खेती-किसानी और महिला श्रमशक्ति

आवरण कथा , , रविवार , 17-12-2017


womens labor force in Farming

मोनिका शर्मा

देश के सर्वांगीण विकास के लिए श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को लेकर अक्सर बात की जाती है. लेकिन भारत जैसे कृषि प्रधान देश में खेती-किसानी के क्षेत्र में महिलाओं का श्रम और सहयोग हमेशा से ही उपेक्षित रहा है. यह सच है कि आज देश का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जिसमें महिलाओं की अहम् भूमिका ना हो. बावजूद इसके आधी आबादी के हालात में ज़मीनी स्तर पर तो कोई बदलाव नहीं आ रहा है.  हाँ, ज़मीन से जुड़े कामकाज का अतिरिक्त भार ज़रूर उनके कंधों पर है. यह अफ़सोसनाक ही है कि खेती के कामों में लगी महिलाओं की भूमिका बेहद अहम होने के बावजूद उसकी अनदेखी की गई है. इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि इस काम के एवज में महिलाओं को प्रत्यक्ष रूप से कोई पैसा नहीं मिलता है. नतीजतन इतनी बड़ी जिम्मेदारी का निर्वहन करने के बावजूद वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं. इतना ही नहीं आत्महत्या करने वाली और आर्थिक परेशानियों से जूझने वाली महिला किसानों की भी कमी नहीं है. अमूमन ऐसे आंकड़े सामने नहीं आ पाते क्योंकि जमीन के आधिकारिक कागजातों में महिलाओं नाम नहीं होता. साथ ही विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के आँकड़ों में महिला कृषकों का ज़िक्र भी कम ही होता है क्योंकि उनकी आर्थिक भागीदारी आज भी उपेक्षित ही है. 

हमारे यहाँ कृषि में आधी आबादी का बहुत बड़ा योगदान है. देखा जाए तो कृषि और उससे जुड़े अन्य कार्यों में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से भी ज्यादा है. कृषि क्षेत्र में कुल श्रम की 60 से 80 फीसदी तक हिस्सेदारी महिलाओं की होती है. ‘फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गनाइजेशन’ के अध्ययन के मुताबिक हिमालय क्षेत्र में तो प्रति हैक्टेयर प्रति वर्ष एक पुरुष औसतन 1212 घंटे काम करता है वहीं एक महिला औसतन 3485 घंटे कार्य करती है. देश के अन्य हिस्सों में भी महिलाएं खेती-किसानी के कामों में बड़ी भागीदारी निभा रही हैं. जबकि घर की दूसरी जिम्मेदारियों का निर्हवहन तो उनके हिस्से है ही. देश की सबसे बड़ी सर्वेक्षण रिपोर्ट ‘एनएसएसओ 2011’ के अनुसार भारत में 7 करोड़ से ज्यादा महिलाएं खेती के व्यवसाय से जुड़ी हैं. ऐसे आंकड़े बताते हैं कि कृषि में महिलाओं के योगदान को नकारा नहीं जा सकता. खेतों पर श्रम करने के अलावा किसानी से जुड़े कई दूसरे काम तो केवल महिलायें ही करती हैं. एनएसएसओ के आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़, बिहार और मध्य प्रदेश में 70 फीसदी से ज्यादा महिलाएं कृषि क्षेत्र से जुड़ी हैं, जबकि पंजाब, पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडु और केरल में यह संख्या 50 फीसदी है. मिजोरम, आसाम, छत्तीसगढ़, अरूणाचल प्रदेश और नागालैंड में कृषि क्षेत्र में 10 फीसदी महिला श्रमशक्ति लगी है. 

ऐसे में यह वाकई विचारणीय है कि अगर सही सरकारी नीतियां और सहयोग मिले तो कृषि में पुरुषों के साथ महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाकर सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को भी काफी हद तक बदला जा सकता है. इससे महिलाओं के सशक्तीकरण को और अधिक बढ़ावा भी मिल सकता है. ‘भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद’ की ओर से 9 राज्यों में किए गए एक शोध में सामने आया है कि प्रमुख फसलों के उत्पादन में महिलाओं की 75 फीसदी भागीदारी, बागवानी में 79 फीसदी और कटाई उपरांत कार्यों में 51 फीसदी महिलाओं की हिस्सेदारी होती है. कृषि से जुड़े अन्य व्यवसाय जैसे पशु पालन में महिलाएं 58 फीसदी और मछली उत्पादन में 95 फीसदी भागीदारी निभाती हैं. यह सर्वे बताता है कि कृषि क्षेत्र में महिलाओं की सबसे अधिक भागीदारी हिमाचल प्रदेश में है. कुल मिलाकर देखा जाए तो कुल कृषि उत्पादन में महिलाओं की औसत भागीदारी का अनुमान कुल श्रम का 55 से 66 फ़ीसदी तक है. इतनी अहम भागीदारी निभाने के बावजूद आज खेती-किसानी से जुड़ी महिलायें भी कई समस्याओं से जूझ रही हैं. उनकी समस्याएं आर्थिक ही सामाजिक-पारिवारिक और भावनात्मक पहलुओं से भी जुड़ी हैं. अत्यधिक श्रम और कुपोषण जैसी समस्याओं के चलते वे सेहत के  मोर्चे पर भी कई तकलीफों से जूझती हैं.   

वैश्विक स्तर पर काम करने वाली ‘ऑक्सफैम इंडिया’ की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक बेहतर जीवन की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की तरफ हो रहे पलायन के कारण अब खेती-बाड़ी का भार महिलाओं पर आ गया है. बीते कुछ सालों में खेती-किसानी में महिला मज़दूरों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है. फिलहाल गांवों की 75 फीसदी महिलाएं खेतीबाड़ी में लगी हुई हैं. पुरूषों के मामले में यह संख्या 59 प्रतिशत है. आज 62.8 फीसदी महिलाओं का प्राथमिक पेशा खेती  ही है. जबकि शहरी पलायन के चलते पुरूषों का 43.6 फीसदी इस काम में भागीदार है. इस रिपोर्ट के मुताबिक खेती में जैसे-जैसे महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है वैसे-वैसे उन पर अतिरिक्त भार भी  बढ़ गया है.  गाँवों में घर परिवार के अन्य काम भी महिलाओं के हिस्से ही होते हैं. ऐसे में घरेलू जिम्मेदारियों के साथ ही खेती  किसानी  को काम भी उनके कंधों पर है. परिणामस्वरूप उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है. खेतिहर महिलाओं का इतना बड़ा प्रतिशत घर के पारंपरिक कामों और खेत खलिहानों के  बीच दिन रात जूझता है. यही वजह है कि ऑक्सफैम की यह रिपोर्ट भी यही बताती है कि ज़मीनी स्तर पर आज भी कोई बदलाव नहीं आया है. 

यह विडंबना ही है कि जिस देश में रोजगार सृजन, राष्ट्रीय-आय व अन्तर्राष्ट्रीय-व्यापार के सभी पहलुओं के अन्तर्गत भी कृषि का महत्त्वपूर्ण स्थान है वहां किसानों की आत्महत्या समाज और सरकार दोनों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है. आत्महत्या के आंकड़े भले ही पुरुषों से जुड़े हों, इनके सबसे  ज्यादा दुष्परिणाम महिलाएं ही झेलती हैं. कमज़ोर आर्थिक हालातों में यूँ परिवार का बिखरना उन्हें हर तरह से कमज़ोर कर देता है. अकेली रह जाने वाली महिला किसान कई तरह के शोषण का शिकार बनती हैं. परिवार की अकेले जिम्मेदारी उठाती हैं. गौरतलब है कि भारत में किसान आत्महत्या 1990 के बाद पैदा हुई दुखद स्थिति है जिसमें प्रतिवर्ष 10 हज़ार से अधिक किसानों के द्वारा आत्महत्या की  रिपोर्ट्स दर्ज की गई हैं. आज़ादी इतने समय बाद भी  किसान का जीवन सूखा, अतिवृष्टि, बीज और भण्डारण सुविधाओं की कमी एवं क़र्ज़ के बोझ जैसी समस्याओं के दुश्चक्र में फंसा है. किसानों की आत्महत्या के पीछे बैंकों, महाजनों, बिचौलियों  आदि के जाल में फंसना ही बड़ी वजह है. घर के मुखिया के जाने के बाद महिलाएं इस शोषण के दंश को झेलने के लिए अभिशप्त होती हैं. आँकड़े बताते हैं कि किसानों की आत्महत्याओं के कारणों में 22.8 फीसदी ऋणग्रस्तता और दिवालियापन, 22.3 प्रतिशत पारिवारिक समस्या और 19 फीसदी खेती से संबंधित अन्य मुद्दे शामिल हैं. ‘नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो’ के आंकड़ों के अनुसार 1995 से 2011 के बीच 17 वर्ष में 7 लाख 50 हजार 860 किसानों ने आत्महत्या की है. एक अकेले महाराष्ट्र राज्य में ही अब तक आत्महत्याओं का आँकड़ा 50 हजार को पार कर चुका है.

सरकार के तमाम वादों और दावों के बावजूद कर्ज के बोझ तले दबे  किसानों की आत्महत्या ख़बरें देश के हर हिस्से से आती रहती हैं. ‘सेंटर फॉर ह्यूमन राइटस् एंड ग्लोबल जस्टिस’ और ‘द इंटरनेशनल ह्यूमन राइटस् क्लीनिक’ की तरफ से जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में किसानों की आत्महत्या की समस्या से जातिगत और लैंगिक भेदभाव की सामाजिक सच्चाई भी जुड़ी है. इस लैंगिक और जातिगत भेदभाव के चलते महिला किसानों  के साथ होने वाला दुर्व्यवहार भी आये दिन सुर्खियाँ बनता है. यही वजह है कि लम्बे अरसे से खेती  किसानी  में महिलाओं की भागीदारी और शोषण के ये हालात कायम हैं.  

इसलिए ज़रूरी है कि सरकार कृषि से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए ढांचागत बदलाव के कदम उठाये ना कि सिर्फ आर्थिक राहत देने की नीति अपनाने का काम करे. इतना ही नहीं  खेती-बाड़ी की समस्याओं के हल तलाशने के लिए आवश्यक है कि जड़ों से जुड़े कारणों पर भी गौर किया जाये. खेती-किसानी से जुड़ी महिलाओं के लिए यह व्यवस्था का यह बदलाव हर तरह से शोषण और भेदभाव से मुक्त करवाने वाला साबित हो सकता है. साथ ही उनकी इस आर्थिक भागीदारी की अहमियत समझना और इसे स्वीकार करना भी जरूरी है. ऐसा होने पर दूर-दराज़ के गांवों में रहते हुए देश के उत्थान में अहम् भूमिका निभा  रहीं, ज़मीन से जुड़ी इन महिलाओं को सही मायने में सशक्त बनाया जा सकता है.  

 


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Navin Agarwal :: - 01-01-2018
बेहद तथ्यात्मक जानकारी... मगर महिलाओं की हालत सुधारने के लिए कहीं कोई सार्थक पहल नही हो रही है... लेख मे लिखी परेशानियों के साथ साथ बहुत सी महिलाओं को यौन शोषण का शिकार भी होना पड़ता है