जला इस साल भी रावण कहां है?

संपादकीय , , शनिवार , 14-10-2017


Jala ees sal bhi ravan kaha hai

अजय कुमार मोहता

इस साल रावण कुछ अगर-मगर के साथ जला. इसकी वजह कहीं यह तो नहीं कि हमारी आस्था खुद में ही नहीं रही? आस्था के प्रति बेरुखी आशंकाओं के सिलसिले की शुरुआत हुआ करती है.

इस साल दो समुदायों के त्यौहार एक ही दिन पड़े. कहते हैं कि ऐसा तीस साल बाद हुआ. ऐसे में अब वृद्धावस्था के कगार पर पहुँची तब की जवान पीढ़ी का अपने बाद की वयस्क पीढ़ी और उसके बाद की युवा पीढ़ी के साथ मिलकर इन त्यौहारों को मनाने की तैयारी करना स्वाभाविक है. स्वाभाविक है कि ये तैयारियाँ समुदायों के अपने-अपने रस्मोरिवाज के मुताबिक हों. हो भी ऐसा ही रहा था, ठीक वैसे ही जैसे कि तीस साल पहले या उसके बाद के सालों में, बगैर कहीं किसी की दखलंदाजी के.  

दरअसल, इन समुदायों की अपनी-अपनी मान्यताओं के कारण इन त्यौहारों के मनाने के तौर-तरीके भी अलग-अलग हैं. और हो भी क्यों नहीं, क्योंकि एक त्यौहार खुशियाँ जाहिर करने का है तो दूसरा मातम मनाने का. वैसे दोनों त्यौहारों से संबंधित किंवदंतियों के अनुसार घटनाएँ जंग की हैं- एक में वह मारा जाता है जो पंडित होने के बावजूद राक्षसी प्रवृत्तियों का गुलाम था, और दूसरे में शहीद वह होता है जो कुकर्मी शासन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है. इस तरह दोनों त्यौहारों की केंद्र बिंदु बुराईयाँ ही हैं–राक्षसी प्रवृत्तियों का ख़ातमा या अत्याचारी शासन की ख़िलाफ़त का ही क़त्ल.  

सच तो यह है कि हर धर्म अपने अनुयायियों को सत्कर्म करते हुए सत्पथ पर चलने का मार्गदर्शन करता है, बुराइयों से परहेज करने को कहता है. इन दोनों त्यौहारों का मकसद भी यही है. ये दोनों त्यौहार, ढ़ेर सारे समुदायों के ढ़ेर सारे त्यौहारों की तरह, पूरे उत्साह से मनाएं जाते हैं बावजूद अपने जश्न और मातम के फर्क के और बगैर एक दूसरे की दखलंदाजी के. यही इन समुदायों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी की अपनी-अपनी आस्था का अपनी-अपनी आस्था में बरक़रारी का सबूत भी है.

ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि तब इस साल रावण अगर-मगर के साथ जला तो क्यों? वह कौन-सी और कैसी आशंका थी जिसकी वजह से ऐसा हुआ? कहीं ऐसा तो नहीं कि यह आशंका बिला वजह थी या फिर कुछ असामाजिक तत्वों के कारण जो अपने निजी सामाजिक या राजनीतिक स्वार्थों को हासिल करने के लिए इन आशंकाओं को पुरजोर हवा दे रहे थे? इसीलिए रावण जल कर भी नहीं जलता. एक कवि के शब्दों में -

जला इस साल भी रावण कहां है?

अभी वह था यहीं पर, अब वहां है.  

सनद रहे कि आँधी के आने की आशंका हरे पत्ते को भी शाख़ से अलग होने को उकसाती है. जब तक उस पत्ते की आस्था दरख़्त की शाख़ों और जड़ों में रहती है, वह टस से मस नहीं होता. लेकिन जैसे ही उसकी आस्था अपने से विचलित होती है, वह शाख़ से विलग होकर वसंत में भी किसी पतझड़े पात-सा दरबदर हो उठता है. 


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