दास्तान-ए-शॉर्ट फिल्म

सिनेमा , , शुक्रवार , 02-02-2018


Story of a Short Film

अविनाश त्रिपाठी

वृद्ध हो चुकी 19वी शताब्दी के पैरहन पर एक दिन सफ़ेद पारदर्शी रौशनी कुछ चित्र खींच देती है. देखते ही देखते इन चित्रों में आत्मा आ जाती है और एक दूसरी दुनिया बसने लगती है. एक नई और पूर्ण कला दुनिया के सामने आती है जिसको लोग सिनेमा के नाम से जानने लगते हैं. दरअसल, सिनेमा वो जादू है जिसमें चमत्कृत करने के भाव तब भी थे, आज भी हैं. 

सिनेमा का अपने शुरुआती दिनों की कुछ मिनट की छोटी कॉमिक फिल्मों से बड़ी फीचर फिल्मों तक का सफर भी अत्यंत रोचक रहा. ग्रिफिथ की 'बर्थ ऑफ़ नेशन' के पहले की ज़्यादातर फ़िल्में कम समय की तथा किसी एक विषय पर केंद्रित थीं. इन छोटी-छोटी फिल्मों में दृश्य संयोजन के अपने-अपने तरीके थे. कोई सर्वमान्य नियम या व्याकरण विकसित नहीं हो पाया था. धीरे-धीरे सिनेमा की विकास यात्रा के दौरान नियम, रचना, एस्थेटिक्स सब बनने लगे. सिनेमा अब एक सम्पूर्ण कला का आकार ले चुका था और इसमें तमाम कला-विधाएँ सम्मिलित हो चुकी थीं. सच तो यह है कि कविता, कहानी, पेंटिंग (किसी एक फ्रेम को फ्रीज़ करके), संगीत इत्यादि विधाओं के सूत्रों का इकट्ठा होकर एक माला गुथना जो करिश्मा करता है, वही वो सिनेमा कहलाता है. इस नए कला माध्यम की न सिर्फ विश्वसनीयता बढ़ रही थी बल्कि खुद बयानी और कहानी कहने के बेहतरीन नैरेटिव की वजह से कई साहित्यकार भी इस माध्यम को अपना रहे थे. ख्वाजा अहमद अब्बास, गुलज़ार सहित कई साहित्यकार सिनेमा को माध्यम से अपनी कहानी कहने लगे. 

लेकिन इस माध्यम की जहाँ अपनी ख़ूबसूरती और परिपूर्णता थी, वहीं इसके अत्यंत महंगा होने के कारण बहुत सी कहानियाँ गर्भावस्था में ही दम तोड़ने लगीं. नतीजतन, कम पैसे में विज़ुअल नैरेटिव की मांग दुबारा से उस विधा की तरफ मुड़ने लगी जहाँ कुछ मिनट में ही अपनी कहानी कही जानी होती है. यही से शार्ट फिल्म ने दोबारा खुद को आधुनिकता में रंग कर ऐसे पेश किया कि हर कोई अपनी कहानी अपने-अपने लहजे में अपनी-अपनी अदायगी से बताने लगा. 

इन तमाम कोशिशों के बावजूद अहम सवाल यह था कि आखिर इस फिल्मों को कहां प्रदर्शित किया जाए. सालों तक अपनी रचनात्मक प्रतिभा का जयघोष करने का माध्यम बनी शार्ट फिल्में देश-विदेश में आयोजित फिल्म फेस्टिवल्स का मुंह देखती रहती थीं. सिर्फ यही एक माध्यम था जो उनकी प्रतिभा को एक छोटा बाजार, देखने को कुछ बुद्धिजीवी और फिल्म-मेकर प्रदान करता था. शॉर्ट फिल्में अभी भी आम इंसान की दस्तरस से बहुत दूर किसी जलते चिराग की तरह थीं. 

इस बड़ी परेशानी को डिजिटल क्रांति ने दूर किया जब डिजिटल कैमरे के साथ-साथ यूट्यूब और विमेओ जैसे सोशल-मीडिया प्लेटफार्मों ने शॉर्ट फिल्मों की रचनात्मक अभिव्यक्ति को आम आदमी की ज़द में ला दिया. यही नहीं, लगभग मुफ्त में उपलब्ध विभिन्न एडिटिंग सॉफ्टवेयरों ने खुद के शूट किये रॉ-फुटेज को एडिट करना भी आसान कर दिया. सस्ते डिजिटल कैमरे द्वारा, जिसे संचालित करने के लिए बड़े और महंगे पाठ्यक्रमों नहीं बल्कि थोड़ी सी एस्थेटिक्स की जानकारी चाहिए, ऑटो-मोड पर भी फिल्म को शूट किया जा सकता था. अब सिनेमेटोग्राफी के लिए गहन तकनीकी ज्ञान, लाइटिंग-सेंस इत्यादि अनिवार्य नहीं रह गए क्योंकि आधुनिक कैमरे खुद ब खुद सब संचालित कर लेते है. बिना मैन्युअल-मोड के कहानी के कथ्य और क्राफ्ट को सुरुचिपूर्ण तरीके से कहा जा सकता था. 

शॉर्ट फिल्म को दिखाने के लिए पूरा विश्व बाजार यूट्यूब जैसे डिजिटल वीडियो प्लेटफार्म के रूप में उपलब्ध था. सिर्फ अभिव्यक्ति और रचनात्मक प्रक्रिया ही नहीं, अब कम लागत के रिटर्न की भी आस हो गयी. एक निश्चित संख्या से ज़्यादा दर्शक मिलने पर यूट्यूब फिल्मकार को पैसा भी देना लगा. 

इस प्रक्रिया ने विश्व सहित भारत के शार्ट फिल्म बनाने वालों के लिए क्रांति का काम किया. अब दिल में फांस की तरह गड़ी हुई बहुत सी कहानियाँ, दर्द में रूह खुरचती कविताएं, ख़ुशी में खिलखिलाती कलेजे से निकली बातें अब रुपहले परदे की मुन्तज़िर नहीं रह गयीं. कोई भी साधारण डिजिटल कैमरे से फिल्म बनाकर यूट्यूब जैसे माध्यम पर अपलोड कर देता और लोग उनकी कहानी कहने की कला पर वारे-वारे हो जाते. समाज की बहुत सी बातें, कहानी कहने के नए क्राफ्ट, कविताएं सब के सब कभी शार्ट फिल्म तो कभी विसुअल डाक्यूमेंट्स की तरह उभरने लगीं. यूट्यूब विसुअल माध्यम का दरिया बन गया. युवा फिल्मकार साल दर साल किसी बड़े फिल्म निर्माता का असिस्टेंट होने के बजाय अपनी कहानी अपने लहजे में कहते हुए अपने क्राफ्ट के बल पर बड़े प्रोडक्शन हाउस के दरवाजे पर दस्तक देने लगे. 

देश में शार्ट फिल्म फेस्टिवल को पॉपुलर बनाने में बड़ा योगदान देने वाले शामियाना के संस्थापक सायरस फ दस्तूर के मुताबिक आजकल की व्यस्त दुनिया में लोगों का अटेंशन-स्पेन बेहद कम हो गया है. ऐसे में मोबाइल पर अच्छे कंटेंट वाली शार्ट फिल्म देखना उनके लिए सुविधाजनक होता है. हालाँकि सायरस के अनुसार जैसा कि लोगों को लगता है यूट्यूब पैसा कमाने का बेहतर माध्यम नहीं है. नेटफ्लिक्स जैसे कुछ डिजिटल प्लेटफार्म ज़रूर बेहतर रिटर्न दे रहे है.  

अपनी कहानी को अलग लहजे में कहने के लिए कई बड़े फिल्म मेकर भी आजकल शार्ट फिल्म का सहारा ले रहे है. अनुराग कश्यप, सुधीर मिश्रा सहित कई प्रतिष्ठित फिल्म मेकर भी आजकल कम बजट की शार्ट फिल्म बना रहे है.  'मिस्ट्री मै' और 'किलर ऑन द रैम्पेज' जैसी चर्चित शार्ट फिल्म बनाने वाली विभा सिंह ने शार्ट फिल्म को क्रिएटिव एक्सप्रेशन का सबसे बेहतर माध्यम बताया. विभा के अनुसार बेहद महंगे हो गए फिल्म माध्यम में शार्ट फिल्म एक निर्देशक के रचनात्मक अभिव्यक्ति का सस्ता, कारगर और बेहतर माध्यम है. यही नहीं बल्कि नेटफ्लिक्स और अमेज़न जैसे माध्यम ने शॉर्ट फिल्मों को बेहद मजबूत और डिजिटल प्लेटफार्म उपलब्ध करवा दिया है. 

नई पीढ़ी की निर्भरता डिजिटल मीडिया पर बढ़ने की वजह से अब ये फिल्म अच्छा व्यावसायिक प्रोडक्ट भी बन रही है. यही वजह रही की पिछले कुछ वक़्त में टीवी सीरीज की तुलना में वेब सीरीज या वेब एपिसोड का चलन बेहद तेज़ी से बढ़ा है. अब युवा फिल्म मेकर टीवी या बड़े परदे पर अपनी फिल्म प्रदर्शित करने के बजाय सीधे डिजिटल प्लेटफार्म  पर रिलीज़ कर रहे है. देखते-देखते वेब फिल्मों का भी दौर आ गया है जहाँ पर करोड़ों रुपये लगाकर सिर्फ इस माध्यम के लिए फिल्म बनायीं जा रही है जो अब डिस्ट्रीब्यूटर, थिएटर की मोहताज़ नहीं. यही नहीं, बहुत से लेखक, कवि तथा अन्य साहित्यकार भी अपनी रचनाओं को विज़ुअल लहजा देकर डिजिटल प्लेटफार्म पर ला रहे हैं जिससे नयी पीढ़ी उनकी रचनाओं अपने ग्राह्य तरीके से सुन पाए और आनंद ले सके. 

इसमें शक नहीं कि शार्ट फिल्म इस वक़्त अपने सबसे बेहतर काल में है जहाँ न सिर्फ उसे बड़ा दर्शक वर्ग मिल रहा है बल्कि लागत कम और अच्छे रिटर्न की भी संभावना बढ़ी है. 


Leave your comment/अपनी प्रतिक्रिया दे