चीन को घेरने में कितना कामयाब होगा चौ-गुट

संपादकीय , , बुधवार , 29-11-2017


How successful will it be to encompass China

अजय कुमार मोहता

नवंबर के मध्य में मनीला में आसियान का 31वां शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ. इस संस्था के गठन का मुख्य मकसद दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र में अर्थव्यवस्था, राजनीति, सुरक्षा, संस्कृति और क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ाना था. इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर और थाईलैंड जैसे पांच देशों ने साथ मिलकर अगस्त 1967 में जब आसियान का गठन किया था तब इस बात का अनुमान ही नहीं था कि यह संस्था अपने गठन के 50 साल भी पूरा कर सकती है. धीरे-धीरे देशों की संख्या बढ़ती गई. 

खैर, मुद्दा यह नहीं है कि इस शिखर सम्मेलन का हासिल क्या निकला. दरअसल, इस सम्मेलन में एक चौ-गुट बना और इसमें भारत सहित अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं. विभिन्न देशों के आपसी गुटों का बनना कोई नई बात नहीं और ना ही यह कोई अनहोनी जैसी घटना है. लेकिन इस चौ-गुट ने यह साफ कर दिया है कि अब भारत की विदेश नीति धीरे-धीरे अमेरिकी धुरी के करीब आ रही है. भारत ने हिचक तोड़ी है. अमेरिका लंबे समय से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ऐसा एक समीकरण चाहता था, जब कि माना जाता था कि भारत ऐसी किसी पहल में शामिल नहीं होना चाहता, जिसे खुलकर चीन के खिलाफ समझा जाए. लेकिन वर्तमान में भारत की नीति में अहम बदलाव आया है. इसकी तार्किक परिणति के रूप में मनीला में हुई चौ-गुट बैठक है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माना जा रहा है कि वैश्विक फलक पर बढ़ रहे चीन के प्रभाव को अमेरिका कुंद करना चाहता है. इसी तरह ‘वन बेल्ट-वन रुट’ से भारत को आपत्ति है. जापान पहले से ही चीन से कुटनीतिक तौर पर दो-दो हाथ करने की तैयारी है. तमाम कूटनीतिज्ञों और विश्लेषकों में सहमति है कि इस बैठक के जरिए इन चारों देशों ने असल संदेश चीन को भेजा है. भारत का बड़ा व्यापार दक्षिण चीन सागर से होता है इसीलिए वह इस मुद्दे में दख़ल देता रहा है. समुद्री रास्ते से स्वतंत्र रूप से आने जाने की वकालत भारत और अमेरिका दोनों करते रहे हैं. भारत का व्यापार इससे प्रभावित हो सकता है. हालांकि, आसियान के देश खुलकर चीन के सामने जाने से कतराते हैं. चीन को यह देश एक अजगर मानते हैं जो उन्हें कभी भी निगल सकता है. 

इसके मद्देनजर नए गुट को काफी महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है. लेकिन क्या इससे चीन का असर रोकने की कोई रणनीति बन सकेगी? भारत ने अपने बयान में यह सफाई देने की जरूरत महसूस की कि ताजा पहल चीन को घेरने की कोशिश नहीं है. उल्लेख किया कि भारत चीन के साथ भी दो अहम मंचों (ब्रिक्स और रिक) में शामिल है. यह मानने का भी फिलहाल कोई आधार नहीं है कि अमेरिका हर हाल में चीन को रोकना चाहता है. राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की बीजिंग यात्रा को अमेरिका और चीन दोनों ने सफल माना है. ऐसे में नया गुट किस दिशा में जाएगा और इससे भारत का उद्देश्य कितना सधेगा- फिलहाल कहना मुश्किल है. जापान के हित सीधे चीन से टकराते हैं. इसलिए उसकी चिंताएं काफी हद तक भारत जैसी हैं. ऑस्ट्रेलिया इसलिए इस पहल के साथ रहेगा, क्योंकि उसकी विदेश नीति अमेरिका से बंधी हुई है. मगर असली सवाल यह है कि अमेरिका किस हद तक चीन की घेरेबंदी में शामिल होगा, जिसके कारोबारी हित काफी दूर तक चीन से जुड़े हुए हैं?  

 


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