पेड़ों की छांव में राह अगोरता गांव

गांव , , मंगलवार , 31-10-2017


The road ahead in the shade of trees

मिथिलेश कुमार राय

कक्का की माने तो किसी भी पेड़ में उसका पूरा परिवार बसता है. कक्का कहते हैं कि पेड़ का तना जो कि जड़ से निकलता है, परिवार का बुजुर्ग मुखिया होता है. उसकी डालियाँ उस परिवार के युवा सदस्य होते हैं और टहनियां नन्हें-मुन्ने बच्चे. वे कहते हैं कि जब कभी किसी पेड़ से एक भी डाली या टहनी को काटा जाता है तो उसके आसपास एक अजीबोगरीब उदासी छा जाती है. सच! वो अमरूद का पेड़ पहले एक भरा-पूरा परिवार की तरह दिखता था. लेकिन अब कितना सूना-सूना सा लगने लगा है. मायूसी-सी छाई है वहाँ. 

क्या है कि इधर हवा कुछ तेज बहने लगी है. वह बादल को यहाँ से वहाँ लखेद भी रही है. वैसे यह अमरूद के पकने का भी मौसम है. 

उधर दरवाजे के आग्नेय-कोण पर अमरूद का एक पेड़ है, जड़ से फुनगी तक फलों से लदा हुआ. इसकी एक डाली पर बाकी की तीन डालियों से अधिक फल आए थे. इस कारण वह झुकती जा रही थी ..... झुकती ही जा रही थी. अचानक परसों देर शाम हवा अपनी ताकत आजमाने लगी. बादल भी जोर-शोर से बरसने लगा. डाली हिम्मत हार गयी. अब जब उस पेड़ पर नजर पड़ती है तो वहाँ कुछ सूना-सूना सा लगता है. जब पेड़ की टूटी डाल पर नजर जाती है तब बात समझ में आती है कि क्या खटक रहा है. 

कक्का कहते हैं कि वृक्षों की अंधाधुंध कटाई के पीछे गाँव का हाथ कभी नहीं रहा. गाँव तो बिना पेड़ के रह ही नहीं सकता. पेड़ सदियों से इसके प्राण की तरह रहते आए हैं. अगर गाँव ने अपनी आवश्कता के लिए कभी एक पेड़ को काटा है तो उसके बदले में पाँच पेड़ लगा भी दिया है. यह गाँव की ही परंपरा है कि वह आने वाली पीढ़ी के लिए कुछ फलदार पेड़ के पौधे रोपता रहता है. गाँव ने इस इक्कीसवीं शताब्दी और सुपर कम्प्यूटर युग में भी बगीचे की परंपरा को जीवित रखा हुआ है. किसी के पास खेत न हो तब भी गाँव के हर दुआर पर आम या लीची या कटहल या अमरूद के पेड़ डोलते दिखाई देते हैं. खेत के अगल-बगल बाँसों के झुरमुट और उसमें जलेबी और जामुन के विशाल-विशाल पेड़ चाह कर भी गांव से कभी विलुप्त नहीं हो सकते. गाँव ही है कि जहाँ कहीं भी देवताओं को प्रतिष्ठित किया जाता है वहाँ बरगद या पीपल का पेड़ लगाकर उस पर जल अर्पित करना शुरू कर देता है. 

कक्का कहते हैं कि पेड़ लगाकर संतान की तरह उसकी देख-रेख करना - यह गाँव का ही रीति-रिवाज है. घर के बच्चे आम या अमरूद या कटहल या लीची के लिए किसी के दरवाजे पर जाकर दुत्कार सुने, यह बात गाँव को रास नहीं आती हैं. इसीलिए गाँव हर पीढ़ी को यह सीख देता है कि वह अपनी आनेवाली पीढ़ी के लिए कुछ फलदार पेड़ के पौधे अवश्य रोपे. 

अब दुनिया बदल रही है तो गाँव भी इससे अछूता नहीं रहा. लेकिन पेड़ लगाने का क्रम नहीं टूटे, गाँव ने इसका भी रास्ता निकाल लिया है. वह अब व्यवसायिक पेड़ भी लगाने लगा है ताकि बीस-पचीस साल बाद उनकी संतति को इन पेड़ों से कुछ आमदनी भी हो सके. गाँव अब सागवान, महोगनी, लिप्टस और कदंब के पेड़ लगा रहा है. लेकिन इन सब के बीच आम की नई प्रजाति भी बीच में जगह बना लेती है. 

कक्का के साथ गांव भी राह अगोर रहा है कि लोग आएँ और यहाँ पेड़ों से बोले-बतियाएँ. 


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