लालपुर से फॉरबिसगंज वाया भीमपुर

गांव , , शुक्रवार , 01-09-2017


BhimPur vai lalpur to Farbisgunj

मिथिलेश कुमार राय

चकरदाहा के पास शरणार्थियों ने एनएच 57 को जाम कर रखा था. वाहनों की लंबी लाइन लग गई थी. पता चला कि दो घंटे से यह जाम चल रहा है. किसी अधिकारी के नहीं आने के कारण शरणार्थियों का आक्रोश बढ़ता ही जा रहा था. 

बस में बैठी एक सुशिक्षित महिला को ज्यादा परेशानी हो रही थीं. वह बोल रही थी - जाम करने से क्या होगा ? नेता लोग को जाकर कहे अपनी समस्या. 

एक गंवार सा दिखनेवाला आदमी ने उसे तुरंत टोक दिया - नेतवन लोग कहने से कहाँ सुनता है. उन्हें सुनाने के लिए कुछ बोलना फालतू है.

जाम लंबे समय तक टूटने की संभावना नहीं दिख रही थी. मुझे लगा कि सामने से आ रही छोटी गाड़ी जाम देखकर वापस लौट रही होगी. बस से उतरकर मैं जाम के मुहाने पर आ गया. एक टेंपो बैक होकर लौटने की प्रक्रिया में थी. बहुत सारे लोग उस ओर दौड़ रहे थे. मैं भी दौड़ने लगा.

लालपुर से फॉरबिसगंज की यात्रा कुल जमा 35 किमी की होती है. लेकिन मैं यह यात्रा मिनटों में पूरा कर लेता हूँ. होता यह है कि बस में बैठते ही मुझे नींद आ जाती है और मैं सो जाता हूँ. आँखें खुलती हैं तो सामने फॉरबिसगंज होता है. यह मेरा रोज का सफर है. लेकिन आज की यात्रा सामान्य न थी.

लालपुर से भीमपुर तक बस एसएच 91 पर चलती रही. सड़क के दोनों तरफ के धान के खेत में धान नहीं सिर्फ पानी नजर आ रहा था. यह पहले बारिश का पानी था. लेकिन जब सुरसरि लबालब हो गई, वह बारिश के पानी से मिल गई और उसने धान की फसल को ढंक लिया. 

भीमपुर से एनएच पर जैसे ही बस ने दौड़ना शुरू किया, तबाही का मंजर सामने आने लगा. अब हम जिला अररिया में प्रवेश कर रहे थे. नरपतगंज बीतते न बीतते लगने लगा कि कुछ असामान्य हुआ था जैसे. एनएच शरणार्थियों के तंबुओं से अटा पड़ा था. हजारों लोग अपने माल-मवेशी और बाल-बच्चे के साथ किसी की राह देख रहे थे. तभी बस हिचकोले खाकर रूक गई. यह चकरदाहा था. यहाँ शरणार्थियों ने जाम लगा रखा था. उनका कहना था कि अभी तक उनकी किसी ने खोज-खबर लेना भी मुनासिब नहीं समझा है.

फॉरबिसगंज अररिया जिले का एक महत्वपूर्ण बाजार है जो नेपाल से बिल्कुल सटा हुआ है. परमान नदी के जद में आने के कारण यह बाढ़ से पुरी तरह प्रभावित था. वहाँ रह रहे किसी भी परिचित से कोई भी संपर्क नहीं हो रहा था. मेरी पत्नी अंजली बार-बार अपने एकलौते भाई सोनू को फोन लगातीं और रुआंसी हो जाती थीं. सोनू का लास्ट मैसेज यही आया था कि उसके कमरे में पानी भर गया है और उसने अपने चचेरे भाई अलख के दो-मंजिले आवास पर शरण ले रखी है. फिर उसका फोन कभी नहीं लगा.

टेंपो ने एनएच छोड़ दिया. पता चला कि भजनपुरा के पास महाजाम लगा दिया गया है. टेंपों ब्लॉक के रास्ते स्टेशन तक जाएगी. लेकिन ब्लॉक के पास आकर टेंपो ड्राइवर ने हाथ खड़े कर दिये. घुटने भर पानी था. यात्रियों ने उनकी मजबूरी समझी. सब पैंट समेटकर पानी में उतर गए. सुभाष चौक तक यात्रा पैदल रही. वहाँ से डाकघर नजदीक था. भाई प्रशांत विप्लवी को एक स्पीड पोस्ट भेजना था. मैं उधर मुड़ गया. लेकिन डाकघर बंद था. वहाँ घुटने भर पानी था. स्टाफ ने कहा कि जान है तो जहान है. ऐसे में काम कैसे होगा.

बाजार में ज्यादातर दुकानदार अपने सामानों को सुखा रहे थे. ऐसा दिखता था जैसे अधिकतर दुकानें पानी की जद में थीं. बाद में पता चला कि व्यावसायियों के गोदामों में चढ़ आये पानी ने व्यापक क्षति पहुंचाई है.

मुझे सोनू का पता लगाना था. उसका डेरा सुल्तान पोखर पर है. लेकिन वह वहाँ नहीं था. किसी से कुछ पता भी नहीं चला. मुझे अलख जी का आवास खोजना था. ढूंढा. सोनू वहीं था. फोन काम ही नहीं कर रहा था और शनिवार से शहर में बिजली भी नहीं थी, सो संपर्क कैसे हो.

अलख जोगबनी में काम करते हैं. वहाँ के दृश्य के वर्णन से रोंगटे खड़े हो गए. अररिया सदर के अमित जी और जोगबनी के मनीष जी ने जो शुरू में बताया था स्थिति उससे बहुत विकट थी. अलख ने बताया की मरने वाले का अभी सही आँकड़ा नहीं आया है. जान-माल की क्षति व्यापक है. बगल के गाँव सहवाजपुर और फतेहपुर कि जानकारी मिली कि वहां जीवन विकट हो गया था.

वापसी में छातापुर की कोई बस नहीं दिखी. एक पटनिया बस में जाकर बैठ गया. सारी गाड़िया एक ही लेन में चल रही थी. दूसरा लेन शरणार्थियों के तंबूओं से भरा हुआ था. लौटते हुए आसमान में बादल के काले-काले टुकड़े पर नजर पड़ी तो डर लगने लगा.

शाम को लालपुर के एक पुल के पास यूं ही खड़ा था. पानी ऐसे घूमड़ रहा था मानो किसी ने उसे बाँध रखा हो और वह इसका विरोध कर रहा हो. 


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