निशा राय के गीत

गीत , , बृहस्पतिवार , 29-03-2018


Lyrics of Nisha Rai

निशा राय

हिन्दी गीतों की दुनिया में एक शाश्वत हलचल-सी अवश्य दिखती है पर कहीं पर भाषाई चूड़ियां ढीली दिखती हैं, कहीं पर उनका कलात्मक स्थापत्य कमजोर दिखता है. नवगीतों में भी इधर जो कृत्रिमता और बनावट-सी दिखती है वह संभवत: इसीलिए कि हमारी अनुभूति का संवेदना से रिश्ता वैसा नहीं बन पाया जैसा छायावादोत्तर गीतों में सहज ही दिखता है. ऐसे में निशा राय ने गीति रचना की ओर विश्वासपूर्वक कदम बढ़ाया है. गीत की एक संभावनाशील हस्ताक्षर के रूप में हम उन्हें यहां प्रस्तुत करते हुए आशा करते हैं कि भविष्य में उनके गीतों में कथ्य, शिल्प और भाषाई दृष्टि से हमारे समय की आधुनिक भाषा की पदचाप सुनाई देगी.                                                                         -ओम निश्चल 

 

 

एक 

पुरवइया से कह दो थोड़ा धीरे-धीरे आये

गौरैया के पंख मुलायम हौले से सहलाये.

 

इक गौरैया दुल्हनिया सी इठलाये, इतराये

दूजी भोली, फुदक-फुदक कर ताके फिर शर्माये

गर्भवती है इक गौरैया, ठौर नहीं मिलता है

इक माँ है, उसके चूजों को कौर नहीं मिलता है

झुलसे-झुलसे पंखो पर ममता से हाथ फिराये

पुरवइया से कह दो थोड़ा धीरे-धीरे आये.

 

इन से पूछो भूख है क्या, प्यास की क्या परिभाषा

दूर-दूर तक उड़ने पर भी लगती हाथ निराशा

बाग कट गए, कटे बगीचे, सूख गयी फुलवारी

गुलदस्तों में फूल सजे हैं, सूनी-सूनी क्यारी

गमलों के बरगद पीपल पर कैसे नीड़ बनाये

पुरवइया से कह दो थोड़ा धीरे-धीरे आये. 

 

वहीं एक दादी गौरैया इधर-उधर तकती है

आते-जाते हर पंछी की खोज-खबर रखती है

दूर देश जो गये परिंदे, क्या इक दिन आएंगे

चिउड़ा, चावल, सरसों के दाने संग में खाएंगे

आशाओं के दीप नयन में देखो बुझ ना जाए

पुरवइया से कह दो  थोड़ा धीरे-धीरे आये.  

 

दो 

इक दिन जब हम नींद से जागे 

खुद को पाया पानी में 

बिस्तर बोरिया चौका चूल्हा 

खटिया मचिया पानी में. 

 

कातर बेबस पशु पक्षी भी

छप्पर छान्ही पानी में 

बिलख-बिलख कर माँ रोती है 

पुत्र बह गया पानी में. 

 

मन्दिर डूबा मस्ज़िद डूबी

गुरुद्वारा भी पानी में 

कुत्ते, बिल्ली, बकरी, खोंसू 

बछरू, गैया पानी में.

 

पानी में रहकर भी प्यासा

मन व्याकुल है पानी में

घर-आंगन भी पानी-पानी

ताल, तलैया पानी में.

 

क्या छोड़ें, क्या लेकर जाएं

किसे गवाएं, किसे बचाएं

तिनका-तिनका जोड़ सजाई

अपनी दुनिया पानी में. 

तीन
हवा फागुनी. ऋतु बासन्ती आ गयी रे 
मैं पतंग हूँ, मुझ पर मस्ती छा गयी रे.
          
वसुधा के आँचल में फूल खिले मतवारे
धूप गुनगुनी आके उनकी नजर उतारे 
तिल गुड़ की खुशबू आंगन से आ गयी रे
मैं पतंग हूँ, मुझ पर मस्ती छा गयी रे.
इठलाती बलखाती सबको हर्षाती हूँ 
क्षण भर में अवनी से अम्बर में जाती हूँ
बादल संग अठखेली मुझको भा गयी रे
मैं पतंग हूँ, मुझ पर मस्ती छा गयी रे.
           
जब मस्ती में आयी थी तो खूब उड़ी मैं
अपने ही अपनों को काटा खूब लड़ी मैं
लड़ते-कटते खुद भी नीचे आ गयी रे 
मैं पतंग हूँ, मुझ पर मस्ती छा गयी रे..
चार
नींद को जितना बुलाऊं दूर उतनी जा रही  है 
याद किसकी आ रही है.
धुंध के पर्दे में छुप कर
फिर शरद की रात आई,
कंपकंपी, सिहरन व आलस 
ले के अपने साथ आई,
धवल, शीतल चाँदनी में कुमुदिनी मुरझा रही है
याद किसकी आ रही है.
थक गए हैं चांद तारे,
सो गए सारे नजारे,
ले रही है झील झपकी,
सोई नदियाँ और धारे,
जागती आंखों में तनहा रात ढलती जा रही  है 
याद किसकी आ रही है.
दूर पेड़ों पर परिंदे 
जाग कर हैं चहचहाते,
आ रही रवि की सवारी
देख कर हैं मुस्कुराते,
छेड़ती पुरवा पवन बोझिल नयन कर जा रही है
याद किसकी आ रही है. .  
पांच
प्राची के आंगन से आकर 
संध्या के पहलू में जाना
हे देव! तुम्हारी आदत है 
आ कर जाना, जा कर आना.
आते-जाते पथ पर पगली 
मैं तुमसे नेह लगा बैठी
सोने के रथ पर तुम सवार 
मैं सुमन सुवास जगा बैठी
लिख दिया नियति में कुदरत ने 
यूँ देख दूर से मुस्काना
हे देव! तुम्हारी आदत है 
आ कर जाना, जा कर आना.
जीवन के पथ पर अनुगामी 
बनकर चलने का मूक वचन
नयनों ने नयनों से बाँधा 
ये माया-मोहन का बन्धन,
जब खेल लिया है प्रेम जुआ
क्या जीत-हार पे पछताना?
हे देव! तुम्हारी आदत है 
आ कर जाना, जा कर आना.
तुम युगों-युगों से निर्मोही 
मै जनम-जनम की दीवानी
तेरी ख़ातिर पुष्पित कुसुमित 
तुम पर ही मिटने की ठानी 
मिट कर बनने, बन कर मिटने 
को ही जीवन का सुख माना 
हे देव! तुम्हारी आदत है 
आ कर जाना, जा कर आना.
हे सूर्य देव! इस सूर्यमुखी 
का विनय आप स्वीकार करो
कर वृष्टि रश्मियों की उज्ज्वल  
मेरा नूतन श्रृंगार करो
ऋतु वासन्ती, फागुनी हवा
हैं मार रही मुझको ताना
हे देव! तुम्हारी आदत है 
आ कर जाना, जा कर आना.  
 

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