उपेक्षा दूर के ढोल और नजदीक के दृश्य में भेद

गांव , , बुधवार , 16-08-2017


Upeksha dur ke dhol aur nazdik ke drishya

मिथिलेश राय

(गाँव का पता : देश का ऐसा कोई भी गाँव हो सकता है जो बुनियादी सुविधाओं की राह देखते-देखते अब थक कर रोजमर्रा के उलझन में उलझा हुआ है. महादलित टोला लालपुर मात्र एक उदारण है.)

 

सच्ची! दूर के ढोल बड़े सुहावन लगते हैं. कई बार तो दूर के दृश्य भी इतने मनोहर होते हैं कि हम उसे निहारते नहीं थकते. लेकिन नजदीक जाकर वही आवाज और वही दृश्य आँख और कान पर हाथ रखने को मजबूर कर देता है.

जैसे यहाँ इस टोले में अपने दरवाजे पर कोई कुर्सी लगाकर बैठे और पूरब की तरफ निहारे तो एक भरी-पूरी हरियाली उनकी आँखों में समाने लगेगी. बाँसों के विशाल झुरमुट और आम, शीशम, जामुन आदि के बड़े-बड़े पेड़. वृक्ष और बाँस ने मिलकर एक बड़ा मनोरम दृश्य रच डाला है. खेतों में पसरी हरियाली के बाद यह नजारा अद्भुत लगता है. कोई और देखेगा तो देखते नहीं थकेगा. लेकिन सच्चाई कुछ और ही है. सच्चाई पर नजर जाएगी तो मन में एक विरक्ति, खीझ और आक्रोश जैसा जन्मने लगेगा. क्या है कि इस मनभावन हरियाली ने एक बड़े से टोले की बेबसी पर पर्दा सा डाल दिया है. यहाँ हरियाली एक पर्दे के मानिंद हो गया है जिसके पीछे बसी एक भरी-पूरी बस्ती हठात् किसी को नजर ही नहीं आती. बस हरियाली ही हरियाली नजर आती है. जो लोग टोले की बदहाली को देखकर आह-आह करते, वे लोग टोले के आगे की हरियाली को देखकर वाह-वाह करके निकल जाते हैं.

सावन माने अगस्त में जब बारिश गिरती है तो हरियाली और अधिक घनघोर हो जाती है. इसी के साथ टोले की बदसूरती अपने चरम पर पहुँच जाती है. जो पानी सारी चीजों को साफ करता है, यहाँ आकर वह जीवन को जहालत से भर देता है.

महादलित टोला लालपुर के बारे में कहा तो यही जाता है कि यह भी उतनी ही पुरानी बस्ती है जितनी नहर से पश्चिम की ब्राह्मणों की बस्ती. या पश्चिम-दक्षिण नोनिया की बस्ती या पश्चिम-उत्तर यादवों की बस्ती. लेकिन सरकारी सुविधाएं दसकों से यहाँ आने से पहले ही रास्ते में ही खर्च हो जाती हैं. इधर राज्य सरकार की तरफ से महादलित बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए बस्ती के एक नौजवान को टोला सेवक की नौकरी दी गई है. टोले के टोला सेवक अखिलेश सादा हैं. उन्हें काम के सिलसिले में यहाँ-वहाँ जाना पड़ता है और पढ़े-लिखे लोगों सहित अफसर वगैरह से भी मिलना पड़ता है. बाकि दुनिया को देखकर वे घोर आश्चर्य से भर उठते हैं. कहते हैं, 'सहसा विश्वास नहीं होता कि हमारा वार्ड सदस्य से लेकर राष्ट्रपति तक एक ही हैं.' वे आगे कहते हैं, 'बगल के दोनों टोले में अस्सी के दसक से बिजली है, सड़क है. लेकिन हमारे हिस्से की बिजली और सड़क पता नहीं कहाँ गुम हो गई है. यहाँ तक आ क्यों नहीं रही है?'

किसी शहर के बगल के गाँव को शहर के बनिस्पत अपनी नगण्य सुविधा देखकर उतना दुख नहीं होता होगा, जितना बगल के सुविधा-संपन्न गाँव की ओर देखकर मन मायूस हो जाता होगा. एक गाँव किसी शहर से अपनी तुलना नहीं करता होगा. लेकिन एक गाँव दूसरे गाँव की देखादेखी क्यों नहीं करेगा भला!

नहर के उस पार के टोले में चलने के लिए अच्छी सड़कें हों और रात के अंधेरे से लड़ने के लिए बिजली की सुविधा भी. लेकिन नहर के इस पार का जीवन अब भी अगर पगडंडी और ढिबरी के सहारे चल रहा हो तो आवाज में तल्खी आ ही जाएगी.

आठ सौ से ऊपर की आबादी वाले इस टोले का जीवन बारिश के दिनों में दुनिया से लगभग कट जाता है. राज्य-मार्ग से जोड़नेवाली एक कच्ची सड़क तो थी लेकिन सन् 2008 की प्रलयंकारी बाढ़ ने उस सड़क का वजूद मिटा कर रख दिया है. तब से लेकर अब तक जन प्रतिनिधियों का ध्यान तो कई बार उन पर गया है लेकिन नौ वर्ष बीत गए, काम में हाथ नहीं लगाया जा सका है.

यही हाल बिजली का है. राज्य सरकार घर-घर बिजली पहुँचाने के लिए भरसक प्रयास कर रही है, जिसके कारण जिन गाँवों में कभी भी बिजली नहीं थी, आज उनकी भी रातें चकाचक बीत रही हैं. लेकिन इस टोले में आकर यही योजना धराशायी दिख पड़ रही है. फोर जी के इस एंड्रॉयड जमाने में यहाँ के बाशिंदों को अपना बिना कोई जी वाला सिंपलसेट मोबाइल चार्ज करने के लिए झोपड़ी की छतरी पर तीन से पाँच सौ रुपए तक के सोलर प्लेट टांगने पड़ते हैं. शाम घिरती है तो ढिबरी की मध्यम रौशनी में जीवन चलने लगता है. लालटेन यहाँ कोई-कोई ही जलाता है, यह ज्यादा तेल पीता है. गरीब आदमी इतना तेल कहाँ से लाएगा.

बिजली नहीं रहने के कारण टोले में छतरी वाले टीवी का सपना देखना आज भी जैसे कोई मजाक है. छठ या कोशी-पूजा वगैरह के अवसर पर ये चंदे कर के पर्दे लगाकर एक-दो रात जगकर मनोरंजन कर लेते हैं.

टोले के बच्चों में पढ़ने के प्रति गजब का उत्साह देखने को मिलता है. एक-डेढ़ किमी पश्चिम अवस्थित प्रारंभिक विद्यालय में पढ़ने जाने के लिए जब ये घर से निकलकर पंक्तिबद्ध होकर मेड़ पर चलते हैं तो यह दृष्य भी अनूठा लगता है. लेकिन इस अनूठे दृश्य का सावन-भादों के दिनों में लोप हो जाना खेत-मेड़ को जरूर खलता होगा. स्कूल तक जाने के रास्ते बरसात के इन दिनों में डूब से जाते हैं, जिसके कारण नौनिहालों की शिक्षा बारिश भर ठहरी रहती है. n

(लेखक ग्राम्य जीवन के चितेरे हैं.)

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