दिवाली पर आवेंगे परदेसी बालम...

गांव , , शनिवार , 14-10-2017


On diwali Will come Pardesi Balam

मिथिलेश कुमार राय

कक्का कहते हैं कि दिवाली के दिन रामजी घर लौटे थे. वह अमावस्या की रात थी. घोर अंधकार. पर राम के लौट आने की खुशी में लोगों ने इतने दीपक जलाए कि वह अंधेरी रात सौ पूर्णिमा पर भारी पड़ने लगी. 

कक्का का बेटा भी दिवाली पर लौट आता है. वह पंजाब में कमाता है. कक्का कहते हैं कि सारे बेटे अपने घर परिवार के लिए राम जैसा ही होते हैं. लेकिन इनकी सीता यहीं रह जाती है. राम चले जाते हैं. लक्ष्मण भी किसी दूसरे शहर में कमाने निकल जाते हैं. लेकिन जब ये लौटते हैं तब खुशियाँ आँखों से आंसू और होठों पर खिलखिलाट के रूप में फूट पड़ती हैं. वे कहते हैं कि दिवाली एक प्रतीक्षा के खत्म होने पर उत्सव मनाने का त्योहार है. 

जीवन की माँ कह रही थी कि वो भी दिवाली में आएगा. छठ तक रहेगा फिर चला जाएगा. कह रही थी कि अबकी जाते बखत घी ले जाएगा. वहाँ शुद्ध दूध तो नसीब नहीं होता, कम से कम घर का घी तो खाने को मिलेगा. घी रहता भी तो लंबे समय तक है. जब-जब खाएगा गाँव-घर की खुशबू महसूस करेगा.

जीवन ने यह बात दो महीने पहले ही बता दिया था कि वह दिवाली में आएगा. तब से दिवाली के दिन अंगुलियों पर गिने जा रहे हैं. अब तक तो दो किलो गाय का घी भी तैयार हो गया है. जीवन तमिलनाडु में सेलम के एक कपड़ा फैक्ट्री में काम करता है. उसको वहाँ उसके बहनोई ले गए थे. बहनोई भी दिवाली पर घर लौटेंगे. जीवन कह रहा था कि दिवाली में बहुत सारे लोग घर लौटेंगे. दिवाली के नाम पर मालिक भी मान जाता है. सब ने तीन महीने पहले ही टिकट ले लिया है.

गाँव-जवार का यही सच है. रोजी-रोटी की तलाश में परदेश कमाने गए लाखों लोगों के लिए दिवाली लौटने का मौसम होता है. इस मौसम की बाट इनके परिजन महीनों पहले से जोहते रहते हैं. जैसे-जैसे दिन नजदीक आता जाता है दिल की धड़कन और आँखों की चमक बढ़ती जाती है. 

दिवाली का दिन आँचल को खुशियों से भर जाने के लिए आता है. दिवाली आती है तो चेहरे की उदासी लुप्त हो जाती है. दिवाली का दिन जैसे-जैसे पास आता है रात निस्तब्ध होने लगती हैं. तब फुसफुसाहट भी ठहाका-सा गूंजती है और दबी-दबी सी मुसकुराहट खिलखिलाट बनकर फूट पड़ती हैं. इन सबका गवाह दियरखे की ढिबरी होती हैं.

रोजी-रोजगार के चक्कर में सालों साल अपने घर-परिवार से दूर रहनेवाले कलेजे के टुकड़े और मांग के सिंदूर के पास दिवाली से छठ तक लौट आने के सपने होते हैं. वे इस सपने को पूरे साल देखते हैं. जब आते हैं, घनी अंधेरी रात में दिव्य उजाला फैल जाता है. रौशनी आँखों से बरसने लगती हैं और दिल में फूलझरियाँ छूटनें लगती हैं. हुक्का-पाती जलाकर और देह सेंककर गाँव लौट आनेवाले परदेसी जत्था बनाकर बड़े-बुजुर्गों से मिलने उनसे आशीष लेने घर-घर की ओर निकल पड़ते हैं.

कहते हैं कि जीवन में दुआओं के बड़े मायने होते हैं. मैंने एक कविता पढ़ी थी जिसमें कहा गया था कि शुभकामाएं मनुष्यों को संतापों से बचाती हैं. दुनिया में त्योहारों के अवसर पर शुभकामनाओं और बधाइयों का सिलसिला शायद मनुष्य की इसी आकांक्षा को दर्शाता है. 

वैसे रात में प्रणाम करना और आशीर्वाद देना वर्जित माना जाता है. लेकिन दिवाली की रात के लिए यह बंधन नहीं है. जत्था बनाकर निकलते परदेसी घर-घर जाकर बूढ़ी माई और बूढ़े बाबा सहित अपने से सभी बड़ों को पैर छूकर प्रणाम करते हैं और युग-युग जीने और सदैव खुश रहने का आशीर्वाद बटोरते हैं. यह प्रक्रिया आधी रात तक अनवरत चलती रहती है. 


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