बाढ़नामा

गांव , , शनिवार , 16-09-2017


Flooding

राजीव मित्तल

मुजफ्फरपुर से...

जब तब देता रहूंगा तेरह साल पुरानी बाढ़ की विभीषिका की कहानी ….. जिसका कंटेंट हर बार 

एकसा ही रहना है …..

उनका आना,  उनका जाना

बाढ़, नेपाल से ढेरों पानी, जहां-तहां लटक कर दिन काटना, ऊपर से हेलीकॉप्टर की घर्र-घर्र, बगल में बैठ फन काढ़े सांप, सरकार, प्रशासन और नेताओं की नौटंकी टाइप जद्दोजहद, पानी के बीचो-बीच हुई औलाद का सुख, गीली लकड़ियों की चिता पर पिता का शव और तटबंध से वापस लौटने पर झोंपड़ी की जगह पानी में टांग उठाए पड़ा छप्पर - इहलोक की इतनी सारी लीलाओं से कदमताल मिला पाता कि वो भी आ गए.

मोटरकार में रंगीन चश्मे के साथ मुंह में लगी सिगरेट हाथ में ले पूछा - कहां है बाढ़ ? 

चीथड़ों में लिपटी काया ने कहा - सर जी पानी उतर गया.  

- हम तो बाढ़ देखने आए थे, जब पानी ही नहीं तो बाढ़ कैसी और कैसा नुकसान. आप लोग इसी तरह हर साल परेशान करते हैं हमें. 

तभी उनके कान में जिले का आला अफसर फुसफुसाया. उन्होंने सिगरेट का जोरदार कश लगाया. पहले मुंह से और फिर नाक से धुआं निकालने के बाद उसी काया के साये से पूछा -क्या क्या नुकसान किया उस बाढ़ ने ? 

- सर जी, घर ढह गया. 

- कब की बात है ? 

- यही कुल जमा सात दिन पहले की. 

साहब ने चारों तरफ सिर घुमा के देखा तो तो समझ गए कि नया छप्पर डालने की चाह में अपना पुराना छप्पर खुद ही 12 मीटर दूर पसरे पानी में फेंक दिया होगा.

- दलदल को बाढ़ कहता है मरदूद ! अच्छा यह कंधे पर क्या टांगे हो? बदबू मार रहा है, खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा. 

- बापू की लाश है सर जी. 

- तो अब तक फूंका क्यों नहीं ? 

- सूखी लकड़ी नहीं मिल रही है सर जी. 

- तो मिट्टी का तेल छिड़क देते. 

- वो जब राहत आएगी तब मिलेगा. 

- अब तक इसको राहत क्यों नहीं मिली डीएम ? 

- सावंत जी, इस आदमी की डिमांड जरूरत से ज्यादा है. मसलन हमने छप्पर डालने को 75 पैसे दिये, पर यह डेढ़ रुपये मांगता है. हमने इसे 20 मिली लीटर मिट्टी का तेल दिया, यह एक लीटर मांगता है. हवन कुंड में लकड़ी दी, तो श्मशान के लट्ठे मांगता है. 50 ग्राम आटा, 15 ग्राम शक्कर, दो मोमबत्ती, ढाई सौ ग्राम चूड़ा दिया, पर यह सब डबल में चाहता है. 

डीएम ने बगल में दबी फाइल में से एक कागज निकाला - सावंत जी, देखिये कागज पे आंकड़ेवार सब दिया हुआ है, जापान से दवाइयां आ जाएं तो सब एकसाथ इन्हें पहुंचा दिया जाएगा.

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कल्याणकारी राज्य की यही खासियत है कि वह बड़ी से बड़ी विपदा को हंसते-खेलते झेलने की प्रेरणा जगाता है. वह उम्मीद करता है कि कष्ट में पड़ी उसकी दुलारी जनता सारे दुख-दर्दों का सामना होंठ भींच कर करे बाकी राम भली करेगा. 

यही तो वक्त है अपने नेताओं की कारगुजारियों में विश्वास बनाए रखने का कि मारेंगे भी तो छांव में ही. सब तरफ से आवाज उठ रही है कोई भूख से न मरने पाए. अगर एक भी बगैर खाए उठ गया तो नाप दिये जाओगे. ये पत्तलों के गट्ठर, अनाज की बोरियां, शाक-भाजी के ढेर और फिर चलते समय चार-चार लड्डू सब बेकार जाएंगे क्या. इसलिये बाढ़ पीड़ित जनों थोड़ा सा इंतजार कर लो, बस आने ही वाला है. 

अब अगर सीताराम मंडल सांप के काटे से मर गया तो ऐसी मौतें तो हादसा होती हैं, इन्हें जुबान पे क्या लाना. शिवमूरत कामत की 12 साल की और अर्जुन कामत की तीन साल की बेटी डूब मरी तो इसमें प्रशासन का कोई दोष नहीं. जब बाढ़ से घिरे हो तो कोई न कोई लहर तो डुबोने को उछलेगी ही. अग्नि, जल और वायु - ये तीनों प्रकृति के कंट्रोल में हैं, इनमें इंसान का क्या दखल! शास्त्र भी यही कहते हैं. लेकिन हम फिर कह रहे हैं कि भूख से कोई मरने नहीं पाएगा. चाहे जिसकी सौगंध ले लो.

- ठीक है न! सर, मीटिंग का टाइम हो गया है. 

- सब आ गये? 

- उनको छोड़ सब आ गये. 

- अरे, अगर वह आ भी जाते तो कौन सा हल जोत देते, चलो. 

मीटिंग खत्म होते-होते राजमार्गो पर दो-दो इंच पानी और बढ़ गया था. सांप के काटे से पांच और डूब कर मरने वालों में दस का इजाफा हो गया. पर संतोष की बात तो यह है कि कोई भूख से नहीं मरा. 

- लेकिन साहब जी, अगर नावों का इंतजाम रहता तो परमेश्वर सहनी तो जरूर बच जाता. 

- जीवन-मरण सब ऊपर वाले के हाथ में, हम कौन होते हैं बचाने वाले. तुम बात कर रहे हो नावों की तो देखो जाकर दरभंगा में. वहां एक-एक नाविक हजारों कमा रहा है. सब पे इनकम टैक्स ठुकवाना है.

आज की मीटिंग में तय हुआ है कि एक कमिटी बना कर राहत के लिये भेजे जा रहे सामान की निगरानी की जाएगी. उसमे ये भी होंगे, वो भी होंगे. हम सब होंगे. इस कमिटी के बन जाने के बाद राहत और बचाव कार्यों में चुस्ती आ जाएगी. प्रशासनिक अधिकारियों से जो छीन-झपट चल रही है उसको रोकना बहुत जरूरी है. एक मंत्री जी तो कई बार पिटते-पिटते बचे हैं. 

अबकी 15 अगस्त पर याद दिलाना - हम लोगों से अपील करेंगे कि वे भारतीय संस्कृति को कलंकित करने वाला कोई काम न करें.

पानी में डूबते-उतराते रिश्ते
अब सब ठीक हो गया है. यानी बाढ़ पीड़ितों का दुख-दर्द मिलजुल कर परखा जाएगा. ये झड़प और तल्खियां तो राजनीति में चलती ही रहती हैं. चाहे सीटों का सवाल हो, कुर्सी का सवाल हो या फिर बाढ़ पीड़ितों को राहत पहुंचाने का. नाराजगी का इजहार कर दिया, मन की सारी खटास जाती रही. संवादहीनता और संवेदनहीनता जैसे विषाणु डीडीटी के एक छिड़काव में धराशायी. वैसे भी बाढ़ अब कन्फ्यूज़ नहीं कर रही है. जहां-जहां उम्मीद थी, आ गयी है. इसको छोड़ उसको धर वाला हाल नहीं रह गया. सभी नदियां मग्न हैं. अगर नेपाल पानी न छोड़े और मूसलाधार बारिश अब कुछ दिन न हो तो मां कसम यह बाढ़ोत्सव तो भली-भांति निबट ही जाएगा.
उसके बाद फिर वही धान के लहलहाते खेत, उन खेतों में लोकगीत गाती महिलाएं, मधुबनी की पेंटिंग, सीतामढ़ी का जानकी विवाह, दशहरा-दीवाली, ईद और फिर वो सोनपुर का मेला. वही पुराने दिन लौट आएंगे. फिर चुनाव भी तो ज्यादा दूर नहीं. एक पार्टी के आलाकमान ने तो अभी से अपने कार्यकर्ताओं को फरमान भेज दिया है कि देखो लोकसभा चुनाव में तो हम सभी गफ़लत में पड़े रह गए, पर अबकी बार कंधे से कंधा टकराना है. बाढ़ की सौगात सामने है क्या देखता है लक्ष्य पे निशाना साध. घबरा मत होम्योपैथी का सिद्धांत समझ कि जब रोग पूरी तरह फैल जाए तो समझो रोगी चंगा होना शुरू. अब बाढ़ कितनी और आएगी? एन-एच 31 और 57 पर पानी कितना बढ़ेगा! एकाध फुट और चढ़े तो कर क्या लोगे पानी को तो वापस नदी में ही जाना है. जो रुक जाएगा, वो डुबोएगा नहीं. 
जिनकी जीवनी शक्ति कम होगी वो उस एकाध फुट पानी को भी नहीं झेल पाएंगे. क्योंकि रुके पानी में सिंघाड़े या मखाने तो उगाए नहीं जा सकते. बीमारी फैलाता है कम्बख्त.
जिला प्रशासनों और नगरनिगमों के जो हाल हैं उसके चलते यह पानी अगली बरसात तक काम देगा, जनता के पीने-पिलाने के काम आएगा. 
मुजफ्फरपुर - दरभंगा की सड़क का हाल देख ही लिया, ऐसी फटी पड़ी है जैसे भूकंप आया हो. और वैसे तो सारी सड़कें ही बगैर बाढ़ के चटपट कर रही हैं. महामारियों पर खास ध्यान देने की जरूरत है. 
अस्पतालों में एड्स की दवा डिस्प्रीन तो कालाजार की एनासिन ही बची है. 
वोटरलिस्ट को तो दिमाग में ही बैठाले. बहुतेरे चुनाव सामने पड़े हैं. अब हमने वोट बटोरने के इतने सारे क्लू दे दिये, ध्यान से खर्च करना. समझे ! अबकी बारी हमारी बारी.
अब तो बंद कीजिये बाढ़ को न्योते भेजना
जड़ बुद्धि, लापरवाही, अकर्मण्यता और ऊपर से जेबें भरने और सत्ता और कुर्सी पर बने रहने की धुन - जब शासन और प्रशासन में ये रोग पूरी तरह घर कर गये हों तो बाढ़ विनाशक और संहारक दोनों रूपों में आएगी ही. 
पता चलता है कि बाढ़ का इतनी ही गति से 1987 में हमला हुआ था. स्थानों में भी कोई बदलाव नहीं. इन सतरह सालों में क्या पानी नहीं बरसा, क्या नदियां कमोबेश यही रूप नहीं अपनाती रहीं, क्या बाढ़ का खतरा हर साल नहीं मंडराता रहा, क्या नेपाल हर साल पानी नहीं छोड़ता रहा ? जब एक खतरा शाश्वत बरकार है तो शासन-प्रशासन की चाल बेढंगी क्यों बनी हुई है ? यह सवाल बाढ़ से घिरे एक करोड़ लोग क्यों नहीं पूछेंगे ?
जिन सौ-दो सौ परिवारों के घरों की चौखट सूनी हुई है उनके मुंह से हाय क्यों नहीं निकलेगी ? 
जो पुल-पुलिया अंगरेज बना गए, आज उन्हीं जर्जरों पर हो रही है सत्तावन साल से आजाद देश में जिंदगी और मौत की रेस. रामराज्य लाने के चुनावी दावे भूल कम से कम इतना तो कर दीजिये कि लोग ढंग से सांस ले सकें, चल-फिर सकें और कुछ ऐसा कर दीजिये कि अकाल मौतों का ग्राफ थोड़ा नीचे आ जाए. फिर आराम से वोट लीजिये और सत्ता का सुख भोगिये-किसने मना किया है. 
अब बाढ़ उतर रही है तो मौत और रूप धर कर सामने आ रही है. सरकार ने मान लिया कि लोगों के पास खाने को नहीं. बहुत बड़ी इनायत कर दी जनता पर यह सच स्वीकार कर. पर क्यों नहीं है इसका कोई जवाब ?
इनका जवाब भी किसके पास है कि नदियां गाद से क्यों भरी हुई हैं कि जरा सा भी पानी बरसा तो किनारे तोड़ने लगती हैं ? तटबंध क्यों रेत के भीत बने हुए हैं ? पुल-पुलिया क्यों इतने शर्मनाक हाल में हैं ? नेशनल हाईवे जैसा भारी भरकम सम्मान पाई सड़कें क्यों गूदड़ हुई पड़ी हैं ? 
यह बाढ़ कोई चीन का आक्रमण नहीं है, जिसने दोस्ती की आड़ में छुरा भोंक दिया. यह बाढ़ उस भारतीय मानसिकता का परिचायक है जो ढाई हजार साल से विदेशी आक्रमणकारियों को न्योतती आ रही है. इस मानसिकता पर तो नादिरशाह, अब्दाली और अंग्रेज भी चकित हुए बिना न रह सके. मोहम्मद शाह रंगीले बन कर राजकाज नहीं चलाया जा सकता. हां, इतिहास के पन्नों पर काले मुंह के साथ जरूर पेश हुआ जा सकता है. 
कुछ करने आए हैं और कुछ करके जाएंगे-ये वचन अगर कर्म में लाने हैं तो खगड़िया के पिपराती गांव के अश्विनी मधुकर की सुन लीजिये, बेचारा दो दिन से मारा-मारा घूम रहा है.

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