नोटबंदी: मकसद क्या था?

नीतियां , , शनिवार , 16-09-2017


Demonetisation What was the motive

शंभूनाथ शुक्ल

ये सरकार के लिए अच्छे दिन नहीं हैं. नोटबंदी का पिटारा अब खुलने लगा है और उसका जिन्न मोदी सरकार के लिए अभिशाप बनता जा रहा है. प्रधानमंत्री कुछ कहते हैं और रिजर्ब बैंक कुछ और. इससे सरकार की खूब किरकिरी हो रही है. किसी को समझ नहीं आ रहा कि आखिर नोटबंदी का मकसद क्या था. काला धन हटाने में नोटबंदी फेल रही और फेक करेंसी का दावा भी फरेब साबित हुआ. रिजर्ब बैंक कह रहा है कि अब तक 99 प्रतिशत नोट वापस आ चुके हैं. सिर्फ 16 हज़ार करोड़ की कीमत के नोट नहीं लौटे. यहाँ यह भी ध्यान रखना है कि नेपाल और भूटान में भारतीय मुद्रा प्रचलन में है. यानी नेपाल में और भूटान में भी इन्हीं 16 हज़ार करोड़ रुपयों का कुछ हिस्सा होगा ही. तब यह सवाल उठना लाजिमी ही है कि नोटबंदी की ही क्यों गई.

क्या यह माना जाए कि 2014 में बनी मोदी सरकार को कांग्रेस राज के सारे प्रतीकों को हटाना था? लेकिन एक हज़ार का नोट तो उनकी ही पार्टी की पूर्ववर्ती वाजपेयी सरकार ने ज़ारी किया था. दरअसल जैसे-जैसे मुद्रास्फीति बढ़ती है चलन में बड़े नोट लाने ही पड़ते हैं. आज सौ के नोटों के बूते बाज़ार नहीं चलाया जा सकता. आखिर इसीलिए तो मोदी सरकार ने एक हज़ार का नोट बंद कर दो हज़ार का नोट बाज़ार में उतारा है. ज़ाहिर है कि एक हज़ार का नोट बंद करने का मकसद काला धन रोकना नहीं था वर्ना दो हज़ार का नोट न लाया जाता. काले धन वालों के लिए यह दो हज़ार का नोट वरदान साबित हुआ. बैंकों से साठ-गाँठ कर उन्होंने अपने नोट शुरू में ही बदलवा लिए और सरकार ने उन्हें पर्याप्त समय दिया. मरे वे लोग जिनकी मेहनत की कमाई थी और वे लाइन में नहीं लग सके. एक दिन की लाइन का मतलब था एक दिन के काम का हर्जा. वे इंतजार करते रहे भीड़ छँटने का और भीड़ छटी तो नोट बदलने का समय भी खत्म हुआ. इसके साफ़ मायने हैं कि नोट बदलवाने की मियाद तय करने में काले धन वालों को अपने नोट बदलवाने का पूरा मौक़ा दिया गया.

सरकार के मंसूबे अच्छे हों या बुरे, मगर अफसरशाही हर मंसूबे की काट निकाल ही लेती है. मोदी सरकार की दिक्कत यह है कि उसने राजनीतिकों से ज्यादा भरोसा नौकरशाही पर किया. नतीजा न तो ब्लैक मनी निकली न फेक करेंसी का पता चला. ऊपर से अब आकर आरबीआई ने भेद खोल दिया कि नोटबंदी के बाद से 99 प्रतिशत नोट वापस आ गए. तब प्रश्न यह भी है कि क्या भारत में फेक करेंसी पुलिसिया मनगढ़ंत स्टोरी है? अगर फेक करेंसी थी तो निकली क्यों नहीं? बाज़ार में फेक करेंसी चलती रहती लेकिन तब पुलिस क्या सोती रही? ऐसी अनगिनत बातें हैं जो नोटबंदी पर सरकार की मंशा को शक के दायरे में लेती है. अभी तक जो निष्कर्ष निकला उससे साफ़ लगता है कि नोटबंदी का मोदी सरकार का फैसला सिर्फ कांग्रेस के विरोध की वज़ह से किया गया और मार्च में हुए यूपी, पंजाब आदि राज्यों में क्षेत्रीय दलों की कमर तोड़ने के मकसद से. ये दोनों ही बातें राजनीति में किसी भी तरह की शुचिता और लोकतान्त्रिक भावनाओं का परिचय नहीं देतीं. राजनीति में प्रतिद्वंदी को धूल अपनी लोकप्रियता के बूते चटाई जाती है, किसी तरह का फाउल गेम खेल कर नहीं. क्योंकि इससे न सिर्फ राजनीति की दिशा व दशा प्रभावित होगी बल्कि आने वाले दिनों में कपट राजनीति को प्रश्रय मिलेगा.

बेहतर यह होता कि यदि सरकार को हज़ार और पांच सौ के नोट बदलने ही थे तो चरणबद्ध कार्यनीति बनाती. पहले हज़ार के नोट छापना बंद करती. फिर बाज़ार में चल रहे नोटों की वापसी की समय सीमा तय करती. इसी तरह फिर पांच सौ के नोट टारगेट में लिए जाते. मगर यह तो कोई सुविचारित नीति नहीं हुई कि 8 नवम्बर 2016 को रात 8 बजे अचानक प्रधानमंत्री ने घोषणा कर दी कि बस चार घंटे बाद हज़ार और पांच सौ के नोट अमान्य. और अब जो नोट हम लेकर आएँगे वही चलेंगे. नतीजतन इन चार घंटों के भीतर ही बाज़ार में लूट मच गई. दे दनादन सामान खरीदे जाने लगे. जिस दूकान में जितना भी सामान था सब बिक गया, वह भी नकद. ज्वेलर्स के यहाँ धूम मच गई. घंटे भर में ही सोना 25 से उछलकर 35 हज़ार रूपये प्रति दस ग्राम हो गया. अगले दिन तक खेल पूरा हो चुका था. पेट्रोल पम्पों और दवा की दूकानों को कई दिनों तक छूट दी गई. इस बीच जिसे जितना सफ़ेद करना था कर लिया. फिर अचानक प्रधानमंत्री का फरमान आया कि हर व्यक्ति अपने खाते में बिना लिखा-पढ़ी के ढाई लाख रूपये जमा करा सकता है. फिर क्या था बैंकों में पहले तो जन-धन खातों में ढाई-ढाई लाख जमा करा दिया गया. बाद उसके बैंक कर्मचारियों की मिलीभगत से उन खातों को खंगाला गया जिनको खुलवा कर खाता धारक ही भूल गए थे या वे मर-खप गए थे. उनमें रुपया जमा हुआ और ट्रांसफर हुआ या निकाल लिया गया. पूरे नवम्बर भर नोट बदलवाने की प्रक्रिया चली जिसमें ठेके पर लोग लगवाए गए और चार-चार हज़ार रूपये फटाफट दो-दो हज़ार के दो नोटों में बदलवा लिए गए.

अब यह भी एक अहम सवाल है कि क्या सरकार और उसकी मशीनरी को पता नहीं था कि लोगबाग ऐसे खेल कर लेंगे. या उनको खेल करने की पूरी छूट दी गई. मालूम हो कि जन-धन खाते लाने की योजना इसी सरकार की थी और तब बड़े तामझाम के साथ प्रचारित किया गया था कि हर व्यक्ति के पास होगा अपना एकाउंट. इन बैंक खातों का इससे बढ़िया इस्तेमाल भला क्या हो सकता था कि इन खातों को ब्लैक मनी से भर दिया जाए. लोगों ने यही किया. जिसके पास जितना भी बिना लिखा-पढ़ी का पैसा उसने अपने परिचितों में खोज-खोज कर ऐसे खाते निकले और पैसा डाल दिया. लेकिन जो आम व्यक्ति अपने घर पर हारी-बीमारी के लिए नक़दी रखे था वह उसे समय पर जमा नहीं कर सका. अथवा जमा करने गया तो व्यर्थ में ही हलकान हुआ. जो लोग लाइन में लगे-लगे सिधार गए वे कोई ब्लैक मनी वाले नहीं थे बल्कि वे थे जो अपने संचित धन को बदलवा नहीं सके. दरअसल गत नवम्बर में जो सरकारी नोटबंदी हुई वह एक तरह से मध्य कालीन सामन्ती राजाओं-नवाबों की सनक जैसा था. जब हर रियासत का राजा स्वयं को अमर रखने के लिए अपनी मुद्रा चलाया करता था. यही कारण है कि आज मोदी सरकार अपने स्वयं के बनाए चक्रव्यूह में उलझ कर रह गई है.

सरकार कह सकती है कि 1978 में मोरारजी देसाई सरकार ने भी नोटबंदी की थी और 10 हज़ार तथा 5 हज़ार के नोट बंद कर दिए थे. लेकिन तब दो बातें थीं. एक तो मोरारजी सरकार ने हठात नोटबंदी नहीं लागू की थी. उसके लिए बाकायदा अधिसूचना ज़ारी हुई थी और उसके बाद एक निश्चित तारीख पर नोट बंद किये गए. दूसरे उस समय मुद्रा स्फीति की दर कम थी इसलिए दस हज़ार या पांच हज़ार के नोट बंद होने से आम लोगों को तकलीफ नहीं थी क्योंकि तब तक करोड़ों लोग ऐसे भी थे जिन्होंने ये नोट देखे भी नहीं थे. 

इसमें कोई शक नहीं कि काला धन मुद्रास्फीति को बढ़ाता है तथा चलायमान पूँजी को कुंद करता है. दरअसल काले धन का पैसा पूँजी की शक्ल में बाज़ार में आ नहीं पाता और घरों में ही क़ैद रहता है जिससे न तो उस ब्लैक मनी से रोज़गार सृजित हो पाते हैं न नए कारखाने लग पाते हैं. इससे एक तरह से वह धन ‘डेड’ होता है जो न सरकार को लाभ पहुंचता है न उस व्यक्ति को भी कोई संतुष्टि दे पाता है जिसके पास वह संचित है. इसलिए ऐसे पैसे को बाहर निकालना ही चाहिए ताकि बाज़ार पनप सके. और बाज़ार पनपेगा तो लोगों को रोज़गार भी मिलेगा.

किन्तु वह पैसा नोटबंदी के बाद यदि फिर उसी तरह घरों में क़ैद हो गया तो सरकार की सारी कवायद फेल रही. सत्य यह है कि 8 नवम्बर को मोदी सरकार ने हज़ार और पांच सौ के नोट बंद कर इतनी बड़ी भूल कर दी कि निकट भविष्य में इसकी भरपाई मुश्किल है. अब सरकार चाहे भी तो उस गलती को न तो सुधार सकती है न उसे पलट सकती है. इस भूल के कारण ही बाज़ार में अब रुपया नहीं आ रहा है. व्यापार लगभग ठप है, उद्योग मृतपाय हैं और रोज़गार का आलम यह है कि नए रोज़गार का सृजन तो दूर किसी का भी रोज़गार सुरक्षित नहीं बचा है. हर कार्पोरेट हाउस छंटनी करने में जुटा है. लोगों के वेतन कम किये जा रहे हैं. कुशल और अकुशल दोनों किस्म की लेबर सड़क पर है. सरकार की 'कौशल विकास योजना' बुरी तरह फ्लॉप हुई है. जब रोज़गार ही नहीं हैं तो कौशल का लाभ क्या! और इसकी वज़ह है कि लोगों के पास पैसा नहीं है. एक जन कल्याणकारी सरकार का काम होता है कि वह अपने हर नागरिक को रोज़गार दे और उसके जान-माल की सुरक्षा की गारंटी ले. मगर अपने देश में सब उलटा-पुल्टा हो रहा है. जब रोज़गार नहीं रहे तो लोग अपराध की ओर भागेंगे ही. क्राइम रेट बढ़ रहा है और जीडीपी घट रहा है तो और हो क्या सकता है!

एक बड़े मुल्क में जहाँ की ज्यादातर आबादी गाँवों में बसती हो, वहां आप क्रेडिट या डेबिट कार्ड अथवा ई-वैलेट से काम नहीं चला सकते. वहां पर नकदी को बाज़ार में उतारना ही होगा. पर सरकार ने इस दिशा में अभी तक कोई पहल नहीं की है. अलबत्ता देश को हाई-फाई बनाने के चक्कर में इस सरकार ने देश को रसातल में पहुंचा दिया है. सत्य को स्वीकार करने की बजाय मोदी हर उस व्यक्ति को कांग्रेसी एजेंट घोषित कर देते हैं जो सरकार का सत्य से साक्षात्कार कराना चाहता है. बेहतर यह होता कि सरकार यह मान लेती कि नोटबंदी का फैसला गलत था. हालाँकि यह सबको पता है कि अब पुराने नोट बहाल नहीं हो सकते, लेकिन यदि सरकार मान लेगी तो इतना तो होगा कि भविष्य में ऐसी गलतियों से बचा जा सकेगा. पर सरकार अपने हठ पर कायम है और एक के बाद एक गलतियाँ होती जा रही हैं. अगर हम पिछली सरकारों से तुलना करें तो लगता है कि शायद इस सरकार जैसी लाचार और सरकारें नहीं थीं. यहाँ तक कि एनडीए की ही अटल बिहारी वाजपेयी सरकार आर्थिक मोर्चे पर खरी उतरी थी और उस वक्त तमाम ऐसे काम हुए जो वाजपेयी की गुड गवर्नेंस का नतीजा थे. लेकिन इस सरकार का गुड वर्क क्या बताया जाए क्योंकि उसके खाते में तो सिफर के अलावा कुछ नहीं आ रहा. इसके बावजूद यह सरकार अपनी भूल का प्रायश्चित करने को भी राजी नहीं है.

सरकार की तमाम भूलों में सबसे अहम है अहंकार और अपरिपक्वता. अगर आपमें कुछ कमियाँ हैं तो उन्हें दुरुस्त करने की कोशिश करिए और विनम्र बनिये. लेकिन यह सरकार यह नहीं मानेगी. हर महीने के आखिरी रविवार को प्रधानमंत्री रेडियो पर मन की बात करते हैं और उसमें वह अपनी उपलब्धियाँ गिनाते हैं. लेकिन सवाल यह उठता है कि इन उपलब्धियों को जब हम कार्यरूप में देखते हैं तो वे कहीं नज़र नहीं आतीं. आखिर हमारा देश पिछले तीन वर्ष में किस दिशा में आगे बढ़ा, यह जानने की इच्छा सब में है. लेकिन दुःख है कि प्रधानमंत्री यह नहीं बता पाते. हमारी कूटनीति फेल रही है. हमने खुद आगे बढ़कर पूरे दक्षिण एशिया को मित्रवत बनाने की पहल की थी, लेकिन तीन साल में दोस्ती प्रगाढ़ होने की बजाय छितर गई. दूर देशों में हम जितना अमेरिका के करीब गए उतना ही उसने पाकिस्तान को सहलाया. अर्थनीति का हाल किसी से छिपा नहीं है. तब फिर 'मन की बात' तो सिर्फ आपके मन की बात हुई प्रधानमंत्री जी, जनमन की नहीं.  बेहतर होता कि आप हमारे मन की बात करते. अब भी अगर आपकी अफसरशाही और आपके मंत्री सरकार की मंशा को समझें और बेहतर करने की कोशिश करें तो परिदृश्य बदलेगा. 


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