अभिव्यक्ति की आज़ादीः जम्हूरियत के चौथे स्‍तंभ पर हमलों का दौर

मीडिया , , सोमवार , 02-10-2017


Freedom of expression  attacks on the fourth pillar of democracy

जावेद अनीस

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत पत्रकारिता के लिहाज से सबसे खतरनाक मुल्कों की सूची में बहुत ऊपर है. ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’  द्वारा 2017 में जारी ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ के अनुसार इस मामले में 180 देशों की सूची में भारत 136वें स्थान पर है जहाँ अपराध, भ्रष्टाचार, घोटालों, कार्पोरेट व बाहुबलियों के कारनामें उजागर करने वाले पत्रकारों को इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है. इसको लेकर पत्रकारों के सिलसिलेवार हत्याओं का लम्बा इतिहास रहा है. ‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ के आंकड़ों के मुताबिक पिछले दो सालों के दौरान देश भर में पत्रकारों पर 142 हमलों के मामले दर्ज किये हैं जिसमें सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश (64) फिर मध्य प्रदेश (26) और बिहार (22) में दर्ज हुए हैं.

इधर एक नया ट्रेंड भी चल पड़ा है जिसमें वैचारिक रूप से अलग राय रखने वालों और लिखने-पढ़ने वालों को डराया-धमकाया जा रहा है, उनपर हमले हो रहे हैं यहाँ तक कि उनकी हत्यायें की जा रही हैं. आरडब्ल्यूबी की ही रिपोर्ट बताती है कि भारत में कट्टरपंथियों द्वारा चलाए जा रहे ऑनलाइन अभियानों का सबसे बड़ा शिकार पत्रकार ही बन रहे हैं जहां न केवल उन्हें गालियों का सामना करना पड़ता है, बल्कि शारीरिक हिंसा की धमकियां भी मिलती रहती हैं. पिछले दिनों वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश को बेंगलुरु में उनके घर में घुसकर मार दिया गया. लेकिन जैसे उनके वैचारिक विरोधियों के लिये यह काफी ना रहा हो, सोशल मीडिया पर लोग इस जघन्य काम को सही ठहराते हुए जश्न मानते नजर आये. वैचारिक भिन्नता के कारण की गई हत्या का जश्न - सचमुच यह भयावह और ख़तरनाक समय है.

गौरी लंकेश की निर्मम हत्या ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हामियों को तथा स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता करने वालों को भीतर से झकझोर दिया है. जाहिर है कि उनके कहे और लिखे की कोई अहिमियत रही होगी जिसके चलते उनकी वैचारिक विरोधियों ने उनकी जान ले ली. गौरी एक निर्भीक पत्रकार थीं, वे सांप्रदायिक राजनीति और हिन्दुतत्ववादियों के खिलाफ लगातार मुखर थी. यह उनकी निडरता और ना चुप बैठने की आदत थी जिसकी कीमत उन्होंने अपनी जान देकर चुकाई है. गौरी की हत्या बिल्कुल उसी तरह की गयी है जिस तरह से उनसे पहले गोविन्द पानसरे, नरेंद्र दाभोलकर,एमएम कलबुर्गी की आवाजों को खामोश कर दिया गया था. ये सभी लोग लिखने,पढ़ने और बोलने वाले लोग थे जो सामाजिक रूप से भी काफ़ी सक्रिय थे.

गौरी लंकेश की हत्या के बाद एक फेसबुक पोस्ट में कहा गया कि “गौरी लंकेश की हत्या को देश विरोधी पत्रकारिता करने वालों के लिए एक उदाहरण के तौर पर पेश करना चाहिए, मुझे उम्मीद है कि ऐसे देश द्रोहियों की हत्या का सिलसिला यही खत्म नहीं होगा और शोभा डे, अरुंधति राय, सागरिका घोष, कविता कृष्णन एवं शेहला रशीद आदि को भी इस सूची में शामिल किया जाना चाहिए.”

जाहिर है हत्यारों और उनके पैरोकारों के हौंसले बुलंद हैं. भारतीय संस्कृति के पैरोकार होने का दावा करने वाले गिरोह बिना किसी खौफ के नयी सूचियाँ जारी कर रहे हैं, धमकी और गली-गलौज कर रहे हैं, सरकार की आलोचना या विरोध करने वाले लोगों को देशद्रोही करार देते हैं और अब हत्याओं के बाद जश्न मना रहे हैं. गौरी लंकेश की हत्या के बाद जिस तरह से सोशल मीडिया पर उन्हें नक्सल समर्थक, देशद्रोही और हिन्दू विरोधी बताते हुए उनके खिलाफ घृणा अभियान चलाया गया वैसा इस देश में पहले कभी नहीं देखा गया. जश्न मनाने वालों को किसकी शह मिली हुई है ?  

पिछले साल ‘सत्याग्रह’ पोर्टल पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री ट्विटर पर विपक्ष के किसी भी नेता को फॉलो नहीं करते थे लेकिन वे ऐसे दर्जनों लोगों को फॉलो करते हैं जो निहायत ही शर्मनाक और आपत्तिजनक पोस्ट करते हैं, सांप्रदायिक द्वेष व अफवाहों को फैलाने में मशगूल रहते हैं और महिलाओं को भद्दी गलियां देते हैं. सत्याग्रह पोर्टल के अनुसार रिपोर्ट प्रकाशित होने के कुछ दिनों बाद प्रधानमंत्री ने विपक्ष के दर्जनों नेताओं को तो फॉलो करना तो शुरू कर दिया था लेकिन उन्होंने ऐसे लोगों को फॉलो करना नहीं छोड़ा जो ट्विटर पर गाली-गलौज और नफरत फैलाते हैं. स्वाति चतुर्वेदी अपनी किताब ‘आई एम अ ट्रोल: इनसाइड द सीक्रेट डिजिटल आर्मी ऑफ द बीजेपी’ में कहती हैं कि कि प्रधानमंत्री कई अकाउंट को फॉलो करते हैं जो खुले आम बलात्कार, मौत की धमकियां भेजते हैं, सांप्रदायिक भावनाएं भड़काते हैं. गौरी लंकेश की हत्या को कुछ नेता भी खुले शब्दों में जायज ठहराते हुए नजर आये. ख़बरों के मुताबिक कर्नाटक के भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री डीएन जीवराज ने बयां दिया कि ‘गौरी लंकेश जिस तरह लिखती थीं, वो बर्दाश्त के बाहर था, अगर उन्होंने आरएसएस के ख़िलाफ़ नहीं लिखा होता तो आज वह ज़िंदा होतीं’. इसी तरह से केरल में आरएसएस समर्थक संगठनों का साझा मंच ‘हिंदू ऐक्य वेदी’ के राज्य प्रमुख केपी शशिकला टीचर का बयान था कि “मैं सेकुलर लेखकों से कहना चाहूंगी कि अगर वो लंबा जीवन चाहते हैं तो उन्हें मत्युंजय जाप कराना चाहिए नहीं तो आप भी गौरी लंकेश की तरह शिकार बनोगे”.

भारत हमेशा से ही एक बहुलतावादी समाज रहा है जहाँ हर तरह के विचार एक साथ फलते-फूलते रहे हैं. यही हमारी सबसे बड़ी ताकत भी रही है. लेकिन अचानक यहाँ किसी एक विचारधारा या सरकार की आलोचना करना बहुत खतरनाक हो गया है इसके लिए आप राष्ट्र-विरोधी घोषित किये जा सकते हैं और आपकी हत्या करके जश्न भी मनाया जा सकता है. बहुत ही अफरा-तफरी का माहौल है जहाँ ठहर कर सोचने–समझने और संवाद करने की परिस्थितियाँ सिरे से गायब हो रही हैं और सब कुछ खांचों में बंटता जा रहा है. सोशल मीडिया ने तो लंगूर के हाथ में उस्तरे वाली कहावत को सच साबित कर दिया है जिसे राजनीतिक शक्तियां अपने हितों के लिए इस्तेमाल कर रही हैं. 

समाज से साथ–साथ मीडिया का भी ध्रुवीकरण किया गया है. समाज में खींची गयीं विभाजन रेखाएं मीडिया में भी साफ़ नजर आ रही हैं. यहाँ भी अभिव्यक्ति की आज़ादी और असहमति की आवाजोंं को निशाना बनाया गया है. इसके लिए ब्लैकमेल, विज्ञापन रोकने, न झुकने वाले संपादकों को निकलवाने जैसे हथखंडे अपनाये गये हैं. इस मुश्किल समय में मीडिया आजाद होने के बजाय हुकूमत की डफली बजा रहा है. यहाँ पूरी तरह एक खास एजेंडा हावी हो गया है. 

किसी भी लोकतान्त्रिक समाज के लिये अभिव्यक्ति की आज़ादी और असहमति का अधिकार बहुत ज़रूरी है. फ्रांसीसी दार्शनिक “वाल्तेयर” ने कहा था कि “मैं जानता हूँ कि जो तुम कह रहे हो वह सही नहीं है, लेकिन तुम कह सको इस अधिकार की लड़ाई में मैं अपनी जान भी दे सकता हूँ”. एक मुल्क के तौर पर हमने भी ऐसा ही समाज बनाने का वादा किया है, जहाँ सभी नागिरकों को अपनी राजनीतिक विचारधारा रखने, उसका प्रचार करने और असहमत होने का अधिकार हो. लेकिन यात्रा के इस पड़ाव पर हम अपने संवैधानिक मूल्यों से भटक चुके हैं आज इस देश के नागरिक अपने विचारों के कारण मारे जा रहे हैं और इसे सही ठहराया जा रहा है. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हम एक ऐसे समय में धकेल दिये गये हैं जहाँ असहमति की आवाजों के लिये कोई जगह नहीं है.

 गौरी लंकेश बहुत ही निडरता के साथ अपना पक्ष रखती थीं. वे अपनी कलम लिए शहीद हुईं हैं. चुप्पी और डर भरे इस महौल में उन्होंने सवाल उठाने और अभिव्यक्ति जताने की कीमत अपनी जान देकर चुकायी है. शायद इसका पहले से अंदाजा भी था, पिछले साल एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, 'मेरे बारे में किए जा रहे कॉमेंट्स और ट्वीट्स की तरफ जब मैं देखती हूं तो मैं चौकन्नी हो जाती हूं... मुझे ये डर सताता है कि हमारे देश में लोकतंत्र के चौथे खम्भे की अभिव्यक्ति की आजादी का क्या होगा... ये केवल मेरे निजी विचारों की बात है, इसका फलक बहुत बड़ा है.'

गौरी लंकेश की हत्या एक संदेश है जिसे हम और अनसुना नहीं कर सकते हैं, इसने अभिव्यक्ति की आज़ादी और पत्रकारों की सुरक्षा का सवाल को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है. यह हमारी सामूहिक नाकामी का परिणाम है और इसे सामूहिक रूप से ही सुधार जा सकता है. यह हत्या इस बात का संकेत है कि वैचारिक अखाड़े की लड़ाई दिन पर दिन ख़ौफ़नाक होती जा रही है. इस स्थिति के लिए सिर्फ कोई विचारधारा, सत्ता या राजनीति ही जिम्मेदार नहीं है. इसकी जवाबदेही तो समाज को भी लेनी पड़ेगी. भले ही इसके बोने वाले कोई और हों लेकिन आखिरकार नफरतों की यह फसल समाज और सोशल मीडिया में ही तो लहलहा रही है. नफरती राजनीति को प्रश्रय भी तो समाज में मिल रहा है. ऐसे में सभी को मिलकर नागरिकता की पहचान को सबसे ऊपर लाना पड़ेगा. साथ ही लोकतंत्रक चौथे स्तंभ को भी अपना खोया सम्मान और आत्मविश्वास खुद से ही हासिल करना होगा. 


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