कश्यपमार से कश्मीर तक

समीक्षा , , बृहस्पतिवार , 29-03-2018


From Kashyap Mar to Kashmir

देवेश त्रिपाठी

कश्मीर की धरती उस लाश की तरह है जिसे ख़ूब सजाया गया है और माथे पर लादे घूमा जा रहा है, लेकिन कोई यह देखने की जहमत नहीं उठाता कि उस लाश के भीतर अभी जान बाकी है. कश्मीर का इतिहास इतना रक्तरंजित रहा है कि आप हैरान-बेचैन सोचेंगे कि क्या शांति, प्रेम और अहिंसा जैसे शब्द केवल जुमले हैं! केवल पिछले वर्ष की बात कर लें तो “फ्री प्रेस कश्मीर” के अनुसार वर्ष 2017 में ही 384 जानें चली गईं. इस बीहड़ समय में हिंदी के वरिष्ठ लेखक और कवि अशोक कुमार पाण्डेय ने वर्षों की मेहनत लगाकर कश्मीर के इतिहास से लेकर उसके वर्तमान की पड़ताल की है तथा उसे पुस्तकाकार - ‘कश्मीरनामा: इतिहास और समकाल’ - रूप में सामने लेकर आये हैं. 

इस किताब की यात्रा शुरू होती है तब से जब कश्मीर का नाम ‘कश्यपमार’ था. किताब मिथकों से आगे बढ़कर इतिहास में शामिल राजवंशों, राजाओं, इस्लाम के आगमन, धर्म-परिवर्तन, शाहमीरी, ऋषि आन्दोलन, चक राजवंश, मुगलों के शासन, अफगानों के आक्रमण, सिख साम्राज्य, डोगरा राज, 1930 के दशक के विद्रोह, शेख अब्दुल्लाह, आज़ादी, भारत और पकिस्तान के बीच की खींचतान, लोकतंत्र और धारा 370, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, कश्मीर में चुनाव, 90 के दशक में दमन और विद्रोह की पड़ताल करती हुई, देशकाल परिवेश से जूझते हुए कश्मीर के वर्तमान को गले लगाती है.

हमारे देश के नुक्कड़ों से लेकर वातानुकूलित ड्राईंग रूमों तक जब भी कश्मीर बहस का हिस्सा बनता है, इस्लामोबिया अपना असर दिखाती है. धारणा बना दी गई है कि कश्मीरी पंडितों को छोड़कर बाकी सभी कश्मीरी आतंकवादी हैं, पत्थर फेंक रहे प्रदर्शनकारी आतंकवादी हैं. जब भी कोई कश्मीर में शांति बहाली की बात करता है तो देशद्रोही करार दिया जाता है. कश्मीर में भारतीय राज्य द्वारा किये गये दमन की बात करने पर तुरंत कश्मीरी पंडितों पर हुए ज़ुल्म को कुछ इस तरह समक्ष रखा जाता है जैसे कश्मीर की कोई शांति बहाली बिना कश्मीरी पंडितों के भी हो सकती है. अशोक तथ्यों का सहारा लेते हैं और मजहबी चश्मे से देखने की राजनीतिक साजिश का पर्दाफाश करते चलते हैं. यही बात ‘कश्मीरनामा’ को बड़ा बना देती है. मसलन, पेज न. 412 पर वह लिखते हैं - “एक सच यह है कि वजह कुछ भी हो लेकिन विस्थापन किसी भी समुदाय के लिए अपरिमित पीड़ा का सबब होता है और कश्मीरी पंडितों के बिना कश्मीरी समाज अधूरा ही रहेगा.”     

कश्मीर की गुत्थी ऐसी उलझी हुई है कि उसे समझने के लिए ईमानदारी एक शर्त मानी जानी चाहिए. संघ जिन महाराजा हरि सिंह को जननायक बताता है वे अपनी राजसत्ता बचाने के लिए भारत में कभी कश्मीर का विलय नहीं कराना चाहते थे और इसके लिए वे पाकिस्तान तक के साथ जाने को तैयार थे. जब कश्मीर पर कबायली हमला हुआ तो भाग खड़े हुए. वहीँ 1931 के आन्दोलन से पैदा हुए जननेता शेख अब्दुल्ला जो हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए प्रतिबद्ध रहे और कबायलियों से लोहा लेते रहे उन्हें आज भुला दिया गया है (अध्याय 11, कश्मीरनामा). कश्मीरनामा बिना कोई तथ्यामक भेदभाव दिखाए इन सभी ऐतिहासिक तथ्यों को सामने रखती है. कश्मीर का भारत के साथ जब विलय किया गया तो 26 अक्टूबर 1947 को हस्ताक्षरित किये गए विलय-पत्र में यह बहुत स्पष्ट था कि “विलय का अंतिम निर्णय कश्मीरी जनता के प्रत्यक्ष जनमत से होगा.” भारत सरकार ने 1948 में जारी किये श्वेत-पत्र में स्पष्ट किया था - “विलय को स्वीकार करते हुए भारत सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया था की वह इसे तब तक पूरी तरह से अस्थायी मानेगी जब तक राज्य के लोगों की इच्छा सुनिश्चित न कर ली जाए” (अध्याय 13, कश्मीरनामा). आज धारा 370 को लेकर संघ परिवार के इशारे पर तमाम दुष्प्रचार फैलाए जा रहे हैं. कश्मीरनामा इन भ्रांतियों का बखूबी अंत करती है. साथ ही लेखक पेज नंबर 327 पर जिम्मेदारी से लिखते हैं - “इस तरह जम्मू और कश्मीर के संविधान कि अपनी कमियां और खूबियाँ हो ही सकती थीं जिसमें सुधार की पर्याप्त संभावनाएं थीं लेकिन धारा 370 को उस दौर में किसी समस्या की जगह भारतीय एकता कीं विजय के रूप में देखा जा रहा था. शेख अब्दुल्लाह ने श्रीनगर से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक भारत के साथ जो पक्षधरता दिखाई थी, उसके बरक्स यह विशिष्ट संवैधानिक व्यवस्था कश्मीर और भारत के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों की दिशा में एक अग्रवर्ती कदम था......कश्मीरियों के लिए यह भारत के साथ एक ऐसा सम्मानजनक सहस्तित्व था जिसके भीतर आज़ादी की उनकी सदियों पुरानी आकांक्षा भी फलीभूत हो रही थी.” विश्व पुस्तक मेला 2018 की बेहद चर्चित किताब ‘कश्मीरनामा’ ऐतिहासिक केवल इसलिए नहीं है कि कश्मीर जैसे जरूरी और प्रासंगिक विषय पर इतना शानदार काम किया गया है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि साहित्यग्रस्त भाषा हिंदी में पहली बार ऐसा काम करने का जोखिम किसी लेखक ने उठाया है. अशोक कुमार पाण्डेय इसके लिए बधाई के पात्र हैं. उनकी स्पष्ट राजनीतिक प्रतिबद्धता ही है जिसके सहारे वह किताब का अंत करते हैं - “संक्षेप में रास्ता वही है जो वाजपेयी के दौर में भाजपा के जम्मू और कश्मीर के प्रभारी महासचिव रहे नरेन्द्र मोदी ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिए तीन डी वाला सूत्र देते हुए प्रस्तावित किया था डेवलपमेंट, डेमोक्रेसी और डायलॉग. 

कश्मीरनामा : इतिहास और समकाल

लेखक: अशोक कुमार पाण्डेय  

प्रकाशकः राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली

कीमतः 625 रुपये 


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