आप की सुप्रीमेसी या सीएम का गच्चा!

आवरण कथा , , शुक्रवार , 02-02-2018


supremacy of aap or cm demolish

शंभुनाथ शुक्ल

केंद्र के समानांतर दिल्ली सरकार को खड़ा करने के फेर में उन्होंने उपराज्यपाल से पूछा तक नहीं. नतीजा यह है कि उनके बीस विधायकों की सदस्यता चुनाव आयोग की अनुशंसा पर राष्ट्रपति ने खारिज कर दी. मालूम हो कि एक विधायक जरनैल सिंह पहले ही विधानसभा से इस्तीफ़ा देकर बाहर हो गए थे. अब आप के सुप्रीमो भले यह कहें कि वे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाएंगे लेकिन आप को चोट तो पड़ ही गई. 

लेकिन इसके साथ ही राजनीति शुरू हो गई है. भाजपा के ही नेता तथा अटलबिहारी वाजपेई सरकार में मंत्री रहे यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा ने अरविन्द केजरीवाल की पीठ पर हाथ रखा है तथा उन्हें विक्टिम बताया है. इसके साथ ही केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के अंदर की सर फुटौवल भी सामने आ गई है. अलग तरह की राजनीति का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी के लिए इसे एक बड़े नैतिक संकट के रूप में देखा जा रहा है. हालांकि आप ने विधायकों की सदस्यता रद करने का पूरा दोष चुनाव आयोग पर मढ़ते हुए इसे राजनीतिक साजिश करार दिया है. पार्टी के वरिष्ठ नेता आशुतोष ने इस फैसले को ‘असंवैधानिक तथा लोकतंत्र के लिए खतरा’ बताया.

वहीं, आप के दिल्ली संयोजक गोपाल राय ने कहा है कि राष्ट्रपति से न्याय की उम्मीद थी. पार्टी ने उनसे मुलाकात का समय भी मांगा था. लेकिन, राष्ट्रपति के सामने हमें अपनी बात रखने का मौका ही नहीं दिया गया. वहीं भाजपा और कांग्रेस ने इस फैसले को सही ठहराया है. चुनाव आयोग ने जून 2016 में इन विधायकों के खिलाफ आई शिकायत को सही ठहराते हुए सदस्यता रद करने की सिफारिश राष्ट्रपति से की थी. आप ने विधायकों के वेतन या सुविधा नहीं लेने का हवाला देते हुए लाभ का पद होने से इन्कार किया था. लेकिन, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जया बच्चन केस का हवाला देते हुए आप के तर्कों को खारिज कर दिया. आयोग ने अपनी सिफारिश में कहा कि संसदीय सचिव के तौर पर विधायकों ने वेतन या सुविधाएं ली हैं या नहीं यह अप्रासंगिक है. इसमें अहम बात यह है कि कोई पद लाभ के दायरे में आता है, तो फिर कानून के मुताबिक सदस्यता जाएगी. चुनाव आयोग द्वारा अपनी सिफारिशें राष्ट्रपति के पास भेजे जाने के तुरंत बाद इन विधायकों ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

रामलीला मैदान में अन्ना आदोलन के बाद वर्ष 2013 के दिसंबर में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) पहली बार चुनाव मैदान में उतरी थी. चुनाव में पार्टी ने 28 सीटें हासिल की थीं जो बहुमत के लिए जरूरी 36 सीटों से 8 कम थीं. काग्रेस के आठ विधायकों के समर्थन से आप ने सरकार बनाई,  लेकिन 49 दिनों बाद ही अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया था. केजरीवाल के इस फैसले पर दिल्ली की जनता ने नाराजगी जताई. इसे भांपते हुए केजरीवाल ने तुरंत ‘यू टर्न’ ले लिया और दोबारा चुनाव से पहले दिल्ली वालों से गुहार लगाई कि दिल्ली को बदलने के लिए एक मौका उन्हें और दिया जाए.

वर्ष 2015 के प्रारंभ में जब दोबारा चुनाव हुए तो केजरीवाल ने लोगों के बीच जाकर अपने इस्तीफे के लिए माफी भी मांगी. इस बार दिल्ली विधानसभा की 70 सीटों में से 67 सीटें आप को मिलीं. 14 फरवरी 2015 को अरविंद केजरीवाल दोबारा दिल्ली के मुख्यमंत्री बने और अपना मंत्रिमंडल बनाया. महीने भर बाद ही सरकार के कामकाज को बेहतर रूप से चलाने के लिए उन्होंने 21 संसदीय सचिव नियुक्त किए. कहा जाता है कि पार्टी में किसी तरह की भगदड़ रोकने के लिए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 21 विधायकों को सरकार के तमाम मंत्रालयों में संसदीय सचिव नियुक्त कर दिया. लेकिन, ये सभी विधायक लाभ के पद मामले में फंस गए. इनमें एक विधायक जरनैल सिंह ने पिछले साल पंजाब में चुनाव लड़ने के लिए विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया था. एक मंत्री के साथ तीन-तीन विधायकों को संसदीय सचिव बनाते हुए उनके काम में हाथ बंटाने का निर्देश दिया गया. इसके कोई एक महीने बाद प्रशांत पटेल नामक वकील ने इनकी शिकायत राष्ट्रपति से कर दी जिससे आप विधायकों की सदस्यता पर तलवार लटक गई.


कब-कब क्या हुआ -

 

  • मई 2015 में चुनाव आयोग के समक्ष डाली गई थी एक जनहित याचिका.
  • 19 जून 2015 को प्रशात पटेल ने राष्ट्रपति के पास इन सचिवों की सदस्यता रद करने के लिए आवेदन किया.
  • 8 सितंबर 2016 को अदालत ने 21 आप विधायकों की संसदीय सचिवों के तौर पर नियुक्तियों को खारिज कर दिया था. अदालत ने पाया था कि इन विधायकों की नियुक्तियों का आदेश उपराज्यपाल की सहमति के बिना दिया गया था. 
  • 22 जून 2017 को राष्ट्रपति की ओर से यह शिकायत चुनाव आयोग में भेज दी गई. शिकायत में कहा गया था कि यह 'लाभ का पद' है इसलिए आप विधायकों की सदस्यता रद की जानी चाहिए. तब चुनाव आयोग ने आप विधायकों को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया और उन्हें छह महीने का समय दिया था.

 


कानून के मुताबिक, दिल्ली में कोई भी विधायक रहते हुए लाभ का पद नहीं ले सकता है. आरोप है कि इसके बाद भी आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाकर उन्हें लाभ का पद दिया. गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली एक्ट, 1991 के तहत दिल्ली में सिर्फ एक संसदीय सचिव का पद हो सकता है. यह संसदीय सचिव मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़ा होगा, लेकिन केजरीवाल ने सीधे 21 विधायकों को ये पद दे दिया.

उधर आम आदमी पार्टी भी अब इन 20 विधायकों के मामले पर जनता के दरबार में पहुंच गई है. दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने दिल्ली की जनता के नाम खुला खत लिखकर पूछा है कि दिल्ली को इस तरह चुनावों में धकेलना क्या ठीक है? चुनाव आयोग के फैसले पर महज दो दिन के भीतर राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर आम आदमी पार्टी हैरानी जता रही है. अब उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने इसे गंदी राजनीति बताते हुए एक चिट्ठी ट्वीट की है और जनता से पूछा है- चुने हुए विधायकों को इस तरह गैर-संवैधानिक और गैरकानूनी तरीके से बर्खास्त करना क्या सही है? 

चिट्ठी में सिसोदिया ने लिखा, 'जिन 20 विधायकों को 'लाभ के पद' पर बताकर अयोग्य करार दिया गया, उन्हें अलग-अलग काम दिए गए थे. वे बिना एक पैसा लिए काम करते थे. विधायकों को न कोई सरकारी गाड़ी दी गई और न कोई बंगला. उन्हें सैलरी भी नहीं दी जाती थी. ये विधायक अपने खर्च पर काम करते थे. इन विधायकों में देश की सेवा का जुनून था, क्योंकि ये आंदोलन से आए थे.' सिसोदिया जनता से पूछ रहे हैं कि जब अयोग्य करार दिए गए विधायकों ने एक पैसा नहीं लिया तो ये 'लाभ के पद' पर कैसे हो गए?  उन्होंने लिखा है कि आप के इन विधायकों ने चुनाव आयोग से कहा था कि साबित कर देंगे कि वे लाभ के पद पर नहीं हैं,  लेकिन बिना सुनवाई और बगैर सबूत-गवाह देखे उन्हें बर्खास्त कर दिया,  जो दिल्ली की जनता के साथ घोर अन्याय है.

मनीष सिसोदिया ने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि केंद्र सरकार पहली बार ऐसा नहीं कर रही है. पिछले तीन सालों में दिल्ली सरकार को तंग करने में केंद्र ने कोई कसर नहीं छोड़ी. सिसोदिया ने बीजेपी पर आरोप लगाते हुए लिखा है कि विधायकों को बर्खास्त कर पार्टी ने दिल्ली पर चुनाव थोप दिए हैं और अगले 2 सालों तक दिल्ली में सारे सरकारी काम ठप रहेंगे. 20 विधानसभा सीटों पर चुनाव, फिर लोकसभा चुनाव और फिर विधानसभा चुनाव, ऐसा करते-करते पूरे दो साल निकल जाएंगे और दिल्ली की जनता परेशान होगी,  तथा खर्च का भार भी जनता पर आएगा.

लेकिन सच्चाई यह है कि मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का केंद्र से टकराव उन्हें भारी पड़ा है. इसमें खामी सिर्फ यह है कि उन्होंने ऐसा करते समय उप राज्यपाल से मंजूरी नहीं ली. अगर एलजी (उप राज्यपाल) की सहमति से उन्होंने ऐसा किया होता तो सारा दारोमदार एलजी पर जाता और उनके बच निकलने का रास्ता बचा रहता. किन्तु अरविन्द केजरीवाल ने पहले कांग्रेस से टकराव मोल लिया फिर भाजपा से. अब चूँकि वे संसदीय 

राजनीति के चलन को नहीं समझते इसलिए धड़ाम हो गए. उनका बड़बोलापन और उनके काम करने की एनजीओ शैली उनके लिए खाई बन गई. 


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