आर्थिक विकास का घुमता चक्र

नीतियां , , मंगलवार , 01-08-2017


Aarthik Vikas Ka Ghumata Chakra

प्रो प्रदीप माथुर

द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति के बाद का विश्व स्पष्ट रूप से दो गुटों में बंटा हुआ था. जहां एक ओर अमेरिका तथा पश्चिमी यूरोप के पूंजीवादी देश थे, वहीं दूसरी ओर सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के समाजवादी देश तथा चीन था. समाजवादी देशों में मार्क्सवाद की धारणा पर केंद्रित व नियंत्रित अर्थव्यवस्था और उत्पादन के साधन सरकार के हाथ में थे. पूंजीवादी व्यवस्था के उलट बाजार पर सरकार का नियंत्रण तथा नियोजित आर्थिक विकास द्वारा समाज के सभी वर्गों में समान आर्थिक विकास का दावा किया जा रहा था. 

ब्रिटिश उपनिवेशवादी व्यवस्था ने भारतीय अर्थतंत्र का भरपूर दोहन किया था. रही-सही कसर उनके सामंतवादी पिट्ठूओ ने पूरी कर दी थी. इसी कारण आर्थिक विकास स्वतंत्र भारत के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी. अर्थव्यवस्था पूरी तरह कृषि पर आधारित कर्म और उद्योग पर निर्भर थे. कृषि औऱ उद्योग के निवेश के लिए पूंजी और आर्थिक संसाधनों का नितांत अभाव था. 

भारत ने आर्थिक विकास की इस चुनौती से निबटने के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था और नियोजित विकास का मार्ग अपनाया. विश्व के दो बड़े पूंजीवादी औऱ समाजवादी देशों की अर्थव्यवस्था के स्थान पर भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था में पूंजीवादी उत्पादन के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्र में भी औद्योगिक विकास के लिए कल कारखाने लगाने की व्यवस्था हुई तथा नियोजित विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएं प्रारंभ की गई. समाजवादी- सामंती शोषण के लंबे इतिहास और देश के विभाजन की त्रासदी के बाद कराहते भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नियोजित विकास की पंचवर्षीय योजनाएं आशा की किरण लेकर आयी.    

प्रथम पंचवर्षीय (1952-57) का कार्यक्रम समाप्त होते-होते यह स्पष्ट हो गया था कि यदि आर्थिक विकास का आधार कृषि को भी बनाया जाए तो भी कृषि के विकास के लिए औद्योगिक क्रांति की आवश्यकता है. कृषि के काम में आने वाले ट्रैक्टर और खाद तथा कीटनाशक दवाओं के अभाव को दूर करने के लिए न तो भारत के पास पूंजी थी ना ही उनको उच्च मूल्यों पर खरीदने की आर्थिक क्षमता. साथ ही साथ बिजली, सड़क और पानी और सिंचाई की सुविधा भी औद्योगिक विकास द्वारा ही संभव था. 

वर्ष 1957-58 में प्रारंभ की गई द्वितीय पंचवर्षीय योजना में उद्योग धंधों पर बल दिया गया और भारत में औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात हुआ. लेकिन साथ ही साथ अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद और भारत के कारपोरेट सेक्टर ने इस पहल का विरोध भी करना प्रारंभ कर दिया. जहां पूंजीवादी देशों को यह पहल अर्थव्यवस्था के लिए खतरा दिखाई दे रही थी, वही भारतीय कारपोरेट सेक्टर को सस्ते मूल्य पर कच्चे माल की प्राप्ति बंद होने का डर सता रहा था. 

वर्ष 1960 से 1980 तक के वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए वैचारिक संघर्ष, विरोध, विमर्श के दशक रहे. प्रेस द्वारा नियंत्रित जनसंचार माध्यमों द्वारा पूंजीवादी व्यवस्था का गुणगान और पब्लिक सेक्टर का उपहास उड़ाया गया तथा उनकी कमिया गिना कर उनके विरुद्ध जनमत खड़ा किया गया. ब्रिटिश कुलीनतंत्र तथा यथास्थिति के पोषक नौकरशाही ने भी निजी सेक्टर का साथ दिया. 

वर्ष 1962 के चीनी सैन्य आक्रमण, नियोजित मिश्रित अर्थव्यवस्था के जनक व प्रेरक प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के गिरते स्वास्थ और वर्ष 1961 में उनकी मृत्यु के बाद पब्लिक सेक्टर पर हमले और तेज हुए. वर्ष 1965 के पाकिस्तान युद्ध और वर्ष 1971 के बांग्लादेश युद्ध ने राजनैतिक तंत्र के साथ और भारतीय समाज की मनोवृत्ति को काफी परिवर्तित किया. स्वतंत्रता संग्राम में जनमे और पल्लवित हुए आदर्शवादी सोच की जगह यथार्तवादी दृष्टिकोण और उपयोगितावादी चिंतन ने ले ली. इन सबका प्रभाव भी हमारी अर्थव्यवस्था और नीतियों पर पड़ा. इस कारण वर्ष 1969 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसी पहल भी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ते कदम थाम ना पायी. 

वर्ष 1979 के सोवियत संघ के विघटन ने विश्व राजनीति का समाजवादी विकल्प समाप्त करके भूमंडलीय राजनीति को एक ध्रुवीय बना दिया. फिर 1980 के दशक से आर्थिक सुधारों की बात जोर-शोर से शुरू हो गयी. 1990 का दशक आने पर प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और वित्तमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के नेतृत्व में भारत ने समाजवादी व्यव्यस्था का चोला उतार कर देश को अमेरिका के नेतृत्ववाली भूमंडलीय अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ लिया. विदेशी पूंजी को भारत में निवेश के लिए आमंत्रित किया जाने लगा और भारतीय व्यवसायियों ने भी अमेरिका तथा पश्चिम एशिया के तमाम छोटे-बड़े देशों में निवेश और व्यापार प्रारंभ कर दिया. 

अपनी तमाम आर्थिक विषमताओं और असमानताओं के बावजूद आज भारत विश्व की एक बड़ी अर्थिक शक्ति है. राजनैतिक कारणों से आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहे जो भी कहे, सच यह है कि आजादी के बाद के पिछले 70 सालों की सारी कमियों और सारे भ्रष्टाचार के बावजूद हमने आर्थिक क्षेत्र में आशातीत सफलता प्राप्त की है. 

अर्थव्यवस्था और राजनीति साथ-साथ चलती है. और राजनीति का सत्ता संघर्ष अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करता है. वर्ष 1998 के बाद भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता का स्वाद चखा, जिसने एक नये वर्ग की आकांक्षाओं को परवान चढ़ाया. वर्ष 2004 के चुनावों में भाजपा की अप्रत्याशित हार ने इस वर्ग को बहुत हताश किया और उसने सत्ता में वापस आने के लिए पुरजोर प्रयास शुरू कर दिये. कांग्रेस में राजनीतिक दृष्टि से कमजोर नेतृत्व ने भाजपा के इन प्रयासों को बल दिया. 

कुशल प्रशासक और ख्यातिप्राप्त अर्थशास्त्री होने के बावजूद डॉ मनमोहन सिंह जनाधार विहिन प्रधानमंत्री थे. संगठन क्षमता और जनसमर्थन के बावजूद सोनिया गांधी जमीनी नेता नहीं थी. इसलिए भाजपा के तीखे आक्रमणों से बचाव का कार्य अनुभवहीन राहुल गांधी के कंधों पर पड़ा. यदि कांग्रेस बचाव और भाजपा पर पलटवार का काम शायद किसी जमीनी नेता के पल्ले होता तो कांग्रेस को इतना रक्षात्मक न होना पड़ता. 

भ्रष्टाचार और घोटालों ने भाषण कला और प्रचारतंत्र में दक्ष राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से प्रशिक्षित भाजपा नेताओं को बढ़त दी और वर्ष 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा पूर्ण बहुमत से विजयी हुई. कांग्रेस मुक्त भारत और नेहरू परिवार के विरोध को बल मिलने के साथ भारत के आर्थिक विकास का एक नया अध्याय शुरू हुआ. योजना आयोग को भंग कर और इसके स्थान पर नीति आयोग का गठन कर प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट संकेत दिया वह पुराने स्थापित कार्य से हट कर आर्थिक विकास की नई राह पर चलना चाहते हैं. यह समाजवाद और सार्वजनिक क्षेत्र के अंत का उद्घोष था.

विश्व का कोई भी देश या समाज अपने आप में न पूर्णतः समृद्ध है और ना ही सुव्यवस्थित. हरेक देश की चाहे वह छोटा हो या बड़ा, अपनी समस्याएं है. कल जो उपनिवेशवादी देश जिन्होंने विश्व की तमाम संपत्ति का अपने यहां संचय किया था और अति समृद्धशाली माने जाते थे, वह भी आज आर्थिक संकट के कगार पर है. वास्तव में इटली, स्पेन, ग्रीस और आयरलैंड जैसे देशों का आर्थिक प्रभाव काफी हद तक हमारे जैसे देश की विकट आर्थिक स्थिति के लिए जिम्मेदार है. इसी के साथ-साथ अमेरिका और जापान जैसी बड़ी आर्थिक शक्तियां भी भ्रष्टाचार और आर्थिक घोटालों के दृष्टांतों से ऊपर नहीं हैं. वहां के बड़े नेताओं पर भी इस तरह के तमाम आरोप लगते रहे है. फिर भी भारत के संदर्भ में कोई ऐसा कारण नहीं है, जो हमें अपने भविष्य के बारे में निराशा की ओर ले जाए.  

(लेखक मीडिया शिक्षाविद् हैं.)


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