गिरवी होती रौनक

गांव , , बृहस्पतिवार , 29-03-2018


Plagiarized rock

मिथिलेश कुमार राय

एक दिन कक्का कह रहे थे कि गांव में सब कुछ तो है लेकिन वह रौनक नहीं है जिसको देखकर मन हरा हो जाए. त्योहार के दिनों भी इसकी उदासी पर कोई खास असर नहीं पड़ता. कक्का कहते-कहते कक्का कहने लगे कि रौनक आए भी तो कहाँ से. वह जिनसे रहती थी वे तो शहर में जाकर वहां की रौनक बन गए.  

जब कक्का यह सब कह रहे थे, मुझे हठात् एक कविता याद आ गई जिसको मैं दसेक वर्ष पहले तो पढ़ा था लेकिन महसूस अब कर रहा था. कविता में कवि लंबे समय के बाद कुछ दिन की छुट्टी पर अपने गांव आता है तो अजीब-सा महसूस करता है. वह गांव में एकांत की शांति नहीं, खालीपान की उदासी से भर जाता है. वैसे एक पल को उसे यह भी लगता है कि चूंकि वह शहर के कोलाहल से निकलकर आया है इसलिए ऐसा लग रहा है. लेकिन सच को कब तक ढँक कर रखा जा सकता है. खालीपन के रहस्य पर से पर्दा उठ जाता है. उसे पता चल जाता है कि जिन युवाओं से यहाँ रौनक रहतीं वे तो यहाँ हैं ही नहीं. जो बहुएं हैं वो चहारदीवारी के अंदर हैं और बुजुर्ग हैं जो अपनी सेहत की फ़िक्र में परहेज बरत रहे हैं. कुछ बच्चों को कवि देखता है लेकिन वे भी पढ़ाई-लिखाई में डूबे नज़र आते हैं. कवि अपनी कविता में उन दिनों को दर्ज करता है जब वह जवान हो रहा था और रोजी-रोटी के चक्कर में शहर की शरण में नहीं गया था. तब उसकी उम्र के दर्जनों लड़कों के हो-हो हा-हा से गांव गुलजार रहता था. 

कक्का कह रहे थे कि किस घर में दो-चार जवान लड़के नहीं हैं. लेकिन एक भी तो नहीं रहा यहाँ. कोई इस शहर चला गया है कोई उस शहर, सब अपने-अपने जीविकोपार्जन की तलाश में. कुछ तो वहीं बस जाने के जतन में जुट गए हैं. कोई त्योहार आता है तो कुछ आते हैं और गाँव में कुछ दिन के लिए रौनक पसर जाती है. कक्का कहते हैं कि अब गांव का चेहरा भी कितना साफ-सुथरा नज़र आता है. सड़क बन गई है. बिजली आ गई है. और भी तमाम तरह की सुविधाएं मिलने लगी हैं यहाँ. कभी-कभी लगता है कि शहर ही आकर बस गया है यहाँ. लेकिन इतना सब होने के बाद भी उदासी की यह छाया जैसे यहाँ डेरा जमा कर बैठी रहती है.

कक्का को लगता है कि शहर अपनी रौनक के लिए अपनी उदासी को यहाँ ठेल देता है. यहां की खिलखिलाहटों को प्रलोभन के जादू में फांस कर वहां खींच लेता है. कक्का की माने तो शहर एक बहुत बड़े जादूगर का नाम है जिसके पास रोजगार का इतना बड़ा जादू है कि सारे मजबूत हाथ और तेज दिमाग उस और दौड़ पड़ते हैं. 

कक्का उदास हो इस बात को मानते हैं कि आज सब कुछ होने के बावजूद गांव के पास उसके अपने जवान हाथों को देने के लिए रोजगार नहीं है जिसके कारण वे शहर की शरण में जा कर गिड़गिड़ाने लगते हैं. बदले में शहर एक रोजगार का टुकड़ा तो उसके आगे जरूर उछाल देता है लेकिन वह समूचे गांव की रौनक को गिरवी रख लेता है. कक्का कहते हैं कि दो-चार छोटे-मोटे रोजगार हैं भी गांव के पास तो अब चमकती निगाहों में वे नहीं सुहाते. खेत की फसल के भरोसे आसमान छूने और पशुपालन करके अपनी तमाम इच्छाएं पूरा करने का सब्र हमसे यह शिक्षा छीन ले रही है. बोलते हुए कक्का को शिक्षा पर कुछ याद आ जाता है तो वे और अधिक दुखी हो जाते हैं. कहने लगते हैं कि ये किस तरह कि शिक्षा दी जा रही है कि खेतीबाड़ी करने वाले किसान को सही नजर से नहीं देखा जा रहा. कक्का की आँखों में झाँका तो लगा मानो वे पूछ रहे हों कि किसान को अन्नदाता कहना महज रस्मअदायगी तो नहीं. 


Leave your comment/अपनी प्रतिक्रिया दे