नोटबंदी: खोदा पहाड़, निकली चुहिया

नीतियां , , शनिवार , 16-09-2017


Demonetisation khoda pahar nikli chuhiya

बिभाष श्रीवास्तव

अर्थव्यवस्था के हालात पर पिछले दिनों में कुछ ख़बरें धड़ाधड़ आईं और छा गृईं. शुरुआत भारतीय रिजर्व बैंक के लगभग एक महीने की देरी से प्रकाशित हुई 'वार्षिक प्रतिवेदन' से हुई. लोगों को इस रिपोर्ट का बेसब्री से इंतजार था नोटबंदी का परिणाम जानने के लिए. ऐसा कहा जाता है कि संसदीय समिति ने भी भारतीय रिजर्व बैंक पर तंज कसा था कि क्या अगले चुनाव के पहले नोटों की गिनती सम्भव है ! 

नोटबंदी की घोषणा, उसके क्रियान्वयन और परिणाम के इंतज़ार में सोशल मीडिया, प्रिंट एवं टेलिविज़न मीडिया पर पक्ष-विपक्ष में ख़बरें चलती रहीं. ख़बरें कुछ तथ्यात्मक थीं, कुछ अफ़वाहें तो कुछ मज़ाक़िया और व्यंग्यात्मक थीं. लोगों की तकलीफ़ों को लेकर कई ख़बरें सामने आईं. प्रिंट और टेलिविज़न मीडिया ने अपनी-अपनी प्रतिबद्धता के बावजूद ¬लोगों के कष्टों को सामने रखा. आठ नवम्बर की वो शाम, वो रात और अगले दिन जहाँ एक तरफ़ लोगों में आशा का संचार हो रहा था वहीं दूसरी तरफ पक्ष-विपक्ष में बौद्धिक बहस छिड़ गई. इन सबके बीच हर खास और आम अपने-अपने धन को सुरक्षित बदलवाने की जुगत करने लगा. बैंकों के आगे लाइनें लगीं. बैंकों की तारीफ हुई, बाद उसके उनकी आलोचना भी हुई. 

वैसे नोट बंदी की घोषणा और उसके लागू करने की अवधि के दौरान शायद सरकार को समझ में आ गया था कि क़दम ग़लत दिशा में पड़ गया है. अतः इसके उद्देश्यों और प्रक्रिया में बार-बार परिवर्तन किया गया. अब भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट से मालूम हो रहा है कि एक प्रतिशत नोट को छोड़कर सारे नोट वापस आ चुके हैं. इन नोटों में नेपाल और भूटान में पड़े नोट शामिल नहीं किए गए हैं. कोऑपरेटिव सेक्टर के भी कुछ नोट जाँच की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं. 

अब जब भारतीय रिजर्व बैंक का वार्षिक प्रतिवेदन प्रकाशित हो चुका है और नोटबंदी के ‘फेल’ होने की ख़बर सूखे जंगल में आग की तरह फैल रही हैं तो वित्तमंत्री सफ़ाई देते फिर रहें हैं कि नोटबंदी मात्र कालाधन की समस्या से निजात पाने के मक़सद से नहीं वरन करदाताओं की संख्या में बढ़ोतरी करने, डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने, कम नकदी व्यवस्था को लागू करने और संगठित और असंगठित अर्थव्यवस्था के बीच सामंजस्य बैठाने के उद्देश्य से की गयी. 

प्रधानमंत्री की उद्घोषणा में भ्रष्टाचार, कालाधन, बेनामी सम्पत्ति, आतंकवाद और नक़ली नोटों का जिक्र है. उनके मुताबिक भ्रष्टाचार का स्तर चलन में मुद्रा के परिमाण के अनुपात में होता है जिसका खामियाजा ग़रीबों को भुगतना होता है. नोटों की बहुलता के कारण हवाला व्यवसाय फलता-फूलता है जो काला धन और ग़ैरक़ानूनी हथियारों के व्यापार से सीधा जुड़ा हुआ है. इस प्रकार ‘भ्रष्टाचार और कालाधन की पकड़ को तोड़ने के लिए’ नोटबंदी लागू हुई. इस उद्घोषणा के बाद वित्तमंत्रालय के संयुक्त सचिव के हस्ताक्षर से जो अधिसूचना जारी की गई उसमें प्रधानमंत्री द्वारा इंगित कई तत्व नदारद थे. अधिसूचना के अनुसार चूंकि निर्दिष्ट बैंक नोटों के नक़ली नोट काफ़ी मात्रा में चलन में थे और उनको पहचानना कठिन था, चूंकि बड़े नोटों का उपयोग बेहिसाबी सम्पत्ति के संग्रहण में उपयोग होता रहा था और चूंकि नक़ली नोटों का इस्तेमाल नशीली दवाओं और आतंकवाद के वित्तपोषण में इस्तेमाल हो रहा है इसलिए नोटबंदी लागू की गई. इस प्रकार प्रधानमंत्री की उद्घोषणा और उसके तुरंत बाद जारी की गई अधिसूचना में तात्विक अंतर है.

भारतीय रिजर्व बैंक के रिपोर्ट के पहले अध्याय के दूसरे पैराग्राफ़ की अंतिम पंक्ति इस प्रकार है - विमुद्रीकरण के पश्चात हाऊसहोल्ड (परिवारों) के वित्तीय बचत में सुधार हुआ है. यह संस्था की लोगों की तकलीफ़ों के प्रति असंवेदनशीलता है. काश, इसके साथ यह भी लिखा जाता कि लोग कितनी तकलीफ़ों के बाद अपनी बचत को बैंकों में जमा कर पुराने नोट बदले. काश, इसमें इस तथ्य को भी शामिल किया जाता कि नोटबंदी की प्रक्रिया के दौरान बैंकों में जमा की गई राशि सिर्फ परिवार की बचत नहीं वरन व्यवसाय में लगा धन भी शामिल होता है. इसी अध्याय का दसवां पैराग्राफ़ ख़ुशी ज़ाहिर करता है कि विमुद्रीकरण के पश्चात बैंकों में कम लागत के जमा (चालू एवं बचत खाता - जिसे बैंकिंग बोलचाल में ‘कासा’ कहते हैं) में बढ़ोतरी हुई जो रिजर्व बैंक द्वारा उठाए गए मौद्रिक उपायों को लागू करने में सहायक रहा है. कितना निर्मम है यह वक्तव्य. सिर्फ मौद्रिक उपायों को लागू करने में आसानी के कारण रिजर्व बैंक को नोटबंदी सुहा रही है ! यह अलग से अध्ययन का विषय हो सकता है कि मौद्रिक उपायों के फलस्वरूप ग़रीबों को मिलने वाले ऋण पर ब्याज दरों में कितना कमी आई है. लेकिन जो स्थूल परिणाम देखने को मिल रहे हैं वह यह हैं कि बैंकों ने ग़रीबों के बचत खातों पर ब्याज दर में कमी कर दी है गो कि अमीरों के बचत खाते के ब्याज दर को ज्यों का त्यों रखा गया है. बैंकों की आय नोटबंदी के बाद कम हुई जिसके कारण कई तरह के शुल्क बचत खातों के परिचालन पर थोपे गए हैं, मसलन न्यूनतम बैलेंस के नीचे बचत राशि जाने पर शुल्क वसूलना. ज़ाहिर है ग़रीबों के खाते में ही न्यूनतम बैलेंस के अनुशासन का पालन नहीं किया जा सकता. सूचना के अधिकार के तहत यह मालूम हुआ कि एक बड़े बैंक ने इस मद में सैकड़ों करोड़ रुपए कमाए. यह सब प्रधानमंत्री की उद्घोषणा के विरुद्ध हुआ कि फ़ायदा ग़रीबों को होगा. ऐसा नहीं है कि रिजर्व बैंक न समझ पा रहा हो. 

भारतीय रिजर्व बैंक इस रिपोर्ट में आगे लिखता है कि चालू वर्ष के दौरान रिमॉनेटाइज़ेशन की लगातार चलने वाली प्रक्रिया के कारण ‘लिक्विडिटी ओवरहैंग’ की समस्या के सुधरने की ‘आशा’ है. कहीं ऐसा तो नहीं कि सीधे न कह कर दबी ज़बान में यह रिपोर्ट भी कह रही है कि मार्केट में मौद्रिक तरलता के कारण समस्या है?  याद करें जब अमेरिका में सब-प्राईम संकट आया तब दुनिया भर के देश एक ही बात को लेकर चिंतित थे और वह थी मौद्रिक तरलता. अभी भी दुनिया, जिसमें अपना देश भी शामिल है, सब-प्राईम संकट से उबर नहीं पाया है कि नोटबंदी लागू कर दी गई. रिपोर्ट ख़ुद कहती है कि 2017-18 की पहली तिमाही में एक्सटर्नल सेक्टर में आयात और निर्यात के मध्य अंतर चालीस बिलियन अमेरिकी डॉलर का था जो 2013-14 की दूसरी तिमाही के बाद सबसे ज्यादा है. रिजर्व बैंक को इसका कारण स्पष्ट करना चाहिए है. विश्व अर्थव्यवस्था पर अपना दृष्टिकोण ज़ाहिर करते हुए रिपोर्ट कहती है कि यद्यपि कि हमारे प्रमुख व्यापारिक पार्टनर देशों में अर्थव्यवस्था बढ़ोतरी की ओर अग्रसर है, लेकिन दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की संरक्षणवादी प्रवृत्तियों के कारण निर्यात पर दबाव बना रहेगा. ऐसे वातावरण में मौद्रिक लिक्विडटी में किसी अवरोध के प्रभाव पर भी रिजर्व बैंक को विस्तार से बताना चाहिए था. अब जब जीडीपी के गिरने के आँकड़े जारी हुए हैं तो यह लगता है कि यह रिपोर्ट अर्थव्यवस्था की समस्या को नहीं पकड़ पाई है.

प्रधानमंत्री की उद्घोषणा में बड़े नोटों के चलन को ग़रीबों के लिए एक अभिशाप के रूप में प्रस्तुत किया गया है. रिपोर्ट के आँकडों पर अगर ध्यान दें तो पाएंगे कि मार्च 2016 में कुल नोटों में एक हज़ार के नोटों का मान (वैल्यू) 38.6 प्रतिशत था. अब मार्च में दो हज़ार के नोटों का मान कुल नोटों में 50.2 प्रतिशत है. पाँच सौ के नोटों का मान 47.8 से घट कर 22.5 प्रतिशत ही रह गया है. स्पष्ट है कि नोटबंदी के बाद बड़े नोटों की भूमिका बढ़ गई है. अब सुनने में आ रहा है कि सरकार दो सौ के नोट जारी करने जा रही है. दो हज़ार के नोट इसलिए जारी किए गए होंगे कि मौद्रिक तरलता को पूर्ववत लाने में आसानी हो. लेकिन बड़े नोटों की बढ़ती भूमिका के कारण वस्तुओं के दाम बड़े करेंसी नोटों को ध्यान में रख कर तय किए जाएंगे. ज़ाहिर सी बात है कि महँगाई बढ़ेगी.

रिपोर्ट में दिए गए इन्फ्लेशन के आँकडें बताते हैं कि जनरल इंडेक्स 4.9 से थोड़ा घटकर 4.5 प्रतिशत हुआ है. फूड और बिवरेजेज़ और ईंधन तथा लाइट को छोड़कर अन्य सेक्टर में इन्फ़्लेशन या तो बढ़ा है या लगभग उसी स्तर पर बना हुआ है. होलसेल प्राइस इंडेक्स -3.7 से बढ़कर 1.7 पर पहुँच गया है. रिजर्व बैंक अगर कहता है कि नोटबंदी ने उसके मौद्रिक प्रयासों को लागू करने में सहायक रहा है तो सही प्रतीत नहीं होता. नोटबंदी के बाद तरलता में कमी आई है. एक तरफ़ ब्रॉड-मनी में वृद्धि दर 10.1 से घट कर 7.3 प्रतिशत रह गई है तो दूसरी तरफ़ बैंक क्रेडिट में ग्रोथ 10.9 प्रतिशत से घट कर सालों के न्यूनतम स्तर 5.1 प्रतिशत पर आ गिरी है. ये आँकडे़ बताते हैं कि लोगों के हाथ में धन पर्याप्त नहीं हैं. लोग कैसे खेती करें, कैसे व्यवसाय करें और कैसे उपभोग करें ? अर्थव्यवस्था के ग्रोथ में कमी आने की सूचना तो आँकडे़ दे रहे हैं. रही बात नोटबंदी से भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की, तो अभी-अभी भ्रष्टाचार का इंडेक्स जारी हुआ है जिसमें देश ने सीढ़ियाँ चढ़ना जारी रखा है. नोटबंदी सफल हुई या असफल, इस बात का आकलन तो तभी किया जा सकता था जब उसके उद्देश्य स्पष्ट हों. दरअसल नोटबंदी का उद्देश्य ही स्पष्ट नहीं था. 

इस संकट की घड़ी में जब हम विश्व में अपना स्थान बनाने को आतुर हैं तो उपलब्ध आँकडों को पढ़कर नीतियों में तत्काल परिवर्तन करना पड़ेगा. अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कठोर नहीं जनोन्मुख क़दम उठाने पड़ेंगे अन्यथा देश फिर से आयातक देश बन कर रह जाएगा. 


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