नदी बचाना यानी अन्न-जल को बचाना!

जल , , शनिवार , 14-10-2017


Save the river that means save food!

शंभूनाथ शुक्ल

सद्गुरु जग्गी वासुदेव मूल रूप से एक योगी हैं. ये ईशा फाउंडेशन नाम के एक एनजीओ के संस्थापक भी हैं यह एनजीओ भारत सहित संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड, लेबनान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया में योग सिखाता है और कई सामाजिक और सामुदायिक विकास योजनाओं पर भी काम करता है. इसको संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC) में विशेष सलाहकार का पद मिला है. सदगुरु जग्गी वासुदेव ने आठ भाषाओं में सौ से अधिक पुस्तकें लिखी हैं. इन दिनों सदगुरु चर्चा में हैं क्योंकि उन्होंने नदियों को बचाने की मुहीम छेड़ी हुई है. उनके द्वारा शुरू की गई नदी अभियान रैली को 3 सितम्बर 2017 को कोयंबटूर से केन्द्रीय वन पर्यावरण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने झंडी दिखाकर रवाना किया था. यह रैली आज पूरे देश में एक विशाल आंदोलन का रूप ले चुकी है.

कन्याकुमारी, मदुरई, तिरूअनंतपुरम, त्रिची, पुद्दूचेरी, मैसूर, बैंगलूरू, चेन्नई, विजयवाडा, हैदराबाद, मुंबई, अहमदाबाद, इंदौर, भोपाल और लखनऊ होते हुए यह रैली राजस्थान के भरतपुर पहुंची. वहाँ रैली के तहत कार्यक्रम में जग्गी वासुदेव ने सीएम वसुंधरा राजे की जल-संरक्षण की दिशा में किए गए कार्यों की तारीफ भी की. इससे पहले सदगुरु ने यहां ऊंचा नंगला में राज्य सरकार एवं ईशा फाउन्डेशन के संयुक्त आयोजन 'जल जागरूकता कार्यक्रम' में शिरकत की. इसके बाद यूआईटी ऑडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि देश की महान नदियों का जलस्तर घटा है. पानी की कमी से परिंदों ने भी राजस्थान से मुंह मोड़ लिया है. पानी की कमी एक जटिल समस्या है जिसके निदान के लिए नीति तो बननी चाहिए ही, लेकिन इस जल-अभियान को जन-अभियान बनाना होगा. सदगुरु का यह अभियान आज की जरूरत है. पानी के गहराते संकट से लगता है कि एक दिन मीठे पानी के सारे स्रोत सूख जाएंगे. 

इस सन्दर्भ में हमें अपने देश के इतिहास में थोड़ा पीछे जाने की जरूरत है. अभी ज्यादा दिन नहीं गुजरे जब गंगा, यमुना, नर्मदा से लेकर कृष्णा और कावेरी का जल पीने के लिए इस्तेमाल होता था. अबुल फजल ने ‘आइने अकबरी’ में लिखा है कि अकबर के पीने के लिए गंगा का जल ही लाया जाता था और बाकी इस्तेमाल के लिए जमना का. जब बादशाह आगरा में होते तो गंगा का जल सोरों (वर्तमान में उत्तर प्रदेश के मान्यवर कांशीराम जिले के अंतर्गत गंगा तट पर बसा कस्बा) और जब दिल्ली या लाहौर में होते तो हरिद्वार से लाया जाता. भोजन बनाने के लिए यमुना का जल प्रयोग में लाया जाता था जो दिल्ली और आगरा में सहज सुलभ था. मुगल बादशाहों के लिए गंगा का जल लाए जाने की यह परंपरा जहांगीर तक चली. बाद के बादशाह अपने पूर्ववर्तियों के लिए यमुना का जल ही प्रयोग करते रहे. देश के दूसरे हिस्सों में वहां के राजा या नवाब अथवा सुल्तान पीने के लिए स्थानीय नदियों के जल पर भरोसा करते थे. तब कुआं, बावड़ी, झील व तालाब का पानी बाकी काम के लिए ही प्रयोग होता था.

जॉब चार्नाक, जो 1690 में बंगाल के तट पर उतरा और कोलकाता नगर बसाया. पीने के लिए हुगली नदी का जल इस्तेमाल करता था. इस जल को उबाल कर पिया जाता था. अभी कुछ वर्षों पहले तक कोलकाता में हुगली पर रात को ज्वार आते ही सड़क किनारे के नल अपने आप बहने लगते थे और सड़कें स्वत: ही धुल जाया करती थीं. मगर आज हुगली बेहद प्रदूषित है. उसके पानी में आयरन इतना अधिक हो चुका है कि इसको पीना असंख्य रोगों को न्योतना है. 

दरअसल, सभ्यता के विकास के साथ-साथ अब नदियों का जल कहीं भी पीने लायक नहीं बचा है. हर नदी प्रदूषित है. हरिद्वार तक आते-आते गंगा का जल इतना प्रदूषित हो जाता है कि उससे आचमन तक करने की हिम्मत नहीं पड़ती. बांध बनने और इसमें औद्योगिक कचरा लगातार गिराए जाने के कारण आज गंगा दुनिया की सातवीं सर्वाधिक प्रदूषित नदी है. 1854 में गंगा पर पहला बांध हरिद्वार में बना और ‘अपर गंगा कैनाल’ नहर निकाली गई. फिर फरक्का बना और गंगा की धारा अवरोधित होती गई. नदी की मुख्य धारा का अवरोधित होना जलीय जीव-जंतु को प्रभावित तो करता ही है, साथ में गाद के जमने की तीव्रता भी बढ़ जाती है. नतीजतन गंगा की स्वतः साफ करने वाली धारा बाधित होती गई. फिर शहरों का कचरा और औद्योगिक वेस्टेज ने इसकी हालत एक नाले-सी कर दी. आज गंगा में गंदगी गोमुख से ही शुरू हो जाती है और गंगोत्री तक आते-आते यह नदी इतनी प्रदूषित हो चुकी होती है कि इसका पानी पीने लायक नहीं रहता. गंगोत्री से महज 40 किलोमीटर की दूरी पर ही एनटीपीसी के बांध ने इसका रास्ता बाधित कर दिया है. गंगोत्री और चंबा के बीच गंगा पर इतने बांध और बैराज हैं कि इसकी धारा कहीं भी अपने मूल स्वरूप में नहीं बह पाती है. यही कारण है कि 2013 में ऐसी तबाही मची कि गंगोत्री से ऋषिकेश तक का पूरा पर्वतीय इलाका अस्त-व्यस्त हो गया था. अभी तक सरकार की परियोजनाओं के तहत अकेले उत्तराखंड में ही 300 बांध बनने और प्रस्तावित हैं.

हमारी नदियों की देखरेख का अभाव और उनके जल के लगातार दोहन का यह नतीजा यह है कि निकट भविष्य में पीने के पानी के लिए शायद हमें तरसना पड़े. हमारी पृथ्वी के 97 प्रतिशत जलस्रोत खारे पानी के हैं. बाकी के 3 प्रतिशत जमे हुए हैं, और इनसे ही नदियां निकलती हैं और हमें पीने का पानी उपलब्ध कराती हैं. अब अगर ये नदियां प्रदूषित होती गईं तो पीने के लिए पानी कहां से आएगा ? 

यमुना के दोनों किनारों की तरफ आठ-आठ किलोमीटर तक पानी खारा हो गया है. यहां कुएं, बावड़ियाँ और जमीन के अंदर के जल स्रोत भी खारे हैं, इसीलिए यमुना किनारे बसने वालों के लिए भी गंगा का पानी ही ट्रीट करने के बाद लाया जाता है. दिल्ली, नोएडा व गाजियाबाद इसके उदाहरण हैं. आज भी गंगा और नर्मदा का पानी सबसे अधिक पीने के लिए प्रयोग में लाया जाता है. भले इस पानी को ट्रीट करना पड़ता हो, लेकिन इनका पानी कहीं भी खारा नहीं है. 

यह दुर्भाग्य ही है कि लगभग 2500 किलोमीटर के कुल बहाव क्षेत्र की शुरुआत में ही गंगा इतनी प्रदूषित हो जाती है कि समुद्र तक जाते-जाते वह एक बड़े गंदे नाला-सा हो जाती है. उत्तराखंड में यह करीब 450 किलोमीटर बहती है. इस क्षेत्र में ही 14 नाले इसमें 450 मिलियन घन लीटर गंदा पानी उड़ेलते हैं. इसके बाद उत्तर प्रदेश में 1000 किलोमीटर का बहाव के दौरान यह और प्रदूषित होती है. फिर बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल - कुल मिलाकर इसमें करीब 3 हजार मिलियन घन लीटर प्रदूषित पानी फेकते हैं. जबकि गंगा वह नदी है जिसके सहारे देश की 50 करोड़ आबादी पलती है. 

1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ‘गंगा एक्शन प्लान’ की शुरुआत की थी. इसके बाद 2009 में यूपीए सरकार ने ‘राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन अथारिटी’ बनाई. अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘नमामि गंगे’ योजना शुरू की है. लेकिन अभी तक की रिपोर्ट के अनुसार गंगा सफाई तो दूर, उसके जल में विषैले तत्व और बढ़े हैं. आज हालत यह है कि गंगोत्री से डायमंड हार्बर तक यह नदी निरंतर प्रदूषित हो रही है और सरकार ने अभी तक कोई सार्थक पहल नहीं की है.

एक सरकारी अध्ययन में पाया गया था कि नदियों के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण औद्योगिक और शहरी वेस्टेज को बगैर ट्रीट किए नदियों के जल में बहा देना है. बड़ी औद्योगिक इकाइयों को तो सरकार अपनी निगरानी में रख सकती है, लेकिन हजारों छोटे कल-कारखाने और नगर निगम अपने नालों को ट्रीट नहीं करते. नगर निगमों के ज्दातर ट्रीटमेंट-प्लांट तो काम ही नहीं करते हैं. ऐसे में यह सारा कचरा नदियों में गाद जमा करके उसकी धारा प्रभावित करता है. इससे एक तरफ तो बाढ़ जैसी महामारी आती है और दूसरी तरफ नदी का जल लगातार प्रदूषित होता है. नदियों में आजकल बायो आक्सीजन डिमांड की लगातार बढ़ रही मात्रा एक और खतरा है जो बीमारियां और जीवन-रक्षक बैक्ट्रिया का ह्रास करता है. यह बायो आक्सीजन डिमांड देश की तमाम बड़ी नदियों में बढ़ रही है, खासकर काली और मर्कण्डा नदियों में. खतरनाक बात तो यह है कि चंबल, बेतवा, घाघरा और राप्ती जैसी नदियां इस कदर प्रदूषित होती जा रही हैं कि अब उनके किनारे की हरियाली भी नष्ट होती जा रही है. इस वजह से बाढ़ का खतरा भी हर साल बना ही रहता है.

नदियों में प्रदूषण का असल खामियाजा तो कृषिक्षेत्र पर पड़ता है. प्रदूषित नदियों के जल से सिंचाई होती है और इससे प्रदूषण भी उस कृषि भूमि पर पहुंच जाता है जहां से खाद्यान्न आता है. अब एक तरफ तो पैदावार बढ़ाने के लिए किसान खतरनाक उर्वरक इस्तेमाल करते हैं और दूसरी तरफ प्रदूषित नदियों का जल उसे और अस्वास्थ्यकर बनाता है. इसका एक उदाहरण पंजाब है जहां पर लगातार प्रदूषण की वजह से पूरे फिरोजपुर और भटिण्डा में कैंसर के रोगी बढ़ते जा रहे हैं. दरअसल हरित-क्रांति के दौरा में पंजाब में गेहूं, मक्का, सरसों व धान की खेती को खूब बढ़ावा दिया गया और अधिक उपज के लिए अत्यधिक मात्रा में जैविक खादों का इस्तेमाल हुआ. नतीजन वहाँ उपज तो बढ़ी, मगर साथ-साथ बीमारियां भी चली आईं. जब तक सरकार चेतती कैंसर ने पंजाब को गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया. एक और वजह है ‘कैश क्रॉप्स’ यानी नकदी फसलें जिसके चक्कर में जमीन की जैविक विविधता ही नष्ट कर दी गयी. किसान वही फसलें बोना शुरू कर दिए जिनकी बिक्री से उन्हें फायदा था. लेकिन इसके लिए अकेले किसानों को दोष देना फिजूल है. खुद सरकारों ने भी न तो उर्वरकों के अत्यधिक इस्तेमाल करने पर कभी प्रतिबंध लगाया और न ही नदियों के जल स्रोत निर्मल बने रहने पर जोर दिया. नतीजा यह है कि आज न पानी पीने योग्य बचा है न खाद्यान्न खाने योग्य.

सरकार और धार्मिक संगठनों के लोग अगर आज नदियों को बचाने के लिए वाकई कटिबद्घ हैं तो नदी के जल को साफ करने का बीड़ा सिर्फ धार्मिक भाव से नहीं बल्कि वरीयता में रखकर उठाया जाए. जितनी गंगा को स्वच्छ करने की जरूरत है उतनी ही जरूरत काली, गंडक, सरयू और घाघरा को करने की भी. मगर सरकारें प्रतिद्वंदिता में आकर नदी के जल की सफाई योजना को भी फिजूल में विवादास्पद बना देती हैं. आज जरूरत इस बात की है कि नदियों को बचाया जाए, उन्हें प्रदूषण मुक्त किया जाए. और साथ ही इस पूरे मामले को विकास विरोधी न बनाकर प्रचारित किया जाए. 


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