परदे पर फ्लाप रही हिन्दी की हिट कहानी

सिनेमा , , शुक्रवार , 02-02-2018


Hindi story of floppy flop

विनोद अनुपम

फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी ‘पंचलाइट’ चाहे जितनी हमें गुदगुदाती रही हो, प्रेम मोदी ने जब उसे परदे पर साकार किया तो हिन्दी सिनेमा की भवें तक नहीं हिलीं. फिल्मकार की तमाम कोशिशों के बावजूद न तो उसे कायदे से थिएटर मिले, न ही दर्शक. कहते हैं शैलेन्द्र ने ‘तीसरी कसम’ बनाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था. आज यह फिल्म भले ही क्लासिक मानी जाती है, लेकिन उस समय फिल्म नहीं चली और शैलेन्द्र टूट गए, जिसकी परिणति उनके मौत से हुई. रेणु ही क्यों, काशी नाथ सिंह की ‘काशी का अस्सी’ हिन्दी का बेस्टसेलर भले ही न हो, लेकिन उसके बहुचर्चित और बहुपठित कहे जाने पर शायद ही किसी की असहमति हो. कहा जाता है जब ‘हंस’ में इस विलक्षण कृति के अंश छप रहे थे, आम पाठकों के बीच इसका सामूहिक पाठ किया जाता था. यह कथा पाठकों को बनारस में होने का अहसास देती थी. शायद इसीलिए डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने जब इसका चयन फिल्म के लिए किया तो पाठकों के मन में रची बसी इस कथा को साकार करने के लिए वास्तविक लोकेशन को प्राथमिकता दी. बनारस, अस्सी, अस्सी की चाय दुकान कथा के तेवर के अनुरूप ही उन्होंने उतारने की कोशिश की. इतना ही नहीं कहानी की मूल भावना को कोई आघात न पहुंचे, इस उद्देश्य से कथाकार काशीनाथ सिंह को पटकथा से लेकर शूटिंग तक उन्होंने ससम्मान साथ रखा. ‘तीसरी कसम’ के बाद शायद यह पहला अवसर था, जब कहानीकार किसी अपनी फिल्म से इस शिद्दत से जुड़ा दिख रहा था. लेकिन फिल्म जब बन कर पूरी हुई, तो सनी देओल जैसे सितारे के बावजूद यह थियेटर तक नहीं पहुंच सकी. अपने ‘मोहल्ला अस्सी’ को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए डॉ. द्विवेदी की कोई भी कोशिश सफल नहीं हो सकी और अंततः वे भी इसे भूल गए. हालांकि उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और इस वर्ष फिर पत्रकार राम कुमार सिंह की कहानी पर ‘जेड प्लस’ का निर्माण किया. सुखद रहा कि फिल्म को रिलीज मिली, लेकिन दर्शक उसके व्यंग्य को स्वीकार नहीं कर सके, और एक बार फिर ‘पिंजर’ के निर्देशक की सिनेमा को साहित्य से जोड़ने की कोशिश नाकाम हो गई.

आमतौर पर हिन्दी साहित्य और सिनेमा का रिश्ता, यदि सिनेमा के आरंभिक दिनों की बात छोड दें तो कभी करीब का नहीं रहा. दादा साहब फालके मानते थे कि यह विधा सिर्फ मनोरंजन के सहारे नहीं बढ़ सकती, इसे अपनी सोद्देश्यता स्थापित करनी होगी. उन्हें अहसास था कि इस देश में कोई भी कला विधा रामायण और महाभारत को नकार कर आगे नहीं बढ़ सकती, सिनेमा जैसी युवतम कला विधा तो कतई नहीं. उन्होंने स्वयं ‘भस्मासुर मोहिनी’, ‘नल-दमयन्ती’, ‘लंका दहन’, ‘श्रीकृष्ण जन्म’ जैसी पौराणिक व ऐतिहासिक कथानकों पर 125 फिल्में बनायी. लेकिन उनके परवर्ती फिल्मकारों को सिनेमा को मनोरंजन का साधन बनाना अधिक सहज और सुरक्षित लगा. आश्चर्य नहीं कि प्रेमचंद और भगवती चरण वर्मा जैसै साहित्यकार बगैर किसी सार्थक हस्तक्षेप के आरंभिक दौर में ही सिनेमा को छोड़कर वापस साहित्य की दुनिया में आ गये. ‘मिल मजदूर’ तो प्रेमचंद ने खासतौर से फिल्म के लिए ही लिखी थी, लेकिन उनकी कृतियों का हिन्दी समाज में सम्मान को देखते हुए बाद में उनके उपन्यास ‘गोदान’, ‘सेवा सदन’ और ‘गबन’ को भी फिल्माने की कोशिश हुई, परन्तु बगैर किसी साहित्यिक प्रतिबद्धता के इतने आधे अधूरे मन से कि कहीं भी न तो मूल रचना का आस्वादन दर्शकों को हो सका, और न ही सिनेमा की कसौटी पर वे खरी उतर सकी. प्रेमचंद ने स्पष्ट कहा, ‘साहित्य में जो भावों की उच्चता, भाषा की प्रौढ़ता, सुन्दरता की साध्ना है, वह हमें वहां नहीं मिली.’ अंततः भगवती चरण वर्मा के उपन्यास ‘चंद्रलेखा’ पर आधारित फिल्म की सफलता के बावजूद यह मान लिया गया कि हिन्दी की साहित्यिक कृतियों का सिनेमाई रूपांतरण नहीं किया जा सकता.

महान फिल्मकार तारकोवस्की ने कहा था, ”अगर दृश्यविधान स्वयं ही साहित्य का उज्जवल सृजन हो तो उसका सुन्दर साहित्यिक गद्य बना रहना ही बेहतर है. अगर उस पर फिल्म बनाना हो तो उसे पटकथा में रुपांतरित करना होगा ताकि वह निर्देशक के काम के लिए तर्क संगत आधार बन सके. इस बिन्दु पर वह नयी रचना होगी, जिसमें साहित्यिक बिम्ब सिनेमाई ‘पर्यायों’ में तब्दील हो जाएंगे.“ बावजूद इसके सिनेमा को साहित्य से जोड़ने की कोशिश इसके आविष्कार के कुछेक वर्षों बाद ही शुरू हो गयी थी. हजारों साल के इतिहास और परम्परा को समेटे शाब्दिक भाषा के सामने नवजात सिनेमाई भाषा का समर्पण कोई अनहोनी भी नहीं थी. सिनेमा को दिखाने के लिए ‘दृश्य’ की जरूरत थी, सुनाने के लिए ‘संवाद’ की और ये दोनों ही शाब्दिक अभिव्यक्ति के रूप में साहित्य के पास थे. आश्चर्य नहीं कि ‘वार एण्ड पीस’ से लेकर ‘गान विद द विण्ड’ जैसे बड़े उपन्यास और ‘लेडी चैटर्लीज लवर’ से ‘हैरी पाटर’ तक विदेशों में साहित्य को सिनेमाई स्वरूप देने की लगातार कोशिशें हुई. भारत में भी खासकर बांग्ला में विभूति भूषण वंद्योपाध्याय और सत्यजीत रे के संयोग ने जो चमत्कार दिखाया उसे दुनिया भर का कला जगत नजरअन्दाज नहीं कर सका और सर आंखों पर बिठाया. सत्यजीत रे की फिल्मों को देखते हुए यह तय करना मुश्किल होता है कि यदि विभूति भूषण वंद्योपाध्याय, रामाशंकर गंगोपाध्याय, रवीन्द्रनाथ टैगोर, सुनील गंगोपाध्याय जैसे साहित्यकार उन्हें नहीं मिले होते तो सत्यजीत रे सत्यजीत रे होते या नहीं. लेकिन यह भी सच है कि ऋत्विक घटक बगैर किसी विभूति के भी ऋत्विक घटक ही रहे. हिन्दी में कमलेश्वर और सावन कुमार टाक का लम्बा सान्निध्य कोई भी उल्लेखनीय फिल्म नहीं दे सका जबकि यही कमलेश्वर गुलजार के साथ ‘आंधी’ और ‘मौसम’ जैसी महत्वपूर्ण फिल्म दे सके. वास्तव में बेहतर सिनेमा के लिए बेहतर साहित्य की बाध्यता भले ही नहीं हो, लेकिन बेहतर साहित्य को फिल्माने के लिए बेहतर फिल्मकार की बाध्यता अनिवार्य है. 

मुश्किल यह रही कि समय के साथ विधाओं की यह निकटता विभिन्न कारणों से दूरियों में बदलती चली गई. सिनेमा और हिन्दी साहित्य की बढ़ती दूरी की कहीं न कहीं एक मजबूत वजह यह भी रही कि दोनों ही ओर से विधाओं की सीमाओं और बारीकियों को समझने की कोशिश नहीं हुई. मन्नू भंडारी के लोकप्रिय उपन्यास ‘आपका बंटी’ पर फिल्म बनाने की कोशिश हुई, और कथा में इतनी छेड़छाड़ हुई कि मामला कोर्ट में सुलझाया जा सका, और फिल्म आपका बंटी से असंबद्ध होकर ‘समय का धारा’ टाइटिल के साथ रिलीज हुई, जो न तो सामान्य दर्शकों को प्रभावित कर सकी, न ही ‘आपका बंटी’ के प्रशंसकों को सिनेमाघर तक आमंत्रित कर सकी. ऐसा ही कुछ विवाद शिवमूर्ति और बासु चटर्जी के बीच ‘तिरिया चरितर’ के समय चर्चे में रहा, जबकि बासु चटर्जी राजेन्द्र यादव के उपन्यास ‘सारा आकाश’ और मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर ‘रजनीगंधा’ जैसी फिल्में बना चुके थे. 

वास्तव में अपनी कृति के प्रति अतिरिक्त आग्रह भी एक महत्वपूर्ण कारण है कि फिल्मकार हिन्दी कहानियों को फिल्माने में असमर्थ दिखे. प्रियंवद की कहानी ‘फाल्गुन की एक उपकथा’ पर मनीष झा ने ‘अनवर’ बनायी. प्रियंवद कभी भी उस फिल्म से संतुष्ट नहीं हो सके. यहां तक कि लखनऊ में आयोजित प्रीमियर में भी वे शामिल नहीं हुए. बाद में परेश कामदार ने प्रियंवद की कहानी ‘खरगोश’ का चयन फिल्म के लिए किया तो पटकथा लिखने के लिए भी प्रियंवद को ही आमंत्रित किया. जाहिर है ‘खरगोश’ से प्रियंवद तो संतुष्ट हुए, लेकिन आम दर्शकों तक यह फिल्म नहीं पहुंच सकी.

समांतर सिनेमा के दौर में दर्शकों को नजरअंदाज कर वैचारिक रुप से समृद्ध फिल्मों के निर्माण की नई परंपरा ने हिन्दी में जोर पकड़ा तो फिर भी (कमलेश्वर), 27 डाउन (रमेश बक्षी), उसकी रोटी (मोहन राकेश), माया दर्पण (मोहन राकेश), त्याग पत्र (जैनेंद्र कुमार) जैसी फिल्में भी सामने आयी. इस कोशिश को शिद्दत से पूर्णता देने की कोशिश की मणि कौल ने, जिन्होंने मुक्तिबोध (सतह से उठता हुआ आदमी), विनोद कुमार शुक्ल (नौकर की कमीज) जैसे फिल्मांकन की दृष्टि से असंभव लगते कथाकारों का चयन किया. हिन्दी की यह अद्भुत विडंबना रही कि जब भी कलम और कैमरे के संबंध को मजबूत करने की कोशिशें हुई, दर्शकों ने नकार दिया. वह स्वांतःसुखाय बन कर रह गयी. आश्चर्य नहीं कि शैवाल की कहानी पर ‘दामुल’ और ‘मृत्युदंड’ जैसी प्रशंसित फिल्म बनाने वाले प्रकाश झा भी ‘राजनीति’ और ‘सत्याग्रह’ की आसान राह का चयन कर लेते हैं. हिन्दी के लिए यह किसी विडम्बना से कम नहीं कि शरतचन्द्र के ‘देवदास’ को समय के साथ आधुनिक बनाते हुए हैट और सिगार के साथ उतारा जाता है, 80 लाख के लहंगे में चंद्रमुखी और पारो की जुगलबन्दी फिल्माई जाती है. उसी तरह शरतचन्द्र की ही ‘परिणीता’ को आधुनिकता का पुट देने के लिए कथानक को 40 के दशक से 60 के दशक में खींच लाया जाता है. लेकिन प्रेमचंद की किसी भी फिल्म की, चाहे वह ‘गोदान’ हो ‘सेवा सदन’ हो, ‘गबन’ हो या ‘दो बैलों की कथा’, रिमेक बनाने की हिम्मत कोई फिल्मकार नहीं जुटा पा रहा. मल्टी प्लेक्स द्वारा छोटी और अच्छी फिल्मों के लिए एक नया बाजार बनने का भी इस्तेमाल हिन्दी सिनेमा प्रेमचंद, रेणु और निर्मल वर्मा के लिए नहीं कर पाती है, करती भी है तो ‘बरेली की बर्फी’ और ‘तनु वेड्स मनु’ के लिए. विभिन्न भाषाओं  में अपने-अपने क्लासिक को फिल्माए जाने के उत्साह को देखते हुए वाकई चिन्ता होती है जब हिन्दी फिल्मकार ‘निर्मला’ के बजाय ‘निःशब्द’ को तरजीह देते हैं.

शेक्सपीयर के नाटकों पर विशाल भारद्वाज श्रंखला बना देते हैं. एक ओर हिन्दी में ‘देवदास’, ‘साहब बीबी और गुलाम’, ‘परिणति’ से लेकर ‘डिटेक्टिव व्योमकेस बख्सी’ की लोकप्रियता दूसरी ओर धर्मवीर भारती की कृति ‘गुनाहों का देवता’ जिसका अमूमन हरेक साल एक संस्करण का रिकार्ड हो, पर बन रही फिल्म ‘एक सुधा एक चंदर’ और फणीश्वर नाथ रेणु की कालजयी कृति ‘मैला आंचल’ पर आधी अधूरी बनी ‘डागदर बाबू’ का डब्बे में पड़े रहना, या फिर ‘कसप’ और ‘राग दरबारी’ जैसे अति लोकप्रिय उपन्यासों में भी फिल्म की संभावना भी नहीं देख पाना, एक सवाल करती लगती है कि क्या वाकई हिन्दी कथाओं का सिनेमाई रूपांतरण संभव नहीं. भारत में सबसे अधिक साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनाने वाले सत्यजीत रे कहते थे,’कहानी पढ लेने के बाद मैं शून्य से शुरुआत करता हूं.‘ शायद इसीलिए वे हिन्दी सिनेमा और साहित्य को ‘शतरंज के खिलाड़ी’ जैसा महत्वपूर्ण रूपांतरण भी सौंप सके. सवाल यह भी है, क्या आत्ममुग्धता में डूबे  हिन्दी लेखक अपने फिल्मकार को वह अधिकार देने को तैयार हैं, जैसा रे मानते थे. सवाल यह भी है क्या हमारे फिल्मकार साहित्यिक कृतियों पर उतनी मेहनत के लिए तैयार हैं. यहां यह सवाल तो बेमतलब ही है आज सौ करोड़ की होड़ में लगे हिन्दी फिल्मकारों में कितने हैं जो हिन्दी साहित्य को करीब से जानते हैं, या जानने की कोशिश करते हैं.


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