक्त है इस बंद गली को खोलने का. क्या हम ऐसा कर पाएंगे ? 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)


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