उम्मीद व आशंकाओं में उलझा कृषि क्षेत्र

खेती , , रविवार , 17-12-2017


Entrepreneurial area in hopes and expectations

डॉ. राजाराम त्रिपाठी

लम्बे अर्से बाद कृषि के उन्नत भविष्य को लेकर केंद्र की इस सरकार ने नये सिरे से चर्चा का माहौल बनाया है. यह माहौल तब बना जब पहली बार 2016-17 के बजट में सरकार ने सर्वाधिक धन का आवंटन किया था. हालांकि उसके बाद से ऐसा नहीं है कि किसानों की समस्याएं खत्म हो गई या फिर उन्हें कोई बड़ी राहत मिली हो. आत्महत्याओं का आंकड़ा लगातार भारी होता जा रहा है, तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनोखे अंदाज में अपना आक्रोश प्रदर्शित कर देश भर का ध्यान अपनी ओर खींचा लेकिन इन सबके बावजूद कृषि को लेकर एक सकारात्मक माहौल बन रहा है वैसे में जॉन माइकलवेट और एड्रियन वुड्रीज का तर्क भी याद आता है – ‘किसी देश के लिए जाहिल सरकार एक बदनुमा दाग की तरह होती है- राज्य में सुधारात्मक गतिविधियां पूरी तरह से सरकार की योग्यता और उसकी दूरदर्शिता पर निर्भर करती है.’ इस निराशाजनक तर्क के जवाब में जब नंदन नीलकेणी कहते हैं कि ‘सरकार लोगों की आकांक्षाओं को सबलता प्रदान करती है... तात्पर्य, यह कि कृषि क्षेत्र में कट्टरपंथ पर पुनर्विचार किया जाए.’ 

थोड़ा आगे बढ़ा जाए- दरअसल, भारत के पास अभी तक पूर्ण रूप से स्वीकार्य कोई कृषि नीति है ही नहीं. आजादी के बाद से लेकर 70 के दशक के मध्य तक कृषि भारी दबाव के साथ मझदार में ही फंसी रही. 60 के दशक में खाद्य संकट गहराने लगा था, तब इस क्षेत्र में तकनीक के सफल उपयोग को लेकर पहली बार राजनीतिक सहमति बनती नजर आई और इसके नतीजे के रूप में पहली हरित क्रांति का अगाज हुआ और उसका प्रभाव वर्ष 2000 तक बना रहा. 2000 में कृषि के अनुकूल माहौल का सृजन करने में सरकार का योगदान दिखा और तात्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने नई राष्ट्रीय कृषि नीति में कृषि विकास दर 4 प्रतिशत तक पहुंचाने के लक्ष्य की घोषणा की, जो कि बीते डेढ़ दशक में कभी मूर्त रूप नहीं ले सका. लेकिन इससे यह साफ हो गया कि अगर इस नीति का ढंग से अनुपालन किया जाए तो खेती-किसानी की स्थिति तो सुधरेगी ही साथ ही देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, और इसके सह उत्पाद के रूप में ग्रामीण आधारभूत संरचना मजबूत हो कर उभरेगी. अगली सरकार यूपीए की बनी. 2006 में राष्ट्रीय किसान आयोग ने भी इस बावत मनमोहन सिंह सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी. लेकिन फिर कोई नई कृषि नीति फलक पर नहीं आई औऱ स्थिति जस की तस बनी रही. इस बड़े काल खंड में हर क्षेत्र में बदलाव आये, इनके लिए एक के बाद एक नीतियां बनती गई लेकिन कृषि क्षेत्र अपने स्वर्णिम काल का जैसे इंतजार ही करता रह गया. कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सरकारें कृषि को लेकर एक तरह से ऐसा दर्शाती है कि वह जैसे किसी मंदिर का निर्माण कर रही हो, लेकिन इसके लिए भी ईंटों की जरुरत होती है. इन हालातों में इसकी उम्मीद नहीं दिखती कि आने वाले निकट भविष्य में कृषि का कोई ध्रुवतारा चमेगा. 

बीते 70 सालों में देश के किसानों को हमने ऐसे सपने देखने के लिए प्रोत्साहित ही नहीं किया कि वे उन सपनों को पूरा करने की ललक से लबरेज हो कर नई पीढ़ी के खून में किसानी की भावना को प्रवाहित कर सकें. जहां सपने मुरझाये हों, वहां टेसू के फूल का सौंदर्य कोई मायने नहीं रखता. हमें किसानों के लिए बलखाती वसंती हवा के झोंके ‘आवारा हवाओं’ के बीच से निकालनी होगी. जिससे उनका आत्मसम्मान झूम उठे.  

लेकिन हमें अपने मूल सवाल को सुलझाना ही होगा, बगैर इसके आगे की पगडंडी आसान नहीं होगी. दरअसल, लाख टके का सवाल है कि वर्तमान की विघटनकारी स्थितियों में कृषि क्षेत्र को कैसे ऊर्जावान बनाया जा सकता है? अगर हम वैश्विक कृषि क्षेत्र की विकासगाथा का अवलोकन करें तो 125 करोड़ आबादी वाले देश के लिए नेल्सन मंडेला की शैली हमें कृषि क्षेत्र की तमाम नकारात्मक तरंगों से उबार सकती है और देश के मुख्य एजेंडे में हमें कृषि क्षेत्र को शामिल करने की पैरवी करती है. हालांकि ऐसा हो तो यह भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए एक सुखद अनुभव होगा और अगर इस पुनित कार्य की पहल सत्तारुढ़ दल के द्वारा हो तो बजट में कृषि क्षेत्र पर दिया गया फोकस एक शुभ संकेत बनेगा. जीएसटी के लागू होने से कृषि आर्थिकी में नये आयाम जुड़ने की संभावना जगी है. जल प्रबंधन, कृषक अनुकूलन, उत्पादन- विपणन उपाय और आधुनिक विज्ञान व तकनीक को कृषि क्षेत्र में ढंग से लागू किया जाए तो परिदृश्य बदलते देर नहीं लगेगी. वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ बाजार तक शोध प्रयास को ले जाया जाए तो यह किसानों को नई दिशा दे सकता है. कुछ नये नवोन्मेष की ओर भी देखना समय की जरुरत बन गई है, हमें बड़ी सिंचाई परियोजनाओं के समानांतर लघु सिंचाई के संसाधन और ड्रोन का उपयोग कर खेती में नई जान फूंकने की कोशिश करनी चाहिए, जिसकी सॉयल मैनेजमेंट में भूमिका हो. हमें एक ऐसे फ्रेमवर्क की कल्पना करनी होगी जो कृषि और कृषि क्षेत्र में तकनीक की दखल को बढ़ाता हो. आज जब अकाउंटिंग की बात करतें या फिर ऑटोमेटिक डोर क्लोजर की बात करते हैं तो कृषि क्षेत्र में ऐसी तकनीक वाले सॉफ्टवेयर की आवश्यकता वाले सोच क्यों नहीं विकसित कर पाते. किसानों को भी डिजिटल नेटवर्क से जुड़ने का हक है और सरकारों को चाहिए वे उनके हक की अदायगी करें. अब वह समय आ गया है कि हम कृषि क्षेत्र को लघु व मध्यम उद्योग के समान दर्जा दे और उसे एक उद्योग के रूप में सामने लाये ताकि नये उद्यमियों की एक ऩई श्रृखला का सूत्रपात हो सके. साथ ही कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को केंद्रित राष्ट्रीय कृषि बैंक जैसी बैंकिंग संस्था उभर कर सामने आये. इसके लिए जरुरी नहीं की सरकार ही अपने ऐसे उपक्रम खोले बल्कि ऐसे माहौल सृजित करने की आवश्यकता है कि निजी क्षेत्र भी इस तरह की बैंकिंग की अवधारणा के साथ कृषि बाजार में दस्तक दें. कुछ बड़े किसान एक अपना संगठन भी बना सकते हैं औऱ वह कंपनी एक्ट के नियमों के तहत पंजीकृत हो, इस तरह की कंपनियां मंडी के बिचौलियों को खत्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर सकती है. आजकल कौशल भारत, विकसित भारत का नारा सरकार बड़े जोरशोर से लगा रही है लेकिन सरकारी स्कील डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत एग्रो स्कील डेवलपमेंट पर कोई खास तव्वजों नहीं दिखती है. जरुरत है कि नई पीढ़ी को कृषि कौशल से युक्त कर कृषि क्षेत्र में भेजा जाए, तभी वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीक के लाभों का दोहन संभव हो सकेगा. लेकिन ऐसे सुखद माहौल के लिए सबसे पहले आवश्यक होगी कि हम ग्रामीण आधारभूत संरचना के क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश को बढ़ाये, जलाशयों के  अस्तीत्व को पुख्ता बनाने के साथ ग्रामीण सड़कों और भंडारण घरों को दुरुस्त करें तथा इनकी संख्या बढ़ाये. खाद्यान्नों के न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी अवधारणा से आगे बढ़ते हुए इसके लिए खुले बाजार की अवधारणा को मूर्त रूप देने की दिशा में आगे बढ़े. उर्वरकों पर भारी सब्सिडी व्यवस्था को नये सिरे से व्यवस्थित करे. वर्तमान नीतियां सिर्फ किसानों को ही नहीं मार रही बल्कि वह तो मिट्टी की उर्वरक क्षमता को ही मारने पर तुली है. 

वैसे भी हर क्षेत्र प्रगती कर ही रहा है तो  कृषि के क्षेत्र में भी प्रगती हुई है, लेकिन किसानों के दिन नहीं बहुरे... एक तरह से कहा जाए तो उनके दिन और बदतर हुए है, 70 साल पहले के बनिस्पत. किसानों की इस दुर्दशा के मूल कारण गहरे हैं. एक बात यहां समझना काफी महत्वपूर्ण है कि कृषि और किसान दो अलग-अलग विषय हैं. भारत में आमतौर पर जब कृषि की बात की जाती है तो स्वाभाविक तौर पर किसान उसमें नत्थी हो जाते हैं.  उल्लेखनीय है कि कृषि उत्पाद में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है, बाजार भी  व्यापक हुए हैं, इसके बावजूद किसानों की संख्या दिन ब दिन गिरती जा रही है. स्थिति पर गौर करें तो वर्ष 1947 में जहां किसानों की संख्या कुल आबादी का तकरीबन 80 प्रतिशत था तो इन 70 सालों में गिरते हुए यह संख्या 10 प्रतिशत से भी कम हो गया है. आज भारत में किसानों की संख्या 10 करोड़ के आसपास है. बाकी खेतीहर मजदूर बन कर रह गये हैं. यह स्थिति क्यों है और कैसे हुए इसका विवेचन आवश्यक है. 

बीते कुछ वर्षों में भारत में सरकारी अर्थशास्त्रियों का एक ऐसा तबका उभरा, जो लगातार 'कृषि प्रधान देश' में कृषि के आधुनिकीकरण और उसमें व्यापक पैमाने पर पूंजी निवेश को कभी देश के विकास का विकल्प नहीं मानता था. प्रशासन, योजना और नीति निर्धारण में ऐसे अर्थशास्त्रियों का बोलबाला रहा. इन नीति निर्धारकों और योजनाकारों ने 'आधुनिकता से तालमेल' के नाम पर कभी कृषि क्षेत्र को वह महत्व नहीं दिया, जो उद्योगों को दिया. जबकि अंग्रेजों के एक वर्ग का तर्क था कि भारत कृषि प्रधान देश है और कृषि में निवेश से ही कायापलट संभव है. भारत के 17वीं 18वीं शताब्दी के आर्थिक इतिहास से जो वाकिफ हैं, उन्हें मालूम होगा कि अंग्रेजों के आगमन के पूर्व भारत मूलत: उद्योग प्रधान देश था. भारत के औद्योगिक ढांचे को तबाह कर ही इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति हुई. इस प्रक्रिया में सुनियोजित रूप से भारत को कृषि प्रधान देश बनाया गया, और धीरे-धीरे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन गई, लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की सरकारों ने पुनः जो उद्योगों पर ध्यान केंद्रित किया तो कृषि हासिये पर चली गई. हालांकि वह समय उद्योगों के विकास का भी था और आज भी है, इससे असहमत नहीं हुआ जा सकता. लेकिन कृषि और औद्योगिक विकास के बीच जो संतुलन बनाने की आवश्यकता थी उसे हमारे नीति निर्धारकों ने नजरअंदाज किया. फिर 17वीं-18 वीं शताब्दी की बात करें तो उन दिनों भारत के औद्योगिक उत्पादों का पूरी दुनिया के बाजार में एकाधिकार था. भारत के तत्कालीन औद्योगिक ढांचे को नष्ट किये बगैर कोई देश खुली प्रतिस्पर्द्धा में भारत को मात नहीं दे सकता था. इसी कारण अंगरेजों ने अपनी ताकत का इस्तेमाल भारत के औद्योगिक ढांचे को तहस-नहस करने में किया और कृषि को प्रोत्साहित किया, लेकिन 250 वर्षों के अंग्रेजी शासन के दौरान कृषि एक मुकाम बना चुकी थी और स्वतंत्र भारत के लिए यह एक सुनहरा अवसर था कि वह औद्योगिक विकास के साथ कृषि क्षेत्र में भी पूंजी निवेश कर इसे भी उद्योग का रूप दे, अगर ऐसा किया गया होता तो आज स्थिति अलग होती और किसानों को आत्महत्या करने की नौबत नहीं आती और ना ही किसानों की दिन ब दिन संख्या घटती. वर्तमान सरकार की कृषि के उद्धार के लिए किये जा रहे क्षणिक प्रयास भी वर्षों से उपेक्षित कृषि क्षेत्र में सकारात्मक ऊर्जा भर रहा है. 

1840 में एक संसदीय जांच समिति के सामने बोलते हुए मांटगोमरी मार्टिन ने हालांकि इस बात से इनकार किया था कि भारत एक कृषि प्रधान देश हैं- लेकिन गौर करने वाली बात है कि उनको यह बात कहने की जरुरत क्यों आ पड़ी. वहीं 18वीं शताब्दी में बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद के बारे में इंडस्ट्रियल कमीशन ने अपनी रपट में लिखा, 'यह शहर काफी फैला है. यहां बहुत अधिक आबादी है. यह समृद्ध है, इसकी तुलना लंदन से की जा सकती है. फर्क महज यह है कि मुर्शिदाबाद में लंदन से भी अधिक संपन्न और पैसेवाले लोग हैं.' उल्लेखनीय है कि तब मुर्शिदाबाद एक औद्योगिक और कृषि से संपन्न और संतुलित नगर था और यहीं इसकी समृद्धि का कारण भी था. बाद के दिनों में उद्योगों के ध्वस्त होने के बाद भी इस नगर को कृषि ने काफी हद तक संजो कर रखा.

 एक तथ्य और है कि जब कृषि की बात की जाती है तो सिर्फ उसका दायरा खेती और फसलों तक समेट दिया जाता है, जब कि इसका दायरा मत्स्य पालन से लेकर मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन इत्यादी इत्यादी तक है. लेकिन इन्हें आम तौर पर कृषि के बजाय कुटीर उद्योग के नजरिये से देखा जाता है. उन दिनों कृषि के साथ-साथ बड़े पैमाने पर गांव की महिलाएं-पुरुष इन्हीं कुटीर उद्योगों में लगे थे. फलस्वरूप पूंजी निर्माण की दर अधिक थी. इस कारण गांवों में खुशहाली व संपन्नता थी. फसली कृषि पर जनसंख्या का बड़ा हिस्सा निर्भर था. 1807 में डॉ बुकानन नामक एक अर्थशास्त्री ने बंगाल और उत्तर भारत का सर्वेक्षण किया. उसने शाहाबाद जिले में पाया कि डेढ़ लाख से ज्यादा औरतें कृषि से संबंधित कुटीर उद्योग से जुड़ी है और इससे उन्हें पर्याप्त आर्थिक बल मिलता है. 

मशहूर अर्थशास्त्री सुरेंद्रनाथ गुप्त ने विदेशों में बिखरी जानकारी के आधार पर एक चर्चित पुस्तक लिखी है, 'सोने की चिड़िया और लुटेरे अंगरेज'. इस पुस्तक में उल्लेख है कि सैंडरसन नामक अंग्रेज ने स्पष्ट रूप से उन दिनों लिखा कि 'अंग्रेजों के आगमन के पूर्व भारत विश्व का सर्वसंपन्न कृषि प्रधान देश था. फ्रैसवां पिरार्ड नामक एक फ्रांसीसी, सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ में भारत आया था. 1611 में उसकी यात्रा के वृतांत फ्रेंच भाषा में छपे. भारत देखने के बाद उसने लिखा, 'संक्षेप में मैं इतना ही कहूंगा कि सोने-चांदी, लोहे-इस्पात, तांबे एवं अन्य धातुओं मसलन जवाहरात, बढ़िया लकड़ी तथा मूल्यवान एवं दुर्लभ पदार्थों की ऐसी विविधता थी कि वर्णन का कोई अंत नहीं हो सकता. उन दिनों पटसन की खेती भारत का दूसरा महत्वपूर्ण घरेलू कर्म था. 

हमारे रहनुमा यह तथ्य नजरअंदाज कर गये कि अतीत में भारत की समृद्धि के मौलिक कारण क्या थे. महात्मा गांधी ने इस तथ्य को ध्यान में रख कर ही कुटीर उद्योग के साथ-साथ कृषि को पुनर्जीवित करने पर बल दिया. बाद में डॉ राममनोहर लोहिया और चौधरी चरण सिंह भी यह तथ्य दोहराते रहे. लेकिन कृषि क्षेत्र में बढ़ती अनुत्पादक शक्तियों को वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध नहीं कराये गये. कृषि पर निर्भरता और छद्म बेरोजगारी बढ़ी. अपने देश में कृषि में कम निवेश के कारण कृषि क्षेत्र की हालत दयनीय होती गयी है. 

1950-51 में राष्ट्रीय आय में कृषि आय का प्रतिशत 62.8 था. लेकिन 1985-86 में यह घट कर 30.8 फीसदी रह गया. हालांकि आज भी तकरीबन 53 फीसदी लोग कृषि जनित कार्य पर निर्भर हैं. सन 1965-66 तक हमारे कृषि उत्पादों की निर्यात प्रतिशत 41.6 था, जो 1983-84 में मात्र 28.9 रह गया. जाहिर है कि कृषि में कम निवेश के कारण राष्ट्रीय विकास में कृषि की भूमिका गौण होती गई.

1970-80 के दशक में भारतीय किसानों की आय तेजी से कम हुई है. हरियाणा में गेहूं की खेती से प्रति हेक्टेयर आमद 1970-71 में 611 रुपये थी. 1974-79 में यह घट कर 565 रुपये रह गयी. इसी तरह मध्यप्रदेश में 1970-71 में प्रति हेक्टेयर आमद 299 रुपये से घट कर 1977-78 में 255 रुपये रह गयी. देश के प्रख्यात अर्थशास्त्रियों के अनुसार किसानों की कंगाली लगातार बढ़ रही है.

एक ओर निरंतर किसानों की गरीबी बढ़ रही है, तो दूसरी ओर कृषि पर आश्रित जनसंख्या में भी इसी अनुपात में वृद्धि हो रही है. स्वतंत्र होने के 70 वर्ष बाद भी इस विसंगति से योजनाकार या राजनेता चिंतित नहीं हैं. लेकिन अब फिर एक ऩई कृषि नीति की आवश्यकता शिद्दत से महसूस की जा रही है. उम्मीद तो ये हैं कि वर्तमान सरकार बाजपेयी जी की कृषि नीति को समाहित करती हुई एक नई कृषि नीति लायेगी, जिससे देश की कृषि उत्पादकता और किसानों के चेहरे पर खिलखिलाहट का सौंदर्य दिखे.  

 


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