मंदिरों से ही पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत

वन , , बुधवार , 29-11-2017


From the temples environmental protection begins

पंकज चतुर्वेदी

जयपुर स्थित ताड़केश्वर महादेव मंदिर की खासियत है कि यहाँ शिवलिंग पर चढ़ने वाले पानी को नाली में बहाने के बनिस्बत, एक चूने के बने कुंड, जिसे परवंडी कहते है, के जरिये धरती के भीतर एकत्र किया जाता है. यह प्रक्रिया उस इलाके के भूजल के संतुलन को बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाती है.  हो सकता है कि प्राचीन परम्परा में शिवलिंग पर जल चढ़ाने का असली मकसद इसी तरह भविष्य के प्रकृति-प्रकोप के हालात में जल को सहेज कर रखना हुआ करता हो. यह एक सहज प्रयोग है जो बहुत कम व्यय में शुरू किया जा सकता है. यदि दस हज़ार मंदिर इसे अपनाते हैं और हर मंदिर में प्रति दिन औसतन एक हज़ार लिटर पानी शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है तो गणित लगा लें कि हर महीने कितने अधिक जल से धरती तर रहेगी.

जयपुर के इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां शिवलिंग भूमि के भीतर से अवतरित हुआ है. कहते हैं कि जयपुर बसने के पहले यहाँ घना जंगल था. एक ग्वाले की गाय रोज ही यहाँ ताड़ के पेड़ के नीचे आ जाती थी और उसके थन से दूध अपने आप निकल कर धरती में समा जाता था. ग्वाला यह समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा क्यों रहा है. वह काफी परेशान था. एक दिन उसे स्वप्न में शिव दिखे और उस जगह के बारे में बताए जहां मिट्टी के नीचे वे शिवलिंग के रूप में दबे पड़े थे. बाद में उस जगह को खोदने पर वह शिवलिंग मिला. 

जयपुर के चौड़ा रास्ता स्थित इस ताड़केश्वर महादेव मंदिर का निर्माण 1784 ईस्वी में किया गया था. उस वक्त यहां धुंधरमीनाज गांव हुआ करता था. मुख्य शिवलिंग काले पत्थर का बना है जिसका व्यास 9 इंच है. इस मंदिर से पाराशर व्यास परिवार का संबंध हैं और नित्य पूजा-अर्चना इसी परिवार द्वारा की जाती है. मंदिर का फर्श संगमरमर का है. चौक के पास ही जगमोहन सभा हॉल है. इस हॉल में 125 किलो के चार विशाल घंटे हैं. यहां एक पीतल का नंदी बैल है. साथ ही गणेश की एक प्रतिमा भी जिसकी सूँड़ बाईं ओर है. 

शायद इसी मंदिर से प्रेरणा पाकर जयपुर के ही एक ज्योतिषी और सामाजिक कार्यकर्ता ने पंडित पुरुषोत्तम गौड़ ने पिछले 13 वर्षों में राजस्थान के करीब 300 मंदिरों में जलसंरक्षण ढांचे का विकास किया है. समाज सेवा और ज्योतिष के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने के लिए गौड़ को ‘महाराणा मेवाड़ अवार्ड’ समेत कई सम्मानों से नवाजा जा चुका है. पुरुषोत्तम गौड़ ने 2000 में अपना जलाभिषेक अभियान शुरू किया. वे मंदिरों में 30 फुट गहरा गड्ढा बनवाते हैं और शिवलिंग से आने वाले पानी को रेत के फिल्टरों से गुजार कर जमीन में उतारते हैं. इसके अलावा प्रतिमाओं पर चढ़ाए जाने वाले दूध को जमा करने के लिए पांच फुट के गड्ढे की अलग से जरूरत पड़ी. हिसाब लगाया गया था कि शहर में 300 से ज्यादा मंदिर हैं जहां श्रावण महीने में रोजाना कम से कम 4 करोड़ 50 लाख लीटर जल शिवलिंग अन्य देवी देवताओं की प्रतिमाओं पर चढ़ाया जाता है. इससे जल संरक्षण तो हुआ ही मंदिरों के आसपास रहने वाली कीचड़, गंदगी से भी छुटकारा मिला. 

ठीक ऐसा ही प्रयोग लखनऊ के सदर स्थित द्वादश ज्योतिर्लिग मंदिर में भी किया गया. यहां भगवान शंकर के जलाभिषेक के बाद जल नालियों के बजाय सीधे जमीन के अंदर जाता है. कोई 160 साल पुराने इस मंदिर का  वर्ष 2014 में मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया. 12 ज्योतिर्लिग की स्थापना उनके मूल स्वरूप के अनुसार की गई है. यहां करीब 40 फीट गहरे सोख्ते में सिर्फ अभिषेक का जल जाता है जबकि दूध और पूजन सामग्री को अलग इस्तेमाल किया जाता है. बेलपत्र और फूलों को एकत्रित कर खाद बनाई जाती है. चढ़ाए गए दूध से बनी खीर का वितरण प्रसाद के रूप में होता है. यहीं मनकामेश्वर मंदिर में भी सोख्ते का निर्माण किया गया है. यहां चढ़े फूलों से अगरबत्ती बनाई जाती है. वहीं बेलपत्र और अन्य पूजन सामग्री को खाद बनाने के लिए उपयोग में लाया जाता है. बड़ा शिवालय और छोटा शिवालय में चढ़ने वाले दूध की बनी खीर भक्तों में वितरित की जाती है और जल को भूमिगत किया जाता है.

मध्य प्रदेश के शजापुर जिला मुख्यालय पर स्थित प्रसिद्ध मां राजराजेश्वरी मंदिर में चढ़ने वाले फूल अब व्यर्थ नहीं जाते. इनसे जैविक खाद बनाई जा रही है. इसके लिए केंचुए लाए गए हैं. इस खाद को पास के गांव वाले श्रद्धा से ले जा रहे हैं और अपने खेतों में इस आस्था के साथ इस्तेमाल कर रहे हैं कि देवी कृपा से उनकी फसल अच्छी रहेगी. यहां पर खाद बनाने के लिए मंदिर प्रांगण में चार चक्रीय वर्मी कम्पोस्ट यूनिट का शेड सहित निर्माण किया गया है. मंदिर में नित्य आने वाले श्रद्धालुओं द्वारा फूल व मालायें चढ़ाई जाती हैं. पहले उन फूल व मालाओं को नदी में फेंका जाता था जिससे नदी भी दूषित होती थी. मंदिर प्रांगण में वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने के लिए 12 फीट लम्बे 12 फीट चौड़े और 2.5 फीट गहरे चार टैंक बनाए गए है, जिसके बीच की दीवार जालीनुमा बनाई गई है. इनके ऊपर छाया हेतु टीन शेड भी बनाए गए हैं. सबसे पहले प्रथम टैंक में मंदिर में इकट्ठा होने वाला फूलों आदि का कचरा एकत्रित किया गया. जिसे एक माह सड़ने देने के बाद उसमें केंचुए डाले गए. यह प्रक्रिया तीसरे एवं चौथे टैंक के लिए भी अपनाई गई. इस चक्रीय पद्धति में चौथे महीने से बारहवें महीने तक हर महीने लगभग 500 किलो खाद मिलने लगी है यानी 8 महीनों में 4000 किलो जैविक खाद. इस प्रकार रोज एकत्रित होने वाले फूल-मालाओं के कचरे जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया सतत चलती रहेगी. तैयार होने वाली इस खाद में पोषक तत्वों व कार्बनिक पदार्थों के अलावा मिट्टी को उर्वरित करने वाले सूक्ष्म जीवाणु भी बहुतायत में होते हैं. यह खाद डालने से मिट्टी में समस्त प्रकार के पोषक तत्वों की मात्रा उपलब्धता बढ़ती है और मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति बढ़ती है जिससे फसलों एवं पौधों का सर्वांगीण विकास होकर उत्पादित फसल स्वास्थ्य हेतु लाभप्रद होती है.

मंदिर में चढ़ाए गए फूलों को खाद में बदलने का काम दिल्ली के मशहूर झंडेवालाना मंदिर में भी हो रहा है. इसके अलावा देवास, ग्वालियर, रांची के पहाड़ी मंदिर सहित कई स्थानों पर चढ़ावे के फूल-पत्ती को कंपोस्ट में बदला जा रहा है. अभी जरूरत है कि मंदिरों में पॉलीथीन थैलियों के इस्तेमाल और प्रसाद की बरबादी पर भी रोक लगाने की. इसके साथ ही शिवलिंग पर दूध चढ़ाने के बनिस्बत उसके अलग से एकत्र कर जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी वांछित है.  

यह जानना जरूरी है कि भगवान को पुष्प या बेल पत्र चढ़ाने से भगवान के प्रसन्न होने की परंपरा असल में आम लोगों को अपने घर में हरियाली लगाने को प्रेरित करने का प्रयास था. विडंबना है कि अब लोग या तो बाजार से फूल खरीदते हैं या फिर दूसरों की क्यारियों से उठा लेते है. काश हर मंदिर यह अनिवार्य करें कि केवल स्वयं के बगीचे या गमले में लगाए फूल ही भगवान को स्वीकार करे जाएंगे तो हर घर में हरियाली का प्रसार सहजता से हो जाएगा.  


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