विदेशी धरती पर देसी न्यूटन

सिनेमा , , शनिवार , 14-10-2017


Indigenous newton on foreign soil

हरिश्री

“ऑस्कर में भारत का प्रतिनिधित्व करना सम्मान की बात है. यह फिल्म देश में लोकतंत्र को और मजबूत करने की जरूरत पर सबका ध्यान आकर्षित करेगी. फिल्म अभी थिएटर में रिलीज हुई है और इस घोषणा से इसके दर्शकों की संख्या में इजाफा होगा.” ‘न्यूटन’ के डायरेक्टर अमित वी. मसूरकर ने फिल्म के ऑस्कर में भारतीय एंट्री चुने जाने के मौके पर यह कमेंट किया था. उनका यह अंदाजा फिल्म के रिलीज के दिन बीतने के साथ-साथ सही निकलता नजर आया. सूत्रों की मानें तो लगभग आठ करोड़ रुपए बजट की फिल्म ने पहले दिन सिर्फ 96 लाख ही कमाए थे. लेकिन उसके बाद वर्ड ऑफ माउथ ने काम किया और फिल्म ने दूसरे दिन 2.52 करोड़ और तीसरे दिन 3.42 करोड़ कमाए, यह आंकड़े इशारा कर देते हैं कि फिल्म में हर वह बात है जो उसे दर्शकों से जोड़ने का काम करती है. फिर वह चाहे कसावट भरी कहानी, अपने से लगने वाले किरदार या फिर सभी कलाकारों की सधी हुई एक्टिंग हो. हर मोर्चे पर न्यूटन दिल जीत लेती है. फिल्म के सीधे-सादे डायलॉग, 'देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर' वाला भाव देते हैं. 

न्यूटन का सफर राजकुमार राव के लिए आसान नहीं रहा. इस सफर के दौरान उन्होंने अपनी मां को खो दिया था. आज जो भी फिल्म को मिल रहा है, उसके लिए राजकुमार अपनी मां की दुआओं का ही फल मानते हैं. वे कहते हैं, 'न्यूटन के साथ जो कुछ भी अच्छा हो रहा है, वह मेरी मां के आशीर्वाद की वजह से है.” 

कौन हैं ये राजकुमार राव

हरियाणा के गुड़गांव के रहने वाले राजकुमार दिल्ली के आत्मा 



राम सनातन धर्म कॉलेज से ग्रेजुएशन किए हैं. उसके साथ ही उन्होंने थिएटर करना भी शुरू कर दिया और 2008 में पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआइआइ) से एक्टिंग में ग्रेजुएशन किया. ग्रेजुएशन के बाद वे लगे डायरेक्टर-प्रोड्यूसर्स के चक्कर काटने. कुछ क्लिक नहीं कर रहा था. 

एक दिन एक विज्ञापन देखकर कि किसी बड़े डायरेक्टर को नए कलाकार की तलाश थी, राजकुमार ऑडिशन के लिए पहुँच गए और सिलेक्ट हो गए. डायरेक्टर दिबाकर बनर्जी थे और फिल्म थी ‘लव सेक्स और धोखा’. यह फिल्म सफल रही. इसके बाद ‘रागिनी एमएमएस’ की, जो कामयाब रही. वे अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में भी नजर आए. इसके बाद उनका करियर तेजी से दौड़ने लगा. वे आमिर खान के साथ ‘तलाश’ में भी दिखे. हर फिल्म के साथ उनका अभिनय निखरता जा रहा था, और वे तेजी से लोकप्रियता के पायदान चढ़ते जा रहे थे. 2013 में ‘काई पो चे आई’ और गोविंद के किरदार ने उन्हें खूब तारीफ दिलाई. लेकिन टर्निंग पॉइंट रहा हंसल मेहता के साथ आना. हंसल मेहता के साथ उन्होंने ‘शाहिद’ की जिसकी कहानी मानवाधिकार वकील शाहिद आजमी की जिंदगी पर आधारित थी. उनकी एक्टिंग इतनी शानदार रही कि उन्हें इस फिल्म की वजह से बेस्ट एक्टर के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से भी नवाजा गया. कंगना रनोट के साथ ‘क्वीन’ भी की, लेकिन फिर नजरें टिकीं तो हंसल मेहता की ‘सिटीलाइट्स’ पर. वे सोनम कपूर के साथ ‘डॉली को डोली’ और विद्या बालन के साथ ‘हमारी अधूरी कहानी’ में भी नजर आए. लेकिन दोनों ही फिल्में न तो क्रिटिक्स को पसंद आईं और न ही दर्शकों के गले ही उतरीं. अब तक वे हंसल मेहता के फेवरिट एक्टर बन चुके थे. दोनों ने ‘अलीगढ़’ की और अब इन दिनों राजकुमार उनकी अगली फिल्म ‘ओमर्ता’ में भी हैं. वे जब भी हंसल मेहता के साथ आते हैं, हंगामा बरपा जाते हैं.

 राजकुमार राव के लिए 2017 खास है क्योंकि इस साल उनकी रिलीज हुई ‘बरेली की बर्फी’ सुपरहिट रही है और अब न्यूटन ने अच्छी कमाई के साथ ऑस्कर में एंट्री भी हासिल कर ली है. यही नहीं, वे ऐश्वर्या राय की अगली फिल्म ‘फन्ने खां’ में भी अहम रोल कर रहे हैं.

क्या किस्सा है न्यूटन का

न्यूटन की कहानी नूतन कुमार की है. नूतन को अपना नाम पसंद नहीं था. उसने दसवीं कक्षा में अपने नाम नूतन के नू को न्यू कर दिया और तन को टन. इस तरह नाम बदल गया और इम्प्रेसिव भी हो गया. न्यूटन एक सरकारी कर्मचारी है. उसकी ड्यूटी छत्तीसगढ़ में निष्पक्ष चुनाव कराना है. इस डार्क कॉमेडी को जंगलों में माओवादियों के खौफ के जरिये पिरोया गया है. न्यूटन हर काम कायदे से करता है. चाहे वह शादी की बात हो या इलेक्शन ड्यूटी की, वह किसी को बख्शता नहीं है. 

न्यूटन की सफलता की वजह इसका एक ईमानदारी के साथ ऐसे विषय को दिखाना है जो हमारे सामने होता तो हैं, लेकिन हम अक्सर नजरअंदाज कर जाते हैं. न्यूटन बड़े बजट में यकीन करने वाले बॉलीवुड को यह बात भी सिखाती है कि दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचकर लाने के लिए हल्ला-गुल्ला या चमक-धमक की जरूरत नहीं है, चाहिए तो सिर्फ एक सॉलिड कहानी और दिल को छू लेने वाली अदाकारी. यह न्यूटन में कूट-कूटकर भरी हुई है. फिल्म में राजकुमार राव ही नहीं, पंकज त्रिपाठी, रघुवीर यादव और अंजलि पाटील सरीखे कलाकारों ने बहुत ही साधारण अंदाज में बहुत ही प्रभावी अभिनय किया है. न्यूटन हमें यह भी बताती है कि कोई भी फिल्म एक टीमवर्क है, न कि किसी एक सितारे पर लादा हुआ बोझ.

यूं पूरा हुआ ऑस्कर का सफर

न्यूटन ने रिलीज होने से पहले ही दुनिया भर में अपना डंका बजा दिया था. इसका बर्लिनेल-2017 में वर्ल्ड प्रीमियर हुआ था जहाँ इसने सीआईसीएई आर्ट सिनेमा अवार्ड जीता था. 41वें हॉन्गकॉन्ग फिल्म फेस्टिवल-2017 में इसका एशिया प्रीमियर हुआ था और यहां इसे बेस्ट फिल्म का ज्यूरी प्राइज मिला था. 15वें ट्राइबेका फिल्म फेस्टिवल-2017 में इसका नॉर्थ अमेरिकन प्रीमियर हुआ था और इसे इंटरनेशनल नैरेटिव कंपिटीशन सेक्शन में दिखाया गया था. 22 सितंबर को इसके रिलीज के दिन ही फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया के सेक्रेटरी जनरल सुपर्ण सेन ने इसके ऑस्कर में भारतीय एंट्री बनाने की खबर दी. यह बेस्ट फॉरेन फिल्म लैंग्वेज कैटेगरी में जाएगी. फिल्म को मनीष मुंदड़ा ने प्रोड्यूस किया है और अमित वी. मसूरकर ने डायरेक्ट. ऑस्कर कमेटी की अध्यक्षता तेलुगु प्रोड्यूसर सी.वी. रेड्डी ने की थी. रेड्डी ने कहा, “हमें 26 एंट्रीज मिली थीं, लेकिन न्यूटन को समिति के सभी सदस्यो ने पसंद किया और सर्वसम्मति से यह फैसला लिया गया.” 

पैदा होने लगे हैं विवाद

न्यूटन के ऑस्कर के लिए भारत का दांव होने के साथ ही इस पर कहानी उठाने के आरोप भी लगने लगे. कहा जा रहा है कि फिल्म ईरानी फिल्म सीक्रेट बैलेट (2001) से प्रेरित है. हालांकि इस आरोप पर डायरेक्टर अनुराग कश्यप ने ट्वीट कर कहा, “न्यूटन बर्लिन फिल्म महोत्सव की पुरस्कार विजेता फिल्म है और मैं आपसे दावे से कह सकता हूं कि जिन्होंने इस फिल्म को पुरस्कृत किया है वह एक साल में इतनी फिल्में देखते हैं जितनी हम अपने जीवन भर में नहीं देख सकते.”  उनका कहना एकदम सही भी है क्योंकि न्यूटन दुनिया भर के फिल्म उत्सवों में घूमकर आई है. अगर उसकी कहानी के साथ कोई गड़बड़ होती तो उसे इस तरह सम्मान नहीं मिला होता. इस तरह के विवाद तो आते रहते हैं, लेकिन राजकुमार राव जैसा कलाकार भारतीय फिल्म को लंबे अरसे बाद मिला है.  


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Harihar Vaishnav :: - 01-16-2018
Is film me Bastar ke kalakaron ne bhi abhinay kiya hai. Kondagaon, jo mera grih nagar hai, ke do kalakaron ne bhi. Kya Gambhir Samachar in dono kalakaron ke sakashatkar chhapna chagega? Kahein to bhejun.