विकास के मायने!

संपादकीय , , सोमवार , 02-10-2017


Development matters!

अजय कुमार मोहता

बेहिसाब बारिश हो रही थी उस दिन. मैं हर पाँच-दस मिनट पर बालकनी में जाकर नीचे झांक लेता था कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सड़क पर पानी इतना जम गया हो कि जमीन तल पर के पम्प में समा जाए. ऐसा नहीं हुआ. फिर बारिश भी थम गई. मैं निश्चिंत हो गया. लेकिन सड़क का जमा हुआ पानी मेरे पड़ोसी के घर में घुसकर तबाही मचा चुका था. उनके यहाँ कोहराम मचा हुआ था. लेकिन मैं निश्चिंत था. मैंने टीवी को ऑन कर दिया.

टीवी का यह वही चैनेल था जो पिछले दिनों बाढ़ की तबाही की बातें लगातार कर रहा था. अब बाढ़ के पानी के सरक जाने पर लोगों की वापसी के दृश्य दिखा रहा है. गांव मानो गांव न रहकर किसी श्मशान में तब्दील हो चुका हो – दो-चार ईंट के मकानों की छतें माटी पर और दीवारों की दरारें कुछ यों कि उनमें से झांककर भीतर का बेतरतीब तमाम देखा जा सके, माटी के घरों की दीवारें भरक कर किसी पुरातत्व विभाग का खुदाई स्थल बनी हुईं और उनके छप्पर तो न जाने कहाँ बिला गए. जिधर देखो उधर मवेशियों की बजबजाती लाशें और सड़ी-गली शाखों के साथ पत्तों का हुजूम. न जाने कब मेरे हाथ कुर्सी और सेटंर-टेबल को छूते हुए कमरे की दीवार पर पहँुच कर मुझे तसल्ली देने लगे कि मैं और मेरा सब कुछ सुरक्षित था.

मैं अपने बारे में हमेशा निश्चिंत हो जाना चाहता हूँ. मसलन इसी साल 26 मई को जब देश के सबसे लम्बे पुल – भूपेन हजारिका महासेतु – का उद्घाटन हुआ तो मैं निश्चिंत हो गया कि अब अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी हिस्से से असम के तिनसुकिया या डिब्रुगढ़ की दूरी 9-10 घंटे के बजाय 5 से भी कम घंटे में पूरी की जा सकेगी. तब मुझे न धोला घाट याद रहा न सदिया घाट जहाँ नाव के सहारे मैं इस पार से उस पार जाया करता था. मुझे तो न वहाँ के नाविकों की फिक्र हुई और न ही उन चाय-पान के दुकानवालों की जो उसी दिन इस सोच में डूब गए थे कि अगले दिन से रोटी कहाँ और कैसे मयस्सर होगी.

17 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन था. उन्होंने उस दिन नर्मदा नदी पर गुजरात में बने सरदार सरोवर बांध का लोकार्पण किया. सरकार का दावा है कि इस परियोजना से 18 लाख हेक्टेयर जमीन को लाभ मिलेगा और नर्मदा से नहरों के जरिए 9,000 गांवों में सिंचाई की जा सकेगी. यह विकास का एक और क़दम है जो प्रधानमंत्री के प्रिय नारे को प्रतिध्वनित करता है. लेकिन वो नारा तो ‘सबका साथ – सबका विकास’ है. वहाँ कोई अपवाद नहीं, कोई उपेक्षित नहीं. लेकिन नर्मदा आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर का कहना है कि ‘विकास के नाम पर पूरी जिंदगी उजाड़ना और फिर उनके पुनर्वास में बहुत समय लगता है. इस परियोजना को लेकर लगभग 50 प्रतिशत काम अभी तक पूरा नहीं हुआ है. मध्य प्रदेश में करीब 40 हजार परिवार ऐसे हैं जिनका अभी तक पुनर्वास नहीं हुआ है. पर्यावरणीय कार्य भी पूरा नहीं हुआ है.’ शायद यह हमारी निश्चिंतता का वो पक्ष है जैसे पड़ोसी के घर में कोहराम. 

14 सितंबर को जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद से मुंबई के बीच चलने वाली भारत की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना का शिलान्यास किया. उसी दिन राजधानी दिल्ली में राजधानी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई. हाल के दिनों में ट्रेनों के डिब्बे पटरी से उतरने की कई घटनाएं हो चुकी हैं. न जाने कितने घायल हुए, न जाने कितनों की जान गई. पता नहीं कि बुलेट ट्रेन के यात्री अन्य ट्रेनों के यात्रियों विदा के क्षण के हिलते हाथों के भार का अहसास करेंगे या नहीं या उनकी आँखों में मिलने – न मिलने की आशंका को पढ़ भी सकेंगे या नहीं. शायद विकास इन सब की परवाह नहीं करता. वह भी मेरी तरह ही निश्चिंत रहता है.

आखिरकार हमारी शुभकामना हो तो किसके लिए हो ! 


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