अनाज पर ही नाज है

गांव , , सोमवार , 13-11-2017


The proud on just on grain

मिथिलेश कुमार राय

कक्का के चेहरे पर थोड़ी सी उदासी का भाव मंडरा रहा था. कह रहे थे कि अबकी जो बाढ़ आई थी उसमें आधे धान के बिचड़े बह गए थे. जो बच गए हैं, उनसे साल भर का भोजन भी पूरा नहीं पड़ेगा. दूसरी फसल का इंतजाम, लेन-देन और पर्व-त्योहार कैसे होगा कुछ समझ में नहीं आ रहा. कहने लगे कि किसी के पास नौकरी होती है तो किसी के पास व्यापार. बाढ़-अकाल का उन पर क्या फर्क पड़ता होगा. लेकिन एक किसान के पास क्या होता है ..... बस कुछ बीघे की खेती. लेकिन बारिश खूब हुई तो फसल चौपट और बारिश नहीं हुई तो फसल चौपट. बाढ़ आ गई तो फसल चौपट और खड़ी फसल झुलस गई तो फसल चौपट. बीज खराब निकले तो फसल चौपट. और समय पर खाद नहीं मिला तो सब चौपट. खेत-किसान पर बस आफत ही आफत रहता है.

गांव में यह धान का मौसम होता है. खेतों में लगी धान की फसल का दृश्य जरा हट के होता है. तने हुए बिचड़े का शीश झुका हुआ होता है. पके धान के लहराते पौधों को कोई गैर भी देख लेता है तो उसका मन प्रफ्फुलित हो जाता है. फिर जिसके खेत हों, वे क्यों नहीं आनंदित रहे हमेशा. यह मौसम भी तो कितना खुशगवार रहता है. न गर्मी, न जाड़ा. एकदम वातानुकूलित-सा.लंबे त्योहार के मौसम के बाद गांव में यह धान की कटाई और उसके बाद गेहूँ की बुआई का मौसम हो जाता है. लेकिन कक्का की बातें... . उफ़्फ़् !

कक्का की बातें सुनकर मुझे कुछ याद आ गया. पिछले दिनों मैं एक किसान से मिला था. वो मुझे बस में मिला था और मेरा हमसफर था. जब मैं बस में चढ़ा था वे एक सीट पर उकड़ूं बैठे हुए था. मैं भी उनके बगल में जाकर बैठ गया. थोड़ी बातचीत हुई तो पता चला कि वो मेरे बगल के गाँव का ही है. मैंने पूछा कि कैसी चल रही है तो कहने लगा कि पता नहीं क्या बदा है हमरी किस्मत में कुच्छो पते नहीं चलता है. असल में वो एक छोटा किसान था और अबकी कटनेवाली फसल को लेकर उसके पास सिर्फ निराशा का ही भाव था. हालांकि परेशानी का कारण एक यही नहीं था. क्योंकि एक किसान की जिंदगी में तो यह सब लगा ही रहता है. बात यह थी कि उसकी बड़ी बेटी ब्याह के योग्य हो रही थी और वह कुछ-कुछ पैसे जोड़ते आ रहा है. लेकिन अबकी फसल का मुंह देखकर उसको लग रहा था कि इस बार कुछ भी नहीं जोड़ पाएगा. ऊपर से गांठ के पैसे में से कुछ खर्च ही हो जाएगा. 

कहने लगा कि बबुआ, लाख आफत के बावजूद भी एक यही अनाज ही तो है जिस पर पूरे परिवार को नाज रहता है. अब देखो तो, पिछले महीने की जो आँधी आई थी न, दरवाजे की बैठकी उसी में धराशाई हो गई थी. आँगन की छपरी, जिसमें सुबह-शाम चूल्हा जलता है, महीनों से एक ओर झुकी जा रही है. बाँस के घर की यही कथा-व्यथा रहती है. हरेक तीन साल पर सड़-गल कर मिट्टी में मिल जाता है. घर-परिवार के और पता नहीं कितने बिगड़े काम सुधार की मांग करते-करते विस्मृत कर दिये जाते हैं, क्योंकि जिस फसल से ढेर सारी उम्मीदें लगी रहती हैं वो फसल दरवाजे तक आने से पहले ही मौसम या विसंगतियों की भेंट चढ़ जाती हैं. लेकिन अबकी घर-द्वार वाला काम कैसे भी करके करना ही पड़ेगा. कभी कोई मेहमान आ जाता है अचानक से तो चेहरे पर लाज पसर आती है. 

फिर उसको कुछ और याद आ गया और खुलकर बताने लगा. देश के किसान कितने होते ही सरल और सच्चे कि जरा-सा अपनापन मिलते ही उनका हृदय खुल जाता है और अंदर का सब कुछ बहने लगता है. वह हँसकर बताने लगा कि कल छोटकी फटे-चिटे फ्रॉक दिखा रही थी कि वह कहाँ-कहाँ से फट गया है. सुनकर घरनी भी अपनी साड़ी का हाल गिनाने लगी. कहने लगी कि अबकी पक्का नैहर भाग जाऊंगी. सुनो, तुम भी एक कुर्ता सिला लेना. मुड़ा-तुड़ा पहन कर चल देते हो कहीं भी न्यौता निभाने. हमको बहुत बुरा लगता है और तुम पर गुस्सा भी आता है. 

हाँ-हाँ, सबको पता है कि अब धान कट कर द्वार लगने ही वाला है. सबका नाज उसी से जुड़ा है. का करें, जो है सो ऊहे है. जो होएगा सो ऊहे से होएगा. जब नहीं होएगा, तो तब का तब देखा जाएगा. जैसे हमको फसल से और फसल को खेत और मौसम से उम्मीदें रहती हैं न, उसी तरह परिवार के लोगों की उम्मीदें भी मुझसे ही जुड़ी रहती हैं. सबको हरियाली दिखाकर खुश रखना पड़ता है बचवा ! 


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