मुकुल राय के भाजपा में शामिल होने के मायने

संपादकीय , , सोमवार , 13-11-2017


Reasons to Join BJP Mukul Rai

अजय कुमार मोहता

पश्चिम बंगाल की राजनीति में कोई बड़ा उबाल तो नहीं आया है, सिवाय तृणमूल कांग्रेस के नेता मुकुल राय के भाजपा में शामिल होने के. इसके बावजूद मुकुल राय के भाजपा का दामन पकड़ने के कई अर्थ है. इस कवायद के माध्यम से मुकुल राय और भाजपा दोनों अपने-अपने फायदे देख रहे हैं. सबसे अहम यह है कि इस लाभ लेने की प्रक्रिया में कोई जोखिम आड़े नहीं आ रहा है. 

मुकुल रॉय के बहाने भाजपा की उस रणनीति को बल मिल रहा है, जब असम में तरुण गोगोई से हिमंता बिस्वा सरमा को, बसपा के स्वामी प्रसाद मौर्य को मायावती से तथा उत्तराखंड में कांग्रेस के बड़े दिग्गजों को भाजपा में ला कर वहां जीत का परचम लहराया गया था. 

वहीं मुकुल राय नारदा और शारदा जैसे झंझावातों से मुक्ति के लिए हो सकता है यह कदम बढ़ाया हो.  मुकुल को एक साये की जरूरत थी और भाजपा को जड़ों से जुड़ने की - ऐसे में दोनों एक दूसरे के लिए पूरक साबित हो सकते हैं. लेकिन मुकुल राय के इस कदम से भाजपा को कितना फायदा होगा - और ममता को कितना नुकसान? फिलहाल बड़ा सवाल यही है.

मुकुल राय के भाजपा में आऩे के फायदे और नुकसान को समझना हो तो इन्हीं सवालों के जरिये समझा जा सकता है कि क्या मुकुल राय के भाजपा में आने से कोई बड़ा वोट बैंक भाजपा से जुड़ जाएगा? हरगिज नहीं, क्योंकि मुकुल राय के साथ ऐसा कुछ भी नहीं है. क्या मुकुल राय के जरिये भाजपा पश्चिम बंगाल के किसी खास तबके से कनेक्ट हो पाएगी? ऐसी भी कोई संभावना नहीं है. तो फिर क्या सिर्फ मुकुल राय को केवल भाजपा की जरूरत थी और उन्होंने कुछ नेताओं के जरिये अपना मतलब निकाल लिया. नहीं. मुकुल राय को भाजपा में लाने से पहले खासा मंथन हुआ - और फिलहाल ये भाजपा के लिए बड़ा सौदा है. हालांकि भाजपा की जिस प्रेस कांफ्रेस में  मुकुल राय के भाजपा में शामिल होने की घोषणा की जा रही थी, उस समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह वहीं थे, लेकिन वे प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद नहीं थे. 

भारतीय जनता पार्टी को पश्चिम बंगाल में अपनी जड़ें जमानी हैं. विधानसभा चुनाव से लेकर निकाय चुनाव में भाजपा सारे हथकंडे अपना चुकी है लेकिन नाकामी ही हाथ आयी. यहां तक कि मुस्लिम उम्मीदवार भी मैदान में उतारे लेकिन वही ढाक के तीन पात. भाजपा मान कर चल रही है कि मुकुल राय का काम इसी मर्ज की नब्ज पहचाननी होगी. मुकुल राय पश्चिम बंगाल में ममता की जीत के आर्किटेक्ट माने जाते रहे हैं. 

क्या मुकुल राय आगामी विधानसभा चुनाव में ऐसा ही गुल भाजपा के लिए खिला पाएंगे? क्या मुकुल राय के कंधे पर बंदूक रख कर भाजपा ममता बनर्जी को नुकसान पहुंचा पाएगी?

खैर, ममता बनर्जी की स्थिति फिलहाल न तो तरुण गोगोई जैसी है और न ही मायावती की तरह और न ही उत्तराखंड में कांग्रेस की तरह है. सच तो ये है कि ममता अपने वोटर को अच्छी तरह समझती हैं. स्टिंग में जिन लोगों पर सवाल उठे, ममता ने टिकट देकर न सिर्फ उन्हें जिताया बल्कि मंत्री भी बनाया. ये सब सिर्फ ममता की लोकप्रियता के बूते मुमकिन हो पाया. मुकुल राय लंबे समय तक ममता के साथ रहे हैं, जाहिर है उनकी कमजोरी और उनके मजबूत पक्ष से वाकिफ होंगे. भाजपा उनकी इसी वाकिफियत का लाभ लेना चाहती है. 


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