बाढ़नामा

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Flooding

राजीव मित्तल

मुजफ्फरपुर से...

जब तब देता रहूंगा तेरह साल पुरानी बाढ़ की विभीषिका की कहानी ….. जिसका कंटेंट हर बार एकसा ही रहना है …..

आह, आया बाढ़ का मौसम....

पटने से आवाज उठी - रेड अलर्ट

मुजफ्फरपुर गुर्राया - रेड अलर्ट

दरभंगा में थर्राया - रेड अलर्ट

बेतिया कांखा - रेड अलर्ट

पानी के नीचे से सीतामढ़ी की आवाज आयी - रेड अलर्ट

 

इतने सारे रेड अलर्ट सुन घर में घुस आया पानी उलीचते गोपाल मिश्र ने बगल वाले से पूछा - भैया ई रेड अलर्ट कि होइछै? 

जवाब मिला - इसे सुन बाढ़ घटने लगती है. 

बहरहाल, पराधीनता के बाद आजाद भारत में भी इस सालाना प्राकृतिक उत्सव को सरकारी तौर पर परम्परागत तरीके से मनाया जा रहा है. मजबूर जनता की भागीदारी बढ़ती जा रही है. पहले त्रासदी झेलो और फिर बरबादी-उसकी इस नियती पर सरकार ने भी मुहर लगा दी है.

आम पर बौर लगते ही शासन और प्रशासन स्तर पर खेल शुरू हो जाता है कि इस बार कैसी होगी बाढ़. क्या रंग-रूप होगा गंडक, कोसी, बागमती और उनकी संग-सहेलियों का. कितने मरेंगे, कितने बचाये जाएंगे, इन टुटही नावों का क्या किया जाएगा. विभागों में बाढ़ की विनाशलीला के पुराने रजिस्टर बांचने शुरू कर दिये जाएंगे. पटना से जिलाधीशों के पास आदेश आएगा - जोर से पढ़वाओ अपने कारिंदों से ताकि हमें भी 

सुनायी दे. 

सबसे पहले चर्चा इस बात पर होगी कि बाढ़ ग्रस्त इलाकों का दौरा कैसे किया जाए. ठोस सुझाव तो यही होगा कि हवाई सर्वेक्षण किया जाये, क्योंकि पानी दूर तक फैला दिखायी देता है और आसमान की तरफ ताकते नंग-धड़ंग बेबस, दहशत से भरे भूखे-प्यासे लोगों का झुंड त्रासदी को ज्यादा बेहतर ढंग से दर्शाता है. कार से जाओ तो ये बेवकूफ भीड़ लगा कर घेर लेते हैं. उनका रोना-गाना सुन रात को भूख नहीं लगती. 

खैर, इस बार यह बहुत अच्छा हुआ कि बाढ़ मंत्री और उनके सुप्रीम बॅास दोनों ने मान लिया कि हम बाढ़ नहीं रोक सकते, हां, राहत दे सकते हैं पर वो भी यह देख कर कि बाढ़ का कोप कहां-कहां कितना फूटा और फिर यह भी तो देखना है कि केन्द्र ने कितनी मदद दी. इस नेपाल ने और नाक में दम कर रखा है. ससुर जब-तब पानी छोड़ देता है. यह नहीं देखता कि वो हमसे ऊपर है पानी छोड़ेगा तो हमारे ऊपर ही तो आएगा न. ऊपर से ये हमारी नदियां, बरसात आते ही इनके दिमाग खराब हो जाते हैं. 

अब इसके बाद भुखमरी फैलेगी, महामारी छाएगी, लोग मरेंगे, मीडिया हाय-तौबा मचाएगा. सिर पर कितना टंटा है यह कोई नहीं देखता. यह बाढ़ ठीक-ठाक निपट जाए तो बाबा भोलेनाथ एक मन लड्डू पक्का.

 

वो पानी में इनमें पानी नहीं

 

यह एक ऐसा सालाना तमाशा है, जिसके दर्शक हजारों में और झेलने वाले लाखों-करोड़ों में होते हैं. बाढ़ भी नाचती-कूदती थक-थका कर पैर सिकोड़ लेती है, पर तमाशा देखने वालों का मन नहीं भरता. यही वक्त कुछ करने का नहीं बल्कि कर दिखाने का होता है. सो, प्रशासन की गाड़ियां सर्र-सर्र दौड़ती हैं और नेता-मंत्री आकाश में टंगे होते हैं. 

भूखे-प्यासों का रोना-बिलखना बदस्तूर चलता है क्योंकि उनका दिन चारों ओर लहलहाते पानी को देख दहशत से भरा होता है, पेट में अन्न का दाना नहीं, मां बच्चों को चिपकाए बैठी है कि कहीं वह सरक कर पानी में न चले जाएं, बाप बस ऊपर ही ताके जा रहा है. दिन कट जाता है तो रात पिचाशिनी बन सिर पर तैयार रहती है. पांच दिन पांच रातें या इससे भी ज्यादा समय मौत के पहलू में गुजरता है.

(इतने विशाल पैमाने पर बाढ़ को इतने सारे लोगों के झेलने का रिकार्ड गिनीज बुक में दर्ज नहीं कराया जा सकता है क्या) 

और प्रशासन का काम उनकी तरफ देख उंगली उठाना है - मना किया था न, वहां घर बना कर मत रहो अब हमारी जान खा रहे हो कि नहीं ! पहले से बचने का इंतजाम नहीं कर सकते थे? साथ में आटा-दाल-आलू लेकर नहीं बैठ सकते थे घर छोड़ कर भागते समय? कम से कम पेट में कुछ तो जाता भले कच्चा ही. अब हम यहां से क्या करें, जब बाढ़ अपना कारोबार समेटेगी, तब हम राहत पहुंचा पाएंगे. 

तभी एक आवाज आयी - साहब जी बच्चा बहुत बीमार है एक नाव तो भिजवा दीजिये. 

- मूरख, नाव कहां से लाएं? सरकार ने नाविकों को पिछले कई बाढ़ बचाव कार्यों का उनका पैसा नहीं दिया है इसलिये सब अपनी नाव सिर पर रख कर भाग गए हैं.

- तो खाने को ही कुछ भिजवा दीजिये. 

- देखो भई, ज्यादा परेशान मत करो. राहत शिविर खोल दिये हैं ऊपर वाले ने चाहा तो वहां से भरपेट मिलेगा, लो परची अभी काटे देता हूं, दिखा कर गैस का सिलेंडर, शक्तिभोग आटा, लालकिला बासमती चावल, टाटा टी, शुगर क्यूब और ब्रिटेनिया का क्रीम का बिस्कुट फ्री मिलेगा. 

….. चलो ड्राइवर, अब गाड़ी भगाओ. कहीं मत रोकना. मंत्री जी पहुंचने ही वाले होंगे. उन्हें दूसरी जगह बाढ़ दिखानी है. कार में बैठते ही सेल फोन के कुछ बटन दबा कर कान से लगाया - हलो, सारा इंतजाम कर दिया है न! थर्मस में चाय, चार-पांच पैप्सी की बोतलें और हल्दीराम का नमकीन रखवा देना. मैं बस पहुंच ही रहा हूं.

अभी तो आगाज़ है

जब इतने दिल से बुलाया है तो ऐसे ही चली जाएगी क्या! हर साल आवभगत का खासा इंतजाम रहता है. किसी बार नखरे भी दिखाती है नेकबख्त कि बोर हो गयी एक ही धरती को बरबाद करते-करते, वही रस्ते, वही खेत, वही झोंपड़पट्टियां, वही गंदे शहर, वही चीथड़ी सड़कें, वही भिखारिन के सिर के बालों के गुच्छों जैसे लटकते बिजली के तार, वही बजबजाती नालियां. लाशों के वही स्याह चेहरे, वही अल्लनटप्पू किस्म की बयानबाजियां, वही सामान रहित राहत शिविर. 

इस बार पता नहीं कैसे इनायत कर दी, जो इतना फैल कर पसर गयी. चौराहे-चौराहे पर स्वागतद्वार भी तो लगे हुए थे न इस बार. अगर देवी जी नहीं आतीं तो अकाल भैया को बुलावा भेजा जाता. पानी और सूखा दोनों के लिये फाइव स्टार वाले इंतजाम हैं यहां. चाहे जितना लीलो चाहे जितना छितराओ. तो साहेबान, इस बार बाढ़ यहां भी है वहां भी. भरपूर.

ऐसी यादें छोड़ कर जाएगी कि दसियों साल भी दर्शन न दिये तो गम नहीं. कई साल उसकी थिरकनें याद बन सताती रहेंगी. बरबादी के निशां पीछे छोड़ बाढ़ खिसकेगी तो अगली अभी से सामने वाले पेड़ की शाख पर बैठी उल्लू और गिद्धों की तरह ताक रही हैं. उन्हें मालूम है कि दवाइयां इतनी ही होंगी कि एक खाए और छह सूंघें. सो महामारियों को भी चिंता करने की जरूरत नहीं. 

बाढ़ ने मारे पांच-छह सौ तो महामारियां धोबन बन कई की गठरी पीठ पे लाद सी यू अगेन कह कर चलती बनेंगी. गांव-गोट के कई घर सांय-सांय करते दिखेंगे. कहीं विलाप के स्वर गूंजेंगे तो कहीं सिसकियां. सरकार और प्रशासन गाल बजाने के पुरातन चरित्र को कायम रखेंगे. ढोल भी पीटे जाएंगे कि देखा हम विनाश के भरपूर दाम ले आए.

अगली बार बाढ़ और हमारे इंताजामात के बीच कोई नूरां कुश्ती नहीं, दंगल होगा यानी खुला खेल फर्रुखाबादी. जो मर गए उन्हें खुदा जन्नतनशीं करे और जो बच गए वे अगले बचाव की तैयारी में अभी से लग जाएं. 

हमने तो अपने हाथ 33 दिन पहले ही खड़े कर दिए थे और तब से नीचे नहीं गिराए हैं ताकि कोई बाद में दोष न दे सके. 

- सर-सर, राहत शिविर में बहुत हंगामा हो रहा है, वहां कोई सामान नहीं है. डीएम और मंत्रियों को बाढ़पीड़ितों ने घेर रखा है. कपड़े तक फाड़ दिए हैं. सर, उसके आगे तो आप जानते ही हैं. 

- अरे बेवकूफ, इन लोगों को वहां जाने की जरूरत ही क्या थी? अब जल्दी से वहां बड़े पर्दे का टीवी लगवाओ, द्रविड़ की सेंचुरी उन्हें भीड़ से बचा लेगी. जरा ऊँचे पे रखवाना ताकि सबको दिखे. और खुद भी जोर-जोर से चिल्लाओ-एक छक्का

 और !!! 

 

 

वार्षिक चुहलबाजी की कीमत

सालो साल हो गये, मिट्टी के टीलेनुमा तटबंधों पर चौसर बिछा कर दांव लगाते कि इस साल हमारे ये जांबाज बाढ़ को जरूर उसकी औकात बता देंगे. 

इन बंधों को ऊंचा-नीचा करने, पालने-पोसने में हर साल करोड़ों रुपये इस तरह बरबाद किये जाते हैं जैसे गली-गली में भामाशाह बोरे खोले बैठा है कि आओ राणा जी, अपने वजन के बराबर तोल कर ले जाओ. जबकि जेब उसकी काटी जा रही है जो आज बाढ़ के पानी से घिरा हाथ फैलाए खड़ा है. 

कोई भी तटबंध ऐसा नहीं, जिसकी बाढ़ से पुरानी आशनाई न हो. नदियों के फैलते ही ये डोलने लगते हैं और पहले मैं-पहले मैं की पुकार लगनी शुरू हो जाती है. तब लगती है यौवन से भरपूर नदियों में होड़, कि कौन कितने ढहाएगा. और बाढ़ खत्म होते ही बांधों पर फिर गारे-चूने का लेप लगाने का टेंडर. 

हां, खेल करोड़ों का ही होगा क्योंकि जान जाने में धेला भी नहीं लगता. अंधे जहान के अंधे रास्ते वाली पंक्ति चरितार्थ हो रही है. पांच साल का मौका जिनके हाथ लग गया है वे दिल्ली में बैठे हैं क्योंकि बाढ़ को गरीब-गुरबों की झोंपड़ियां उजाड़ने, परिवार के परिवार साफ करने, पानी में लाशें तैराने, गांव और शहर बरबाद करने का शिलान्यास कराने की कोई जरूरत नहीं पड़ती. इसमें शिलापट्ट भी नहीं लग सकते कि सन 2004 में यह बहुुद्देशीय बाढ़ फलाने-फलाने के सौजन्य से आयी. और फिर राष्ट्र-राज्य को भी तो देखना है.

स्थानीय नेताओं (जिनमें कुछ मंत्री भी कहलाते हैं) को भी तो कुछ कर दिखाने का मौका मिलना चाहिये न ! फिर ये अफसरान किसलिये हैं ? ये और इनका अमला कब काम आएगा ? बहरहाल, राहत में अभी वो तेजी नहीं है, क्योंकि मौका-ए-दस्तूर नहीं है. गुलगुपाड़ा ज्यादा मचा हुआ है. 

इस जनता को भी पता नहीं क्या हो गया है, बेवजह हाथपांव चला रही है. यह भी नहीं देखती कि गलत-सलत जगह पड़ गया तो क्या होगा, उसकी सेवा कौन करेगा. 

बाढ़ के दर्शनों के लिए ये भी आ रहे हैं तो वो भी आ रहे हैं. समन्दर से मोती निकालने वालों की भीड़ बढ़ती जा रही है. त्रिपुरा में शहीद हो गये जवान राकेश कुमार झा की लाश को उसके घरवालों तक कैसे पहुंचाएं, क्योंकि घर पानी में डूबा हुआ है, हेलिकाप्टर जा सकता है, पर वो कैसे जाए, बाढ़ देख घबरा रहा है. 

इधर प्रशासन कहता है कि नाव उलटने से डूब मरे लोगों की संख्या लाशें गिन कर बतायी जा सकती हैं. लाओ जी लाशें लाओ तो गिनाई हो, तब हिसाब लगेगा कि खर्चा कितना बैठेगा. 

किसी अफसर ने पूछा  - अरे, मंत्री जी कहां गये ? 

- सर, वो सर्किट हाउस के एसी रूम का ताला तुड़वा रहे हैं, जो पता नहीं कौन खाली-पीली तंग करने को लगा गया था.  

मज़ाक चालू आहे......! 


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