शहरी परिजन पेड़

गांव , , बुधवार , 29-11-2017


Urban famine tree

मिथिलेश कुमार राय

गांव से शहर की ओर जब-जब बढ़ता हूँ तो मेरे पांव कुछ देर पेड़-पौधों और बाँस के झुरमुटों के बीच से निकले हुए रास्ते पर चलते हैं. इस रास्ते को पगडंडी कहते हैं. इस पर चलते हुए एक विशाल बरगद से मुलाकात होती है और एक पुराने बगीचे से भी. बगीचे में आम के ढेर-सारे बुजुर्ग पेड़ रहते हैं. यहाँ लोगों और वाहनों की आवाजाही नहीं के बराबर है. यहाँ जो है वह यह कि चारों ओर परिंदों का कलरव और शाखों के पत्तों तथा बांसों के झुरमुटों से गुजरती हवा के गीत. 

पगडंडी मुझे राजकीय राजमार्ग पर पहुंचा देती है. वहाँ पहुंचते ही खटकने लगता है बड़े मोटे पेड़ों का न होना. राजकीय मार्ग के दोनों तरफ अभी कुछ महीने पहले ही पौधे लगाए गए हैं. लोग कहते हैं कि जब ये बड़े हो जाएंगे तब इस मार्ग की खूबसूरती देखने लायक हो जाएगी. लेकिन इसमें अभी समय लगेगा. यह पूछने पर कि कितना समय लगेगा, सब चुप्पी साध लेते हैं. 

जब तक बस न आ जाए तब तक धूल उड़ाती और साइरन बजाती गाड़ियों के रेले को देखते रहना भी एक मज़बूरी है. यहाँ पहले पान की दो ही गुमटियां थीं. अब सड़क की दूसरी तरफ एक और खुल गयी है. मगर इन गुमटियों के पास ग्राहकों के बैठने के लिए बाँस की खपचियों से बनाए गए मचान तक धूल का गुबार उड़-उड़कर आता ही रहता है. इसलिए लोग वहाँ बैठना जरा भी पसंद नहीं करते. बस का इंतजार करते लोग अर्जुन के उस पेड़ के नीचे जाकर खड़ा रहते हैं जो सड़क से तनिक दूर है. इस पेड़ की जड़ें बहुत गहरी हैं. इसके नीचे छाया है. लोग धूल और शोर से छिटक कर यहीं आ जाते हैं. सच तो यह है कि दादा-परदादा के जमाने के इस पेड़ की छाया में सुकून मिलता है.

बस आती है तो उसको यहाँ कुछ देर ठहरना पड़ता है. गाँव के लोग बस में लपक कर चढ़ने में माहिर नहीं होते. वे बड़े इत्मीनान से ही बस में चढ़ते हैं.

शहर का रास्ता राष्ट्रीय राजमार्ग से शुरू होता है. बस वहाँ तक धीमी रफ्तार में चलती है. इस बीच वह ढेर-सारे गाँव और देहात के रास्तों को लांघती है. बस की खिड़की के तरफ बैठे लोगों को कदम-कदम पर बाँसों के झुरमुट और बड़े-बड़े पेड़ नजर आते हैं. लोग दूर-दूर तक फैले हुए खेतों को देखते हैं. खेतों की लहराती फसलों में उनकी नजरें समा जाती हैं. तभी कोई दुआर दिख जाता है. दुआर पर नाद के पास बैठी हुई गाय पगुरा रही होती है. वहीं पपीते के एक पौधे पर एक चिड़िया पके हुए पपीते को खोद रही होती है. लोग देखते हैं कि एक आदमी साइकिल के पीछे एक बच्ची को बिठाकर सामने वाली पगडंडी पर उतरा है. बच्ची खुश है और मुसकुरा रही हैं. बस के लोग मनमोहक दृश्य में खोए रहते हैं. लेकिन तभी सर्र से कोई भारी वाहन बस के पास से तेज रफ्तार में गुजर जाता है तो वे हठात चौंक उठते हैं.

बस जैसे-जैसे मुख्य सड़क की ओर बढ़ती है वैसे-वैसे उसकी गति में इजाफा होता जाता है. राष्ट्रीय राजमार्ग पर चढ़ते ही बस की चाल बिलकुल बदल जाती है. यहाँ गाड़ियाँ तेज रफ्तार में भागी जा रही हैं. उसी रफ्तार के निर्वाह में बस भी लग जाती है. अब खिड़की से गाड़ियाँ नहीं बल्कि उनकी  की रैलियाँ दिखाई पड़ रही है. अब लोग तो इक्के-दुक्के ही दिख रहे हैं. अब जो पेड़ दिख रहे हैं वे सब दूर-दूर किसी खेत में नजर आ रहे हैं, सड़क किनारे के पेड़ों पर एक अजीबोगरीब उदासी पसरी हुई है. उनके पत्तों को धूल ने मैला कर दिया है. जब-जब कोई ट्रक हॉर्न बजाते हुए पास से गुजरता है, पेड़ मानो सिहर उठते हैं.

शहर के बीच जितने पेड़ों पर नजर जाती है, सब के सब एक अजीब-सी चुप्पी में डूबे हुए दिखते हैं. कोई भी खुशमिजाज नजर नहीं आता. लगता है कि वे शोर से डरे-सहमे हैं और उनके धूल से भरे पत्ते स्वच्छ होने की आकांक्षा लिए सिर झुकाए आकाश से प्रार्थना कर रहे हैं. शहर की छतें भी अनायास ध्यान खींचती हैं. छतों पर गमले हैं. गमलों में फूल लगे हुए हैं. लेकिन ज्यादातर फूल कुम्हलाए हुए ही नजर आ रहे हैं. समझ नहीं पा रहा हूँ कि इतनी ऊँचाई के हासिल होने के बाद भी उनके चेहरों पर इस क़दर मायूसी क्यों है.

वापसी में बस स्टैंड के पास के एक पेड़ पर नजर गई. वह बेचारा अभी चार-पाँच साल का ही होगा. लेकिन उसके पूरे शरीर पर व्यवसाय के विज्ञापन के लिए न जाने कितनी ही कीलें ठोंक-ठोंककर पोस्टर टांग दिए गए हैं. 

न जाने क्यों लौटते वक्त फिर उसी पगडंडी पर हो लिया. लगा कि वह बरगद और बगीचे पेड़ शहर में बसे अपने परिजनों का हालचाल पूछ रहे हों. मैं क्या कहता ! चुपचाप सिर नीचे किए चलता रहा.  


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