परदे पर पहचानः जन्म से नहीं हुनर से

सिनेमा , , सोमवार , 13-11-2017


Identity on screen not by birth

विनोद अनुपम

राज कपूर के बारे में कहा जाता है, 22 वर्ष की उम्र में अपनी पहली फिल्म ‘आग’ की परिकल्पना को साकार करने के लिए अपनी नवविवाहिता पत्नी के जेवर तक बेचने पड़े थे. पृथ्वीराज कपूर ने न तो आर्थिक, न ही अपने प्रभाव का कोई सहयोग राज कपूर को लेने दिया, हालांकि वे उस दौर में हिन्दी सिनेमा के शीर्ष नामों में शुमार किए जा रहे थे, और उनकी इतनी प्रतिष्ठा थी कि वे सिर्फ इशारे से अपने बेटे के लिए सभी सुविधाएं जुटा सकते थे. लेकिन पृथ्वीराज कपूर का मानना था जब मैं अपनी जगह बना सकता हूं, तो ये क्यों नहीं. राज कपूर ही नहीं, अपने बेटे शम्मी कपूर और शशि कपूर को भी स्पाट व्वॉय बनने से अधिक का सहयोग नहीं दिया. उन्होंने न तो उन्हें कभी अभिनय सिखाने की जरुरत समझी, न लांच करने की, न ही कभी किसी पैरवी की जरुरत समझी, आश्चर्य नहीं कि तीनों की विकास प्रक्रिया एकदम अलग-अलग रही. हिन्दी सिनेमा में तीनों ने अपनी अलग अलग पहचान बनायी. राजकपूर के बारे में कहा जाता है, पृथ्वीराज कपूर ने उन्हें पहला काम पृथ्वी थिएटर में सफाई का सौंपा था. इसके एवज में उन्हें उतने ही पैसे मिलते कि वे बस से घर लौट सकते थे. कपूर घराने से जुड़े रहे फिल्म पत्रकार जय प्रकाश चौकसे अपनी किताब ‘राजकपूर सृजन प्रक्रिया’ में लिखते भी हैं, ‘पृथ्वी थियेटर में शो के बाद पृथ्वीराज कपूर के कमरे में दिग्गजों की महफिल लगती थी. राज कपूर एक कोने में बैठकर विद्वानों की बातें सुना करते थे. सभा के अन्त में पृथ्वीराज सारी बातें अत्यन्त सरल शब्दों में प्रस्तुत करते थे और उनकी इस योग्यता का राज कपूर पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा. राज कपूर ने बहुत गौर से देखा कि किस प्रकार उनके पिता अपनी मनपसन्द थीम पर लेखकों से नाटकों की पटकथा लिखवाते थे.... सबके जाने के बाद साफ सफाई कर करा के राज कपूर ऑपेरा हाउस से माटूंगा की ओर पैदल रवाना होते थे.... उतनी रात बस या ट्रेन मिलने का सवाल नहीं था. और टैक्सी के लिए पैसे नहीं होते थे. अत: सारे वार्तालाप की जुगाली करते हुए राजकपूर अलसभोर में घर पहुंचते थे.’ स्वभाविक है राजकपूर के संघर्ष, समर्पण और समझ के सामने ‘नेपोटिज्म’ या ‘भाई भतीजावाद’ या ‘वंशवाद’ की सारी बातें बेमानी हो जाती हैं.

पृथ्वीराज कपूर के परिवार में जन्म लेना राजकपूर के लिए कोई इच्छा का मामला नहीं था, लेकिन सिर्फ इस बात के लिए नेपोटिज्म की बात कर राजकपूर और राजकपूर जैसे कई कलाकारों की प्रतिभा को नजरअंदाज करना कहीं से भी जायज नहीं माना जा सकता. वास्तव में नेपोटिज्म का सवाल किसी का बेटा, किसी का भाई, बहन या भतीजा होने पर नहीं उठाया जा सकता, सवाल उसके अतिरिक्त लाभ लेने पर उठाया जा सकता है. आज किसे ए आर रहमान के म्यूजिक कम्पोजर पिता आर के शेखर का नाम याद है. 9 वर्ष की उम्र में उनके पिता का देहांत हो गया और 11 वर्ष की उम्र में उन्होंने संगीत बनाने की शुरुआत कर दी. क्या इनकी सफलता की वजह किसी नेपोटिज्म में तलाश की जा सकती है. उनके पिता दक्षिण भारतीय फिल्मों तक सीमित रहे, ए आर रहमान के संगीत का प्रभाव सारी भौगोलिक सीमाओं को तोड़ कर विश्वविजय में सफल रहा. जब राहुल गांधी अमेरिका में कहते हैं भारत में हरेक क्षेत्र राजनीति, उद्योग, सिनेमा में नेपोटिज्म है तो वे भूल जाते हैं कि आखिरी निर्णायक जनता होती है, लोग होते हैं, दर्शक होते हैं, उपभोक्ता होते हैं. उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह काम किसके भाई, भतीजे या बेटे के द्वारा हो रहा हैं, उसे बस इतने से मतलब है कि उसकी कीमत वसूल हो रही है या नहीं, कौन उसके लिए सबसे बेहतर कर रहा है.

नेपोटिज्म का टैग लगा कर राहुल गांधी भले ही इंदिरा गांधी के साथ खड़े होने पर खुश हो सकते हैं, लेकिन कभी मौका मिले तो उन्हें नेहरु जी द्वारा जेल से लिखे इंदिरा गांधी के पत्रों का संग्रह ‘पिता का पत्र पुत्री के नाम’ अवश्य पढ़ना चाहिए कि किस तरह नेहरु जी ने इंदिरा गांधी की वैचारिक जमीन बचपन से ही तैयार करने की शुरुआत कर दी थी. किस तरह राजनीति में कदम दर कदम उन्होंने कदम मजबूत किए उसका श्रेय कभी किसी दूसरे को नहीं दिया जा सकता. वास्तव में राजनीति में नेपोटिज्म के बल पर खड़े होने की जगह तो मिल सकती है, उसे विस्तार नेपोटिज्म की छाया से मुक्त होकर ही दिया जा सकता है. आज किसे नवीन पटनायक के साथ बीजू पटनायक की याद आती है. 

हिन्दी सिनेमा जैसे विशेषज्ञता वाले क्षेत्र में नेपोटिज्म के सवाल को  हाल ही में नए सिरे से कंगना रनौत ने उठाया. करण जौहर के एक टेलीविजन शो में सीधे करण जौहर को ही उसने नेपोटिज्म का सबसे बड़ा अलंबरदार घोषित कर दिया. कुछ दिनों बाद हुए एक अवार्ड शो में करण जौहर, वरुण धवन और सैफ अली खान ने नेपोटिज्म 



के सवाल पर कंगना का सार्वजनिक मजाक उड़ाते हुए बेशर्मी से अपनी सफलता का श्रेय नेपोटिज्म को दिया. हालांकि दूसरे ही दिन वरुण धवन ने ट्वीटर पर माफी मांग ली. सवाल यह है कि यदि वाकई बालीवुड नेपोटिज्म से ग्रसित है  फिर कंगना, आज कंगना कैसे बनी है. आज कंगना हिन्दी सिनेमा की सबसे पावर फुल अभिनेत्रियों में एक मानी जा रही है. वह अभिनेताओं के बराबर मेहनताने की मांग कर रही है. फिल्म की डिजाइनिंग, स्क्रिप्टिंग में वह घोषित रूप से हस्तक्षेप करने की स्थिति में है, जिस स्थिति में दीपिका और कटरीना तक नहीं. कंगना इसलिए हस्तक्षेप की स्थिति में है कि उसने अभिनय के साथ बकायदे अमेरिका जाकर पटकथा लेखन की पढ़ाई की है. वह फिल्म निर्देशन और निर्माण के तत्वों को समझने की कोशिश कर रही है. हिन्दी क्षेत्र हिमाचल से आने के कारण हिन्दी समाज और हिन्दी भाषा के प्रति उसकी एक खास समझ है, जिसका प्रभाव उसके लेखन, उसकी बातचीत और उसके अभिनय में दिखता भी है.

सोनाक्षी सिन्हा तो शत्रुघ्न सिन्हा जैसे प्रभावशाली अभिनेता और राजनेता की बेटी है. सलमान खान जैसे पारस पत्थर माने जाने वाले अभिनेता ने उसे ब्रेक दिया. यदि नेपोटिज्म सफलता की शर्त होती तो आज बालीवुड के केन्द्र में कंगना रनौत नहीं, सोनाक्षी सिन्हा होती. कंगना ही क्यों, हिन्दी सिनेमा की किस अभिनेत्री की सफलता का श्रेय नेपोटिज्म को दिया जा  सकता है, दीपिका पादुकोण, कटरीना कैफ, अनुष्का शर्मा, याद करें भूमि को पहला ब्रेक किस भूमिका के लिए मिला, आज वह अक्षय कुमार के साथ लीड कर रही है, कहां है नेपोटिज्म. राजेश खन्ना, डिम्पल खन्ना दो-दो सफल और कुशल कलाकारों की विरासत लेकर आयी ट्वींकल खन्ना परदे पर आयीं और चली गई. हेमा मालिनी और धर्मेन्द्र की पहचान के साथ इसा देओल धूमधाम से आयीं और चुपके से चली गई. हिन्दी सिनेमा आज इन्हें याद करने की भी जरुरत नहीं समझता. सुनील शेट्टी की बेटी आथिया शेट्टी का नाम आज कितने लोग याद करते हैं और कितनी फिल्में उसके पास हैं. वास्तव में दर्शक जब पैसे खर्च कर सिनेमा देखने जा रहा होता है, तो वह कहानी देखने जा रहा होता है, जो उसकी संवेदनाओं को छूते हुए उसका मनोरंजन कर सके. उसे फर्क नहीं पड़ता कहानी किसके माध्यम से कही जा रही है. जो जितनी खूबसूरती से उस तक कहानी संप्रषित कर दे, उसकी नजर में वही सितारा. आखिर कोई तो बात होगी कि पंजाब के एक छोटे से शहर से निकला जतिन खन्ना, हिन्दी सिनेमा का राजेश खन्ना बन कर लोकप्रियता की तमाम सीमाएं तोड़ देता है. अपने जमाने के जुबली कुमार के रूप में जाने जानेवाले राजेन्द्र कुमार अपने बेटे कुमार गौरव को लांच करने के लिए जी जान लगा देते हैं, पहली फिल्म ‘लव स्टोरी’ बड़ी हिट भी होती है, लेकिन दो से तीन फिल्मों के बाद कुमार गौरव हाशिए से भी बाहर हो जाते हैं. वास्तव में नेपोटिज्म के बल पर एक मौके आपको ज्यादा मिल सकते हैं, सफलता तय करने का अधिकार जिसके हाथ में है, उसके लिए इसका कोई मतलब नहीं.

यदि नेपोटिज्म की बात करें तो अमिताभ बच्चन से बेहतर उदाहरण नहीं मिल सकता. शुरुआती दिनों में सिनेमा के सभी दरवाजे से दुत्कारे जाने के बाद लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी फिल्म ‘सात हिन्दुस्तानी’ में इस कविपुत्र को छोटी सी भूमिका सौंपी. आज जो अमिताभ दिखते हैं वह कोई कविपुत्र होने के कारण नहीं, यह उनका दशकों का श्रम और समर्पण है. यदि वाकई हिन्दी सिनेमा में नेपोटिज्म प्रभावी होता तो अपने बेटे अभिषेक बच्चन को सफल अभिनेताओं की पंक्ति में खड़ा करने में उन्हें कितनी देर लगती. आज भी अमिताभ बच्चन को लीड भूमिकाएं मिल रही हैं, अभिषेक को अव्वल तो भूमिकाएं मिल ही नहीं रहीं, मिल भी रही हैं तो सेकेंड थर्ड लीड में ‘हैप्पी न्यू इयर’ की तरह हास्यास्पद. वास्तव में सिनेमा ऐसा माध्यम है जहां पूंजी इनवाल्व होती है. अमिताभ बच्चन भी खुद की फिल्म बनाएंगे तो वे शायद अभिषेक को नायक के रूप में नहीं लेना चाहें, क्योंकि रिटर्न की गुंजाइश कम हो जाएगी. और संबंधों के निर्वाह के लिए कौन अपनी पूंजी डुबोना चाहेगा.

वरुण धवन खुश हो सकते हैं कि वे अपने समय के सफल निर्देशक डेविड धवन के बेटे हैं. पिता का नाम लेना अच्छी बात है, लेकिन क्या उन्हें अभी तक इस बात का विश्वास नहीं कि उनकी सफलता की वजह डेविड धवन का बेटा होना नहीं है. यदि पिता के ही नाम से सफलता मिलती तो हैरी बावेजा के बेटे हरमन बावेजा को 38 साल की उम्र में इंडस्ट्री छोड़नी नहीं पड़ती. जबकि प्रियंका चोपडा, आशुतोष गोवारीकर जैसे बड़े नामों का साथ उसे मिला. वरुण सफल हैं तो इसलिए कि इस दौर के तमाम नायको से अलग वे अपनी पहचान बनाने की कोशिश में लगे हैं. नेपोटिज्म पर तुषार कपूर से बड़ा सवाल और क्या होगा, अपने समय के सफल अभिनेता जीतेन्द्र के बेटे और आज की सफल निर्मात्री एकता कपूर के भाई तुषार कपूर कभी भी सफलता का मुंह नहीं देख सके. कुछ पहचान मिली भी तो अश्लील फिल्मों की द्विअर्थी भूमिकाओं से. आखिर क्यों एकता कपूर अपनी फिल्मों के लिए नए अभिनेताओं पर तो भरोसा कर लेती है, लेकिन तुषार कपूर पर नहीं कर पाती. यदि कंगना और राहुल गांधी की बातें सही है तो एकता कपूर की सभी फिल्मों में तुषार कपूर को नायक होना चाहिए.

संजय लीला भंसाली की बिरले ही फिल्में फ्लाप होती हैं. जिसमें एक है ‘सांवरिया’. इस फिल्म के साथ उन्होंने ऋषि कपूर के बेटे रणबीर कपूर और अनिल कपूर की बेटी सोनम कपूर को लांच किया था. हालांकि बाद के दिनों  में रणबीर कपूर और सोनम दोनों ही सफल हे, लेकिन इस फिल्म को दर्शकों ने ततवज्जो नहीं दी. यदि वाकई नेपोटिज्म का कुछ प्रभाव सिनेमा पर है तो दोनों सितारों की पहली ही फिल्म को सफल करना चाहिए. लेकिन सच यही है कि दोनों को दर्शकों ने तब तक तवज्जो नहीं दी जबतक दोनों अपनी स्वतंत्र पहचान और क्षमता दिखाने में सफल नहीं हुए.

बात नेपोटिज्म की है तो सवाल आमिर खान और सलमान खान पर भी होनी चाहिए. आमिर खान अपने समय के मशहूर निर्देशक ताहिर हुसैन के बेटे हैं, जिन्होंने तीसरी मंजिल जैसी एक से एक हिट फिल्में दी. क्या दंगल जो आज चीन और जापान में सफलता के रिकार्ड बना रही है, उसकी वजह आमिर खान का ताहिर हुसैन का बेटा होना है. सलीम खान होंगे अपने समय के मशहूर पटकथा लेखक, लेकिन सलमान ने सफलता का जो सफर तय किया, वह कभी सलीम खान से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता. कंगना रनौत ऋतिक रोशन के बारे में कहती है उसके पास अपना क्या है, उसके पिता राकेश रोशन के पास पैसे हैं, करोड़ों लगा कर फिल्म बना देते हैं, हिट हो जाती है. कंगना जैसी फिल्म को समझने वाली लड़की जब ऐसा कहती है तो सिवा पूर्वाग्रह के और कुछ नहीं दिखता, क्या इतना आसान है हिट होना. यदि हिट होना इतना ही आसान होता तो कोई भी अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र या हैरी बावेजा अपने बेटे को सुपर स्टार बनाने से नहीं चूकता.

अब बस आखिरी बात करण जौहर की जो गर्व से नेपोटिज्म के आरोप को स्वीकार कर रहे. क्या उन्हें अंदाजा नहीं कि ‘कभी खुशी कभी गम’ का निर्देशक आज क्या कर रहा है. आपको न हो, दर्शक देख रहे हैं.

 


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