ये जो है बुलेट ट्रेन

नीतियां , , सोमवार , 02-10-2017


ye jo hai bullet train

श्रीकांत अस्थाना

बुलेट ट्रेन को भारत में भी हकीकत बनाने की इस कोशिश के इर्दगिर्द तमाम सुनहले सपने दिखाए जा रहे हैं. लेकिन इनमें खोने से ज्यादा जरूरी है यह पड़ताल करना कि कही जा रही बातों में कितना सच है और कितनी हवा. साथ ही यह भी कि मौजूदा हालात में भारत के लिए यह कितना जायज या नाजायज है. अहमदाबाद से मुंबई तक की दूरी दो घंटे में पूरा करने का लक्ष्य हासिल हो भी जाए तो इससे कितने लोगों को क्या फायदा हो सकता है, कितने ईंधन का फायदा हो सकता है या पर्यावरण को कितना लाभ हो सकता है? साथ ही प्रश्न यह भी है कि यह कदम देश की अर्थव्यवस्था पर कैसा और कितना प्रभाव डालेगा? 

क्या मुफ्त का सौदा है यह बुलेट ट्रेन 

उच्चगति ट्रेनों को वास्तविकता में बदलने की दिशा में सबसे बड़ी कठिनाई है इसका भारी भरकम खर्च. अहमदाबाद-मुंबई परियोजना की वर्तमान अनुमानित लागत है 1,08,000 करोड़ रुपये. इसमें से 88,000 करोड़ रुपये जापान 0.1 प्रतिशत की ब्याजदर पर कर्ज दे रहा है. शेष 20,000 करोड़ की व्यवस्था भारत को करनी है. जापान को इस कर्ज की वापसी 50 सालों में की जानी है जिसमें 15 सालों का ग्रेस पीरियड भी है. इस स्थिति को ऐसे प्रचारित किया जा रहा है मानो यह लगभग मुफ्त हो. लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? 

बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए जापान से मिलने वाले इस ऋण पर 0.1 फीसदी की दर से 50 साल में वापसी पर कुल ब्याज होगा लगभग 2,500 करोड़ रुपये. यानी भारत को कथित रूप से लगभग 90,500 करोड़ रुपये चुकाने होंगे. मतलब, हर साल लगभग लगभग 1,810 करोड़ रुपये या हर दिन लगभग 5 करोड़ रुपये. अगर मान लें कि इसके दैनिक परिचालन व्यय औसतन मात्र 1 करोड़ रुपये प्रतिदिन तक सीमित रखे जा सकेंगे तो सुनिश्चित ऋण वापसी के लिए इस परियोजना को प्रतिदिन लगभग 6 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित करना होगा. 

कहा जा रहा है कि इस ट्रेन के परिचालन की शुरुआत में 10 कोच होंगे जिसमें कुल 750 यात्रियों के बैठने की क्षमता होगी. बाद में इसको बढ़ाकर 16 कोच का कर दिया जाएगा जिसमें 1,250 यात्रियों की बैठने की क्षमता होगी. ट्रेन का किराया राजधानी एक्सप्रेस के एसी 2-टियर की कीमत के बराबर होगा. इसी के साथ यह भी कि प्रांरभ में रेलवे करीब 35 हाई स्पीड ट्रेनें चलाएगा, जिसके लगभग 70 फेरे प्रति दिन लगाए जाने की उम्मीद है. साल 2050 तक धीरे-धीरे यह संख्या बढ़कर 105 तक की जा सकती है. 

आगे क्या होगा और क्या नहीं, इसके बारे में सोचे बगैर शुरुआती अवस्थापनाओं पर विचार करें तो राजधानी के एसी 2 टियर के औसतन 2,250 रुपये प्रति व्यक्ति किराये की दर से प्रतिदिन 6 करोड़ का राजस्व पाने के लिए लगभग 26,700 यात्रियों की जरूरत होगी. कुल 750 यात्रियों की क्षमता वाली 35 ट्रेनों के 70 फेरे करने पर इनसे कुल 52,500 यात्रियों की स्थापित क्षमता बनती है. मतलब कि कुल सीटों के आधे यात्री भी आ गए तो काम चल जाएगा. लेकिन, देखने वाली बात यह है कि क्या जिन दो शहरों को जोड़ा जा रहा है उनके बीच इतना किराया देकर आने जाने वाले यात्रियों की दैनिक संख्या इतनी है? वर्तमान में इन दोनों शहरों के बीच कुल 61 उड़ानें उपलब्ध हैं जो लगभग एक घंटा 15 मिनट के उड़ान समय तथा इतना ही समय और जोड़ने पर ढाई से तीन घंटे में मात्र औसत 1,800 रुपये किराये पर उपलब्ध हैं. ऐसे में कोई भी इस सुविधा को छोड़कर इससे महंगी सेवा की ओर क्यों आकर्षित होगा? इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण है कि इन दोनों शहरों के बीच यात्रा करने वालों की दैनिक संख्या न तो अभी इतनी अधिक है कि सभी उपलब्ध सीटें भरी रहती हों न ही ऐसा कोई कारण है कि बुलेट ट्रेन के शुरू होते ही इस संख्या में इतनी वृद्धि हो जाएगी कि वह सभी साधनों द्वारा उपलब्ध कराई गई सीटों के लिए पर्याप्त हो. ऐसे में इस ट्रेन के परिचालन से राजस्व प्राप्ति संबंधी प्रारंभिक अनुमान ही संदेहास्पद लगते हैं. 

यह भी ध्यान देने की बात है कि परियोजना के शुरुआती दौर में ही 35 ट्रेनों का चलाया जाना संभव नहीं होगा. इस संख्या तक पहुंचने में भी कुछ समय लगेगा और तब तक इसके परिचालन से किसी प्रकार की आय की उम्मीद करना निरर्थक होगा. गणितीय दृष्टि से देखा जाए तो इस सेवा को अपने यात्रियों की संख्या में क्रमिक वृद्धि करनी होगी ताकि शुरुआती कुछ वर्षों के बाद यह इतना राजस्व उत्पन्न कर सके कि शुरुआती वर्षों के घाटे की भरपाई हो सके. इसकी प्रतिस्पर्धा केवल हवाई सेवा से हो सकती है. यह सोचना भी ठीक नहीं होगा कि बुलेट ट्रेन के शुरुआती सालों में हवाई सेवाएं प्रदान करने वाली कम्पनियां इस प्रतिस्पर्धा में जीतने के लिए अपनी ओर से कुछ नहीं करेंगी. वे निश्चित रूप से अपनी सेवाओं में सुधार करके संभावित यात्रियों को अपनी ओर खींचने की कोशिश करेंगी. 

यह तो हुआ यात्रियों और राजस्व की संभावनाओं का गणित. इससे भी कई गुना ज्यादा महत्वपूर्ण है अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार की गतियों को समझना. भारत द्वारा ऋण का भुगतान येन में किया जाना है. पिछले कुछ वर्षों से जापानी अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति की दर शून्य के आसपास चल रही है और यह मानने का कोई कारण नहीं है कि उसकी मुद्रास्फीति दर में कोई बड़ा बदलाव आएगा. इधर भारत में मुद्रास्फीति की दर औसतन पांच प्रतिशत रहती है. इसका मतलब हुआ कि दोनों मुद्राओं की पारस्परिक विनिमय दर में प्रतिवर्ष औसतन पांच प्रतिशत का अंतर आता जाएगा. बाजार की शक्तियों के अधीन यह दर अगर तीन प्रतिशत भी हो तो जापान को किया जाने वाला वास्तविक भुगतान 3.1 प्रतिशत की दर से लगभग 1,50,000 करोड़ या अधिक का होगा. मतलब यह कि लगभग मुफ्त में मिल रहा बताया जा रहा यह सौदा मुफ्त में तो कतई नहीं है.

क्या सचमुच कोई लाभ है?

इस परियोजना से जुड़े जिन दूसरे लाभों के बारे में बताया जा रहा है वे हैं कि इसके साथ तकनीक हस्तांतरण जुड़ा है. परियोजना में इस्तेमाल होने वाले कल-पुर्जों का निर्माण यहां होगा जिससे देश में सहयोगी उद्योग बढ़ेंगे और लोगों को रोजगार मिलेगा. इसके अलावा परियोजना के संरचनात्मक निर्माण के दौरान देश में लगभग 20,000 लोगों को रोजगार अवसर मिलेंगे. इसकी वजह से महाराष्ट्र, गुजरात और दादरा नगर हवेली में औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है. इन अनुमानों को वास्तविकता में बदलने के लिए प्रतिबद्ध नियोजन और आर्थिक संसाधनों की जरूरत होगी.  

परियोजना से जुड़ी जिन दूसरी लागतों और चिंताओं के बारे में कोई चर्चा नहीं की जा रही है वे हैं कि यदि दुनिया के कई दूसरे देशों की उच्चगति रेल योजनाओं की तरह ही यहां भी यह सफल नहीं हुईं या लागतों में वृद्धि हुई तो क्या होगा. क्या इसे बनाए रखने और ऋण प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय अर्थतंत्र पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा? यह समझौता दो देशों के बीच होने के कारण भारत सरकार को इसकी जिम्मेदारी उठानी ही पड़ेगी और केवल अति उच्चवर्ग को ध्यान में रखकर विकसित की जा रही यह सुविधा अंततः देश के उन नागरिकों की पीठ पर पड़े बोझ को बढ़ाएगी जो इस ट्रेन में शायद कभी पर्यटक के रूप में भी सफर न करें.  

इस बारे में भी कोई चर्चा नहीं की जा रही है कि इन परियोजनाओं से पर्यावरण पर कैसा प्रभाव पड़ेगा. ऐसा लगता है कि जब दुनिया वहनीय विकास के बारे में चिंतित है, तब भी हम वैश्विक कार्बन डाई आक्साइड उत्सर्जन में अपनी हिस्सेदारी थोड़ी होने को लेकर काफी आश्वस्त बने रहना चाहते हैं. बार्सीलोना विश्वविद्यालय के अर्थनीति विभाग के प्रोफेसर और दि इकॉनमिक्स ऐंड पॉलिटिक्स आफ हाईस्पीड रेल के लेखक डेनियल अल्बालाटे के मुताबिक इन परियोजनाओं से प्रत्यक्ष कार्बन फुटप्रिंट भले कम होता दिखे, लेकिन निर्माण के दौरान होने वाली पर्यावरणीय क्षतियों की सक्रियता से भरपाई करने के प्रयास किए जाएं तो भी ऐसा होने में कम से कम 30 साल लग जाते हैं. इसके अलावा इनके संचालन से होने वाले ध्वनि एवं वायु प्रदूषण के साथ ही दृष्टि विकार जैसी समस्याएं पैदा होती हैं. इन समस्याओं के कारण इनसे किसी बड़े पर्यावरणीय लाभ की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए. 

प्रो. अल्बालाटे के अध्ययन का यह भी निष्कर्ष है कि इन परियोजनाओं से आर्थिक लाभों के व्यापक वितरण की बात ठीक नहीं है, बल्कि ऐसी सुविधाओं के विकास से ज्यादा विकसित क्षेत्रों की ओर लोग आकृष्ट होते हैं तथा दूसरे छोर पर या बीच के हिस्सों में पड़ने वाले इलाकों के विकास पर वास्तव में बुरा ही असर पड़ता है. अपनी बात के पक्ष में उन्होंने दुनिया भर से आंकड़े पेश किए हैं. 

दुनिया भर के अनुभव गवाह हैं कि इन परियोजना का सबसे बड़ा खतरा यह भी है कि इसकी स्थापना के बाद इसे सफल बनाने के दबाव में रेलवे की सामान्य सेवाओं की स्थितियों और उनमें सुधार की ओर किसी का ध्यान नहीं रह जाता. परिणामस्वरूप वे घटिया से ज्यादा घटिया होने की ओर बढ़ने लगती हैं. इसमें सबसे ज्यादा नुकसान मध्मय और निचले तबके के यात्रियों का होता है. उनके सामने लगातार खराब होती सामान्य सेवाओं या सड़क परिवहन माध्यमों पर निर्भर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचते. 

 


Leave your comment/अपनी प्रतिक्रिया दे