लालाजी और अंग्रेजी राज का दारोगा

व्यंग्य , , शुक्रवार , 02-02-2018


Lord of lalaji and English raj

सुभाष चन्दर

कहानी काफी पुरानी है. अंग्रेजों के जमाने की. उस समय भारत में दो तरह के अंग्रेज राज कर रहे थे - गोरे और काले. गोरे अंग्रेज का काम था भारत नाम की चिड़िया के परों को बड़े करीने से कतर कर महारानी विक्टोरिया के मालखाने में जमा करना और वहां से ‘वेल-डन’ की रसीद लेकर फिर अपने काम में जुट जाना. फुर्सत मिलने पर देश संभालना. काले अंग्रेज उनके अनुयायी थे और गोरे अंग्रेजों से सीखी कला को चिड़िया के बदन पर आजमाते. वे चिड़िया का मांस नोचने के पुनीत काम को अंजाम देते. चिड़िया खुश थी कि उसके शरीर का बोझ कम हो रहा था और फ्री में डाईटिंग भी. चिड़िया खुश तो देश खुश. देश खुश था तो आम आदमी नाम का एक जीव भी खुश था जो गाहे-बगाहे अपने अधनंगे बदन की हड्डियों का प्रदर्शन करके अपनी खुशी दर्शाता रहता था. इसी खुशनुमा माहौल में देश का काम चल रहा था.

इसी खुशहाल देश के एक कस्बे में लाला रामदीन रहते थे. बड़े शरीफ आदमी थे. हमेशा मीठा बोलते और कम तौलते थे. उस दिन भी वह अपनी दुकान पर बैठे तोलन-विद्या के क्षेत्र में नया आविष्कार कर रहे थे. तभी एक सिपाही प्रगट भया. उसे देखते ही लाला जी का माथा ठनका - जरूर लौंडे ने कोई गुल खिलाया होगा. बोले, ‘‘कहो दीवान जी, कैसे आना हुआ ? ...  ‘बैठो !’’ उन्होंने शब्दों में मिस्री घोलते हुए सिपाही से तशरीफ रखने की गुजारिश की. पर वो अंग्रेज राज का सिपाही था, अदने से लाला के कहने पर भला इतनी महंगी तशरीफ कैसे धर देता ? उसने खड़े-खड़े ही हुंकारा, ‘‘लाला, तेरे लौंडे ने ननुआ की लौंडिया की इज्जत खराब की है. थाने में बंद है. जल्दी जल, दारोगा जी ने बुलाया है.’’ इतना सुनते ही लाला को सांप सूंघ गया. कुछ देर को बेहोशी को प्राप्त भये. होश में आते ही उन्होंने एक हाथ से अपना माथा ठोका और दूसरे हाथ से अपनी जेब कस के पकड़ ली. उसके बाद गिनकर एक हजार लानतें बेटे को भेजीं, ‘‘कमबख्त ने कभी कोई काम सलीके से नहीं किया. अच्छे भले रिश्ते आ रहे थे. लाखों का मामला जमना था. अब तो रेट सीधा बीसियों हजार नीचे चला जाएगा, ऊपर से थाना कचहरी में चपत पड़ेगी सो अलग.”

दारोगा के बारे में उनकी राय थी कि वह पैसे के प्रति तो दयाल प्रवृत्ति का है, पर उसे भेड़ों के बदन से ऊन उतारने का शौक है. यहाँ तो भेड़ को खुद थाने आना था. सो उसकी जेब में भरी ऊन कैसे बचती, सो कटवाने के लिए लालाजी ने जेब भरी और पहुँच गए थाने.

जेल में काफी समय से ठुकाई कार्यक्रम चल रहा था. लाला जी के आने के बाद उसमें और बढ़ोतरी हुई. सुपुत्र की चीखें कटते बकरे की चीखों से कम्पटीशन करने लगीं. लालाजी यह देखकर काफी प्रभावित हुए और अपने हीं...हीं की मात्रा बढ़ाते हुए दारोगा से बोले, ‘‘हुजूर, ये क्या कर रहे हैं ? बच्चा जख्मी हो जायेगा. इलाज में बहुत खर्चा आएगा. अब छोड़ दीजिए, अब ये ऐसी कोई गलती नहीं करेगा.’’

अपनी जाने में लालाजी ने बड़ी मार्के की बात कही थी. सतयुग होता तो ऐसी चाशनी भरी बातों से लड़का बाइज्जत छूट जाता, ऊपर से लालाजी की तारीफ होती सो अलग. पर यह कमबख्त कलियुग था, कलियुग में भी थाना. थाने में दारोगा था, वह भी अंग्रेजी राज का. मामला तो बिगड़ना ही था, सो बिगड़ा. दारोगा ने लाला को लगते हाथों से लिया, ‘‘चुप बे लाला. इस साले को तो मैं जान से ही मार दूँगा, स्साले ने सत्रह साल की लड़की बिगाड़ी है. इसका मजा मैं इसको चखाऊंगा. सालों-साल सड़ाऊँगा साले को.’’ कहकर उसने लाला के सपूत के पिछवाड़े में दो-तीन बेल्टें और रसीद कर दीं. 

लाला ने दारोगा की बात सुनकर भोलेपन से कहा, ‘‘हुजूर सड़ाएंगे कैसे ? क्या हवालात में कोढ़ फैली है ?’’

दारोगा चिहुँक गया. बोला, ‘‘क्यों लाला मखौल सूझ रहा है. सारी हँसी उड़ जाएगी, समझा.’’ उसने लड़के पर दो-तीन डंडे और फटकारते हुए बोला, ‘‘बरबाद कर दूँगा. इसकी शकल ऐसी बिगाड़ दूँगा कि पहचान में भी नहीं आएगा.’’

लालाजी कहने वाले थे कि हुजूर ऐसा गजब मत करना, वरना लड़के की दहेज मार्केट बिगड़ जाएगी, पर कुछ सोच कर चुप रह गए. उन्हें चुप देखकर लड़का डकराया, ‘‘पिताजी, मुझे छुड़ा लो, अब कभी ऐसी गलती नहीं करूँगा. ये लोग तो मुझे मार ही डालेंगे.’’

यह दृश्य देखकर लाला जी का माथा ठनका. वह दारोगा से हाथ जोड़कर बोले, ‘‘हुजूर, बच्चे की गलती माफ कर दो. जो सजा देनी है मुझे दे दो. आखिर इस कपूत का बाप हूँ. बताओ चाय-पानी को कितने नजर कर दूँ. सौ-दो सौ... हुक्म करो.’’

दारोगा भिन्ना गया. अंग्रेजी राज का दारोगा. उसे कोई इतने बड़े गुनाह के एवज में इतनी छोटी सी सजा की तजवीज करे. धिक्कार है उसकी दारोगाई पर. कड़ककर बोला, ‘‘लाला... सौ-पचास की बात की तो तुझे भी अंदर कर दूँगा. लड़का अगर छुड़ाना है तो पूरे पाँच हजार सिक्के लगेंगे चांदी के.’’

लालाजी ने बहुत चिरौरी की, दो हजार तक देने को तैयार हो गए. पर दारोगा न माना. उल्टे बहस करने पर प्रति शब्द सौ सिक्के बढ़ाने की धमकी और दी. लालाजी का ब्लड-प्रेशर और बढ़ गया. हारकर दो दिन का वक्त मांगा ताकि राशि का इंतजाम कर सकें. इसके बाद बैक-टू-पैवेलियन हो गए.

घर लौट कर लालाजी ने सिक्कों का वजन किया, बेटे का वजन किया और दारोगा को तौल कर देखा. बेटा भारी निकला. बेटे के भारी पड़ने के पीछे कई तकनीकी कारण थे. मसलन जेल में रहने के दौरान दुकान पर न बैठने की हानि, दहेज के फूटी कौड़ियों में बदलने का डर और थोड़ी-बहुत बेइज्जती भी. लालाजी ने सारा हिसाब लगा लिया. नुकसान ज्यादा था तो लड़के का वजन भी ज्यादा था. पर पाँच हजार सिक्के... रकम बड़ी थी तो लालाजी की चिंता ही कहां छोटी थी. लालाजी ने सारी रात सोच में काटी. हल निकल आया. लालाजी ने दरियादिली से एक मुस्कराहट खर्च की और चैन की नींद सो गए.

लालाजी ने अगले दिन ही दारोगा को खबर भिजवा दी कि वह शाम पांच बजे घंटा घर पर मिलें, वहीं वह उन्हें रुपये देंगे. दारोगा को खबर मिली तो उसका माथा ठनका. कंजूस लाला पूरे पैसे दे रहा है. एक तो यही खुराफाती बात, दूसरे घंटाघर पर बुलाहट. बस उसके दिमाग में खतरे की घंटी घनघना गई. उसने कुछ सोचा और खबरची को कहला दिया कि वह दो दिन के लिए गांव जा रहा है, जरूरी काम है. वहां से लौट कर पैसे लेगा.

दो दिन बाद दारोगा नियत समय पर घंटाघर पहुंचा. अपने साथ दो आदमी गवाह के रूप में साथ और ले लिए ताकि कहीं लाला कोई चालाकी ना खेल दे. घंटाघर पर पहुँचकर देखा तो लालाजी मय अपने छोटे बेटे, मुनीम और दो लोगों के साथ मौजूद थे. दारोगा ने लालाजी का फौज फांटा जांचा. मामला कुछ समझ में आ गया. पर दारोगा अंग्रेजों के जमाने का था, बुद्धि भी काफी हद तक अंग्रेजों की हो चुकी थी. सो वह कतई नहीं घबराया बोला, ‘‘लाला पूरे पैसे गिनकर लूँगा, तेरा विश्वास ना है.’’

लालाजी ने खींसें निपोरी, ‘‘हुजूर पूरे गिनकर लीजिए रोजी की कसम, एक रुपया भी कम ना है.’’

दारोगा ने भी एक रुपया उछाला, जांचा और फिर थैले के हवाले किया. संतुष्ट होने के बाद लाला के लड़के को अभयदान दे दिया. लालाजी ने पहले लड़का छुड़ाया, उसके बाद उसे दूर रिश्तेदारी में पहुँचाया.

हर तरह से निश्चिंत होने के बाद लालाजी ने दारोगा के खिलाफ मुकदमा अंग्रेज जज के इजलास में डाल दिया – मुकदमा रिश्वत लेने का, साथ ही झूठे मुकदमें में फंसाने की धमकी का. मुकदमा शुरु हुआ. लाला ने गवाह पेश किये. उन्होंने बयान दिए कि उनके सामने ही दारोगा ने रुपये लिये हैं.

जज ने दारोगा से पूछा, ‘‘क्यों डारोगा...ये लोग ठीक बोलटा ? टुमने पैसा लिया...?’’

दारोगा बोला, ‘‘जी हुजूर, मैंने वाकई पैसा लिया. मेरे अपने गवाह हैं जिनके सामने मैंने पैसा लिया.’’ उसके गवाहों ने बयान दिया कि, ‘‘दारोगा ने उनके सामने ही रुपये गिन-गिनकर लिए.’’

लालाजी यह सब देखकर भौंचक्के थे - दारोगा की बुद्धि खराब हो गयी, खुद जुर्म स्वीकार कर रहा है, जरूर मरेगा ससुरा.

जज बोला, ‘‘तो डारोगा, तुम मानता है कि टुमने रिश्वत लिया ? जुर्म कबूलता ?’’

दारोगा रिरियाकर बोला, ‘‘हुजूर कैसी रिश्वत ? मेरी तो आपसे यही गुजारिश है कि मेरे बाकी के पांच हजार भी लालाजी से दिलवाइये वरना मैं गरीब तो मारा जाऊंगा.’’

जज चौंका, ‘‘क्या मतलब ? सारा गवाही टुमारे खिलाफ. बजाय सजा के टुम बोलटा कि लाला से पांच हजार और डिलाओ. अडालत से मजाक करेगा तो और बड़ा सजा मिलेगा.’’

दारोगा आवाज में मिस्री घोलता हुआ बोला, ‘‘हुजूर,  नाराज न हों. सच्ची बात ये है कि मैंने अपने खेत बेचकर लाला को दस हजार रुपये दिये थे. लाला ने पांच हजार लौटा दिए. अभी इसे मेरे पांच हजार और लौटाने हैं. उन्हें बचाने के लिए ये मुझे फंसाने की कोशिश कर रहा है. विश्वास न हो तो ये देखिए मेरे खेतों की रजिस्ट्री की रसीद. देख लीजिए ये लाला से पैसे लेने से एक दिन पहले की ही हैं.’’ जज ने रसीद देखी और प्रभावित हुआ. 

उधर दारोगा फिर से शुरु हो गया, ‘‘हुजूर, मैं अंग्रेजों का वफादार नौकर रिश्वत लेने जैसा पाप कैसे कर सकता हूँ.’’ फिर थोड़ा रुककर बोला, ‘‘हुजूर, अगर मैं रिश्वत लेता तो क्या सबके सामने लेता. पूछो लाला के गवाहों से कि मैंने एक-एक सिक्का गिनकर लिया कि नहीं.’’

जज ने पूछा. लाला सकपकाया. बहुतेरी नाकुर-नुकुर की...पर जज  ने घुड़क कर हामी भरवा ली.

दारोगा फिर बोला, ‘‘हुजूर, आदमी अपने पैसे को ही ठोक बजाकर लेता है, गवाहों के सामने लेता है. बताइए मैं गलत कह रहा हूँ ?’’ जज ने सहमति में गर्दन हिलाई.  

दारोगा के चेहरे पर दीनता आ गयी, बोला, ‘‘हुजूर अब तो आप समझ गए कि मैंने रिश्वत नहीं ली. हुजूर से विनती है कि लाला से मेरे बाकी पांच हजार भी दिलवा दीजिए वरना ये बेईमान मेरी रकम लूट लेगा, मैं गरीब बेमौत मर जाऊँगा.’’ 

लालाजी ने बहुतेरी नाकुर-नुकुर की, खूब रोये, गिड़गिड़ाए, चिल्लाये, दारोगा पर चालबाजी का इल्जाम लगाया. पर जज अंग्रेज था. क्रांतिकारियों का मामला होता तो न्याय की पूरी लुटिया डुबो देता. पर यहाँ न्याय होने की पूरी छूट थी सो उसने बेहतरीन न्याय किया - दारोगा बाइज्जत बरी हुआ और लाला को अगले दिन तक पैसा चुकाने की ताकीद मिल गई. साथ ही डोज भी कि आगे भविष्य में शरीफ आदमियों पर झूठे मुकदमे ना डाले, वरना जेल की सजा हो जायेगी. इसके बाद कोर्ट बरखास्त हो गयी.

फैसला सुनकर लालाजी रोये, दारोगा हंसा. लालाजी ने घर आकर दारोगा के पैसे दिए. दारोगा हँसता हुआ चला गया.

दारोगा के जाते ही लालाजी को दिल का दौरा पड़ा. सारे परिजन इकट्ठा हो गए. अपने आखिरी वक्त में लालाजी की जुबान से ये अमृत वचन निकले, ‘‘शेर और पुलिस दोनों सामने आ रहे हों तो शेर की तरफ भागना चाहिए. शेर से आदमी कभी-कभी बच भी जाता है.’’ 


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