गुस्से की आग में सुलगते किसान

संपादकीय , , रविवार , 17-12-2017


Frugal farmer in the fire of anger

अजय कुमार मोहता

बीते अप्रैल माह में तमिलनाडु के किसानों ने अपनी मांगों को लेकर दिल्ली के जंतर मंतर पर अनोखे तरीके से विरोध प्रदर्शित किया ताकि किसानों की दुर्दशा के प्रति देश का ध्यान आकर्षित किया जा सके और सरकार दबाव बनाया जा सके कि किसानों की दशा-दिशा में सुधार की जाए. अभी यह प्रकरण बीता भी नहीं था कि मंदसौर की घटना घट गई और इसमें छह किसानों की पुलिसिया फायरिंग में जान चली गई. इसके अलावा भी देश के अलग-अलग हिस्सों में छोटे-छोटे आंदोलन किसानों द्वारा किये गये. यह स्पष्ट तौर से इंगित करता है कि स्थिति भयावहता की ओर बढ़ रही है, निदान तुरंत ना किया गया तो कभी भी विस्फोट हो सकता है. 23 दिसंबर को हर साल की तरह इस साल भी लोकलुभावन घोषणाओं के साथ किसान दिवस मनाया जाएगा. किसान नेता स्व. चौधरी चरण सिंह की जयंती मनायी जाएगी. अब यह रश्मअदायगी जैसी हो कर रह गई है. क्योंकि सरकार द्वारा घोषित योजनाएं जमीन पर दिखती ही नहीं.

इस किसान दिवस के बहाने हमने कोशिश की है कि किसानों की इस दशा का ना केवल विवेचन किया जाए बल्कि अतीत के घटनाक्रमों के आलोक में भविष्य के लिए समाधान निकाला जाए. यह अंक भारतीय कृषि और किसानों के समक्ष मौजूदा चुनौतियों को फलक पर लाने की कोशिश की है ताकि सत्ता प्रतिष्ठान इसके समाधान के प्रति संवेदनशीलता दर्शाये. 

उल्लेखनीय है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान 16.6 फीसदी है.  देश में 12 करोड़ किसान हैं लेकिन खेती पर निर्भर व्यक्तियों की संख्या कुल आबादी का 60% से भी अधिक है। स्वतंत्र भारत से पूर्व और स्वतंत्र भारत के पश्चात एक लम्बी अवधि व्यतीत होने के बाद भी भारतीय किसानों की दशा में सिर्फ 19-20 का ही अंतर दिखाई देता है। भारत 1990 के बाद से किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने की घटनाएं सामने आने लगी. जहाँ पहले देश में किसानों की आत्महत्या की ख़बरें महाराष्ट्र के विदर्भ और आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र से ही आती थीं, वहीं अब इसमें नए इलाक़े जुड़ गए हैं. इनमें बुंदेलखंड जैसे पिछड़े इलाक़े नहीं, बल्कि देश की हरित क्रांति की कामयाबी में अहम भूमिका वाले हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे राज्य शामिल हैं. इसके अलावा औद्योगिक और कृषि विकास के आंकड़ों में रिकॉर्ड बनाने वाले गुजरात के क्षेत्र शामिल हैं. राजस्थान और मध्य प्रदेश के किसान भी अब आत्महत्या जैसे घातक क़दम उठा रहे हैं. पर क्यों?  सीधा जवाब ये है कि खेती करना अब घाटे का सौदा हो गया है. 

राजनीतिक पार्टियों के लिए देश का किसान सबसे बड़ा मुद्दा है क्योंकि देश का यही किसान राजनीतिक पार्टियों की दिशा और दशा तय करता है. किसकी सरकार बनेगी और कौन सत्ता से बाहर होगा किसानों के चुनावी महत्व को देखते हुए ये सभी पार्टियां अपने घोषणा पत्र में तरह-तरह घोषणाएं और वादे करती हैं. उनसे जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे बनाने में कोई कसर नहीं छोड़तीं फिर भी ऐसा क्यों होता है कि यही किसान सबसे ज्यादा दयनीय स्थिति में होते हैं. सरकार द्वारा करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी कृषि और किसानों की हालत ज्यों की त्यों क्यों बनी रहती है. 

इसके पीछे की बड़ी वजह तमाम तरह की गड़बड़ियां और भ्रष्टाचार है. सरकार द्वारा दिए जाने वाले राहत पैकेज का जो लाभ देश के गरीब किसानों को मिलना चाहिए वह लाभ देश के बड़े किसान और रसूखदार उठा रहे हैं. ऐसे मुद्दों में भ्रष्टाचार इस कदर अपनी जड़ें जमा चुका है कि किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाता है. देश में हो रही त्रासदी पर जब राजनीतिक पार्टियों से सवाल किए जाते हैं तो वह कई तरह दावे करने लगती हैं. अपने आप को किसानों की हितैषी साबित करती हैं. लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े उनके दावों की पोल खोलते हैं... अब समय की मांग है कि अगर शीघ्र ही किसानों की समस्याओं के हल के प्रति कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो इनके गुस्से की आग में सारा देश जल उठेगा. अब चेतना ही अंतिम विकल्प रह गया है. n

 


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