नोटबंदी जो हुआ, वह हुआ ही क्यों?

आवरण कथा , , चयन करें , 31-10-2017


demonetisation what happened why did it happen

श्रीकांत अस्थाना

‘घर में अगर 500 या 2000 के नोट हों तो धीरे-धीरे ठिकाने लगाते रहना 8 नवंबर नजदीक आ रही है. याद दिलाना मेरा फर्ज है. सनकी का कोई भरोसा नहीं!’ 


यह वह संदेश है तो पिछले 15 दिनों से ह्वाट्सऐप पर अब तक करोड़ों लोगों के पास पहुंच चुका है. 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विगत 8 नवंबर, 2016 की शाम आठ बजे देश के नाम विशेष संबोधन में जब अचानक सूचना दी की उसी रात 12.00 बजे से देश में प्रचलित 500 और 1000 रुपये मूल्य के नोट अवैध हो जाएंगे तो बहुत लोगों को इससे पैदा होने वाली स्थितियों का कोई भान तक नहीं था. इस मुद्दे पर पूरे साल भर तक चले सरकारी दावों, भ्रम पैदा करने वाली बातों और आधे-अधूरे आंकड़ों के कारण अब भी हम पूरी तरह से इसके समवेत प्रभावों को ठीक-ठीक कूतने की स्थिति में नहीं हैं. लेकिन, अगस्त महीने के आखिरी दिन आई रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट ने प्रधानमंत्री मोदी और सरकार के उन सभी दावों की हवा निकाल दी जिनके आधार पर वे नोटबंदी को सफल और सकारात्मक बताने की कोशिश करते आए थे. रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबित 8 नवंबर, 2016 को बंद किए जाने के समय चलन में रहे कुल 1544 लाख करोड़ मूल्य के 1000 तथा 500 के नोटों में से कुल लगभग 99 प्रतिशत नोट बैंकिंग तंत्र में वापस आ गए. इसका मतलब यह हुआ कि सरकार जिस काले धन, नकली धन, हवाला तंत्र के मार्फत आतंकियों को पहुंचने वाले धन को चलन से बाहर कर देने का दावा और उम्मीद कर रही थी, वैसा कुछ भी वास्तविकता में नहीं हुआ. 

प्रधानमंत्री ने दूरदर्शन से 8 नवंबर, 2016 की शाम आठ बजे के ‘संदिग्ध’ सजीव प्रसारण में इसे भ्रष्टाचार, कालाधन, आतंकवाद, हवाला नेटवर्क और जाली नोटों के खिलाफ आवश्यक कदम के रूप में पेश करते हुए लोगों से समर्थन मांगा. भावनाओं को उद्वेलित करने में सक्षम प्रधानमंत्री ने कहा कि, ‘किसी देश के इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं जब हर व्यक्ति यह महसूस करता है की उसे भी उस क्षण का हिस्सा बनना है. उसे भी राष्ट्र हित में, राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देना है. परन्तु ऐसे क्षण किसी की जिंदगी में गिने चुने ही आते हैं. आज समय हमें फिर से एक अवसर दे रहा है. हर सामान्य नागरिक भ्रष्टाचार, काला धन, जाली नोट के खिलाफ इस महायज्ञ में, इस लड़ाई में अपना योगदान दे सकता है.आपसे इस प्रक्रिया में जितना सहयोग मिलेगा, शुद्धिकरण उतना ही सफल होगा.’

उस रात बहुत कम लोग इसके संभावित प्रभावों का विश्लेषण कर सके थे. जो कर सके थे, वे भी अपनी बात सामने नहीं रख सके थे. शायद ज्यादा बड़ा सच यह है कि इस तरह के व्यापक प्रभाव वाले किसी फैसले का अतीत में कोई सामना न करने वाले लोग तो इसके बारे में अनुमान भी नहीं कर सके थे और दूसरे देशों में ऐसी नोटबंदी के एकाध उपलब्ध उदाहरणों के बारे में जानकारी रखने वाले प्रोफेसरों और अर्थशास्त्रियों ने तत्काल कोई कड़ी प्रतिक्रिया न देने में ही भलाई समझी. 

इस मनमाने, तर्कहीन, अर्थव्यवस्था की आधारभूत समझ से भी कोसों दूर और संभवतः अवैधानिक तथा संविधानेत फैसले के दुष्परिणाम ही आने थे जो अगले दिन से सामने आने लगे. जब केवल प्रधानमंत्री की घोषणा के आधार पर 1000 और 500 रुपये मूल्य के नोटों को अवैध करार दे दिया गया, उस समय देश की अर्थव्यवस्था में प्रचलित कुल मुद्रा का लगभग 86 प्रतिशत भाग इन्हीं नोटों के रूप में था जिसका कुल मूल्य लगभग 1544 लाख करोड़ रुपये था. इससे छोटे नोटों अर्थात 100, 50, 20, 10 तथा 5 रुपये के नोटों और सिक्कों की शक्ल में कुल 14 प्रतिशत धन था. अर्थशास्त्र की जरा सी भी जानकारी रखने वाला व्यक्ति बता सकता है कि आधुनिक काल में समस्त आर्थिक लेन-देन का आधार मुद्रा ही है. उसे ही चलन से बाहर कर देने का अर्थ प्रकारांतर से समस्त आर्थिक गतिविधियों को रोक देना है.

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में ही बताया था कि नोटों को अमान्य करने की उनकी योजना प्रसारण से पहले किसी को मालूम नहीं थी- न उनके सहयोगियों को, न इन नोटों पर अंकित मूल्य अदा करने का वचन देने वाले रिजर्व बैंक को, न इन्हें बाजार तक पहुंचाने और प्रचालन का संयोजन करने वाले बैंकों को और न ही भाषण में बताए गए अन्य परिवर्तक संगठनों को नोटबंदी के साथ ही अमान्य करार दे दिए गए नोटों को बदलने की सीमा और मात्रा इतनी कम रखी गई थी कि अपनी संचित पूंजी को बचाने के लिए देश भर की बैंक शाखाओं पर अफरातफरी मच गई. बिना जरूरी व्यापक तैयारी के की गई इस कार्रवाई का परिणाम यह हुआ कि लोगों को अपना सामान्य कामकाज छोड़ कर अनावश्यक रूप से पूरा-पूरा दिन बैंकों की एक-एक मील लंबी लाइनों में बिताना पड़ा. पूरे नवंबर ऐसे हालात रहे कि घंटों लाइन में लगने के बाद भी जिन्हें नोट बदलने या अपने खाते में पैसे जमा कर लेने में कामयाबी मिली उन्होंने इसे उपलब्धि माना. दिसंबर भी ऐसे ही गया. 

इन अप्रत्याशित स्थितियों के बीच वे लोग खुश भी थे जिनके पास अमूमन अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए जरूरी धन भी नहीं होता. उन्हें लग रहा था कि हमारे पास था ही क्या जो फर्क पड़ेगा लेकिन मोदीजी ने अमीरों और भ्रष्टाचारियों की खाल उधेड़ दी और अब इसका फायदा हमें मिलेगा. इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि दुर्भाग्य से देश की अर्थव्यवस्था में हाशिये पर खड़े इन लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है ये इतने शिक्षित भी नहीं हैं कि किसी राजनीतिक-आर्थिक मसले के दूरगामी परिणामों का स्वयं आकलन कर सकें न ही इतने विवेकी कि किसी मुद्दे पर फैलाए जा रहे भ्रमजाल को काट कर उसके पीछे के खुरदुरे सच को समझ सकें. इन्हें भरमाए रखने के क्रम में मोदी के अंध-समर्थक और उनकी पार्टी के आईटी सेल ने पूरे साल अभियान छेड़े रखा.

रातोरात अपनी संचित पूंजी के नष्ट हो जाने के भय ने देश भर में लाखों लोगों को बेइंतहा परेशान किया. कइयों को इसके कारण इस हद तक शारीरिक-मानसिक असुविधाएं झेलनी पड़ीं कि उन्हें चिकित्सकों की शरण लेनी पड़ी. इस दौरान बैंकों की लाइनों में खड़े-खड़े थकान और भूख-प्यास या अन्य स्वास्थ्य असुविधाओं के कारण देश भर में लगभग सैकड़ों लोगों की मौत हो गई. हजारों मरीजों को धन के अभाव में चिकित्सा सेवाओं से वंचित होकर इस दुनिया से विदा लेनी पड़ी. लाखों पूर्व-निर्धारित कार्यक्रमों को रद या स्थगित करना पड़ा. लाखों युवाओं की शादी नहीं हो सकी या उन्हें बाद की किसी तारीख के लिए टालना पड़ा. इस दौरान हमें मोटर साइकिलों पर जाती हुई बिना बैंड-बाजे की बरातें और मोटरसाइकिल या स्कूटर पर विदा होकर आती नई-नवेली दुल्हनें भी देखने को मिलीं. इन सारी अजीबोगरीब परिस्थितियों के सामने आते रहने के बावजूद बैंकों से लोगों को धन की उपलब्धता की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया. हां, देश भर में नेताओं की गाड़ियों से करोड़ों की मात्रा में नए नोटों की बरामदगी की घटनाएं जरूर सामने आईं. 

इस दौरान केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक या किसी और ने स्थितियों को सहज बनाने की कोई ऐसी कोशिश नहीं की जिसका उल्लेख जरूरी समझा जाए. इसकी एकमात्र वजह शायद यह थी कि कर्णधारों ने जरूरी तैयारियों के बारे में सोचने की जहमत नहीं उठाई थी. बैंकों की शाखाओं में नए नोट पहुंचते तो तब जब जरूरत भर छपे होते. इतनी बड़ी मात्रा में नए नोट छापने के लिए सिक्योरिटी प्रेसों में दिन-रात काम हुआ फिर भी ये कोशिशें नाकाफी रहीं. जिन लोगों ने 10-20 हजार रुपये बदलवा कर उम्मीद की थी कि वे अपनी जरूरत का पैसा बाद में एटीएम से निकाल लेंगे, उन्हें भी नाकामयाबी और मायूसी के सिवा कुछ हाथ नहीं लग रहा था. नए नोटों के आकार और मशीनी पहचान के अनुरूप एटीएमों को पुनर्योजित करने में लंबा समय लग रहा था क्योंकि देश भर में लगे एटीएमों में एक साथ बदलाव कर सकने की क्षमता इनकी सेवा और रखरखाव करने वाली एजेंसियों में नहीं थी. यह प्रक्रिया मार्च के अंत तक चलती रही. 

विमुद्रीकरण का कहर जिन पर सबसे ज्यादा टूटा वे थे किसान, महिलाएं, 25-50 हजार की कारोबारी पूंजी के सहारे बेहद छोटे स्तर पर व्यवसाय करने वाले, दो-चार लाख रुपये की पूंजी के साथ काम करने वाले छोटे उद्यमी और व्यवसायी और वह मध्यमवर्ग जिसके कारण अम्बानी, अडानी, बिड़ला और टाटा जैसे 50-60 घराने, जो दुनिया के सबसे रईस लोगों में शामिल हो पाते हैं और दुनिया भर के कारोबारी भारत में कारोबार करना चाहते हैं. जिस तरह धनहीन लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, उसी तरह मध्यमवर्ग से ऊपर वाली आर्थिक श्रेणी के सदस्यों को भी थोड़ी बहुत ही तकलीफ हुई. उनमें से ज्यादातर ने अपने पैसे को विभिन्न साधनों और प्रयासों से बदल लेने में सफलता पाई. इन मामलों में बैंकों की मिली भगत के किस्से सामने आए तो कर्मचारियों को लगा कर काउंटर पर पैसे बदलवाने के किस्से भी. इसके अलावा, जिन व्यापारियों या उद्यमियों के सहारे बैंकों की शाखाएं चलती रही हैं, उन्हें अपना धन बदलवाने में भला क्या संकट हो सकता था?

जिस समय नोटबंदी की घोषणा हुई, वह उत्तर भारत में रबी की फसलें बोने या फिर अगेती फसलों के मामले में खाद-पानी देने का समय होता है. कृषि संबंधी मुश्किलों से जूझते रहने वाले किसानों के पास इस झटके के बाद खेतों में बीज डालने या फिर खाद खरीदने के पैसे भी नहीं थे. जब तक राज्य सरकारों की ओर से उन्हें साख के आधार पर इन निवेशों को मुहैया कराने की व्यवस्था की जाती तब तक काफी देर हो चुकी थी. इसका प्रभाव रबी के उत्पादन के आंकड़ों में देखा जा सकता है. किसानों के हाथ में पैसे न होने का सीधा असर कृषि मजदूरों की पतली हालत के साथ ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था के अन्य हिस्सों पर भी देखा गया. ग्रामीण इलाकों में बहुत सी जगहों से वस्तु-विनिमय के आधार पर लेनदेन की खबरे आईं जरूर, पर ये आर्थिक गतिविधियां केवल अत्यंत अपरिहार्य आवश्यकताओं तक सीमित रहीं. 

महिलाओं, खास कर ग्रामीण वृद्धाओं और गृहस्वामिनियों, को तो इस नोटबंदी ने बिलकुल छूंछा कर दिया. गरीब से गरीब परिवार की भी बुजुर्ग महिलाओं के पास जिंदगी भर घर चलाने के दौरान आड़े वक्त के लिए की गई छोटी-छोटी बचतों से जुटे गुप्त धन का सबके सामने पर्दाफाश हो गया – चाहे वह दो हजार रहा हो या 20 लाख. ग्रामीण क्षेत्रों में तो बहुत सी वृद्धाओं के पास बैंक खाते भी नहीं थे. ऐसे में उन्हें अपनी संचित निधियां उनके हाथ सौंपनी पड़ीं जिनको इसके बारे में पता तक नहीं था. ऐसे मामलों में इसके कारण पारिवारिक विवादों से लेकर इस धन की बंदरबांट तक सभी कुछ हुआ. उन शहरी महिलाओं को भी ऐसी ही स्थितियों का सामना करना पड़ा जिनके पास बैंक खाते नहीं थे या जिन्हें इनके संचालन में किसी की मदद लेनी पड़ती है. 

नोटबंदी के बाद जनवरी तक नगद का ऐसा संकट रहा कि जिनके पास बैंक में पैसे थे वे भी अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी भुगतान करने की स्थिति में नहीं थे. बैंकों से चार-आठ हजार बदलवा कर आए लोगों को भी बाजार में खाली हाथ घूमते देखा जा सकता था क्योंकि दुकानदारों के पास अपना भुगतान लेने के बाद बाकी पैसे लौटाने के लिए जरूरी धन ही नहीं था. ऐसे में उपभोक्ता अपनी अपरिहार्य जरूरतों के लिए केवल उन दुकानदारों तक जा सकते थे जिनसे उन्हें साख पर सामान मिल सकता था. स्वाभाविक रूप से ऐसी स्थितियों में फंसे लोगों ने अपनी जरूरतों को उस सीमा तक खत्म किया जिस संभव सीमा तक ऐसा किया जा सकता था इसके कारण बाजार में लेन-देन और धन के आगम-निर्गम की व्यवस्था लगभग ठप पड़ गई. इसका असर पीछे उत्पादन प्रक्रियाओं तक जाना स्वाभाविक था. बाजार में मांग न रह जाने के कारण असंगठित क्षेत्रों के उत्पादकों के सामने उत्पादन को बंद करने या न्यूनतम स्तर तक सीमित रखने के सिवा कोई चारा नहीं था. इन स्थितियों का असर संगठित क्षेत्र में बड़ी पूंजी वाली इकाइयों पर भी अंतिम रूप से पड़ना ही था. पिछले वर्ष की अंतिम तिमाही से लेकर इस वर्ष की दूसरी तिमाही तक के आंकड़े अर्थव्यवस्था की रफ्तार को ऋणात्मक गति की ओर ले जाने वाली इन प्रवृत्तियों को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करती हैं

देश-दुनिया के बड़े-बड़े नामधारी अर्थशास्त्रियों ने इस अवैधानिक और संभवतः संविधानेतर फैसले की खूब भर्त्सना करते हुए इसे लोकहित के विरुद्ध बताया लेकिन मोदी और उनके साथी लगातार इस फैसले का बचाव करने में लगे रहे. तर्क न दे पाने की स्थिति में इन लोगों ने 'हार्वर्ड बनाम हार्ड वर्क' जैसे नारे गढ़े और फैलाए. तथ्यों और तर्कों से न समझा पाने की स्थिति में मोदी सरकार की पार्टी का आईटी सेल पूरे साल इससे हुई और हो रही तकलीफों को दूरगामी बड़े फायदे की ‘प्रसव पीड़ा’ बताता रहा. 

विमुद्रीकरण का फैसला आने के कुछ ही बाद अर्थशास्त्र में नोबेल-सम्मानित विद्वान अमर्त्य सेन ने मोदी के इसकी कड़ी आलोचना करते हुए कहा था कि यह निरंकुश कदम है जिससे लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. उन्होंने यहां तक कहा कि नोटबंदी का फैसला न समझदारी भरा है न ही मानवीय. सरकार के काले धन को काबू करने के प्रयासों के बारे में पूछे जाने उन्होंने कहा कि काले धन पर लगाम लगाने के लिए सरकार को कुछ करना चाहिए लेकिन हमें देखना होगा कि ऐसा करने का सही तरीका क्या है. उन्होंने आशंका जताई थी कि बड़े नोटों पर प्रतिबंध लगाना अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह होगा और वास्तव में इससे सफेद धन वालों को ही परेशानी होगी क्योंकि काला धन रखने वाले अनुभवी लोग हमेशा इससे बच निकलने का रास्ता निकाल लेंगे. इसके कुछ महीने बाद जब इसके परिणाम सामने आने लगे थे तो व्याख्यान के दौरान उन्होंने एक बार फिर नोटबंदी की आलोचना करते हुए कहा कि यह एकतरफा तरीके से दागी गयी बिना दिशा की मिसाइल है और इसमें लोकतांत्रिक परम्पराओं का पालन नहीं किया गया 

एक अन्य प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कौशिक बासु और रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन समेत विश्व के कई प्रमुख आर्थिक समीक्षक और विश्लेषक पिछले साल भर में अनेक मौकों पर नोटबंदी के कुप्रभावों की चर्चा करते हुए इसे बेतुका, निरंकुश और अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती बता चुके हैं.

नोटबंदी से जुड़े मामलों में प्रक्रियागत अनदेखियों, रिजर्व बैंक की अवहेलना और इसके प्रभावों के अध्ययन के क्रम में वित्तीय मामलों की स्थायी संसदीय समिति ने पूरे प्रकरण की जांच करने का क्रम लगभग पूरे साल ही चला. हालांकि, रिजर्व बैंक गवर्नर उर्जित पटेल और शेष सरकारी तंत्र के सीमित सहयोग के परिणामस्वरूप इसकी रिपोर्ट को अंतिम शक्ल देने में इतना समय लग गया. समझा जा रहा था कि समिति संसद के मानसून सत्र में अपनी रिपोर्ट सदन में पेश कर देगी लेकिन ऐसा हो नहीं सका. उम्मीद है कि यह रिपोर्ट संसद के शीतकालीन सत्र में सदन के पटल पर रखी जाएगी. समिति के सदस्यों ने इस बारे में अब तक जितनी जानकारी साझा की है उसके मुताबिक इस रिपोर्ट में नोटबंदी के फैसले की आलोचना की गई है. वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाली इस समिति में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी सदस्य हैं समिति ने नोटबंदी के मुद्दे पर रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल और वित्त मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों को बुलाया था.

समिति के एक सदस्य ने बताया कि रिपोर्ट का मसौदा समिति के पिछले कार्यकाल में तैयार किया गया था और इसे वितरित किया गया था, लेकिन अब इस समिति को पुनर्गठित किया गया है इसलिए मसौदे को फिर से वितरित किया जाएगा. समिति के एक और सदस्य ने कहा कि रिपोर्ट में कुल मिलाकर नोटबंदी के फैसले की आलोचना की गई है और इसे संसद के अगले सत्र में सदन के पटल पर रखा जाना है. समिति के कुछ सदस्यों ने रिपोर्ट का मसौदा फिर से तैयार करने की मांग की थी क्योंकि रिजर्व बैंक ने उस समय कुछ महत्पपूर्ण जानकारियां नहीं दी थीं मसलन यह नहीं बताया गया था कि 500 और 1000 रुपये के कितने नोट उसके पास आए हैं.

लगभग दो माह पहले 30 अगस्त को जारी हुई रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट में भी जिन आंकड़ों को पेश किया उनके मुताबिक नोटबंदी के दौरान कुल 99 प्रतिशत प्रचलन से बाहर किए गए नोट बैंकों में जमा हुए. नोटबंदी से पहले कुल 1544 लाख करोड़ की कीमत के 1000 और 500 के नोट प्रचलन में थे. इनमें से कुल 1528 लाख करोड़ रुपये की कीमत के नोट बैंकों में वापस आ गए. सिर्फ 14 फीसद हिस्से को छोड़कर बाकी सभी 1000 रुपये के नोट बैंकिंग तंत्र में वापस लौट चुके हैं. उल्लेखनीय है कि इस रिपोर्ट के जारी होने के कुछ पहले तक रिजर्व बैंक वापस आए नोटों के बारे में यही कहता था कि अभी नोट गिने जा रहे हैं.  

रिज़र्व बैंक के 4 अगस्त, 2017 के आंकड़े के मुताबिक उस दिन देश की अर्थव्यवस्था में कुल 14,75,400 करोड़ की करेंसी थी जो पिछले साल यानी विमुद्रीकरण के ठीक पहले मौजूद करेंसी के मुकाबले ये 1,89,200 करोड़ रुपये कम है. रिजर्व बैंक इसे ‘लेस कैश’ तंत्र की तरफ बढ़ना मानता है जबकि दूसरे बैंकों के लेनदेन के आंकड़ों और कैशलेस लेनदेन वाले संगठनों के आंकड़ों के मुताबिक इस वर्ष की जनवरी, फरवरी में कैशलेस लेनदेन में हुई वृद्धि आगे के महीनों में आई कठिनाइयों और विश्वसनीयता की कमी के चलते वापस सितंबर-अक्टूबर 2016 के स्तर की ओर लौटने के संकेत हैं. रिजर्व बैंक ने अर्थव्यवस्था में लोगों के हाथ में करेंसी की उपलब्धता अनुपलब्धता से किन आर्थिक प्रवृत्तियों का संकेत करना चाहता है, यह भी अस्पष्ट है. क्या ‘लेस कैश’ किसी रूप में कैश ऐंड डिजिटल के मौजूदा स्वरूप से बेहतर है? समाज डिजिटल प्रक्रिया की ओर स्वयं अपनी गति से बढ़ रहा है और क्या किसी भी दशा में बड़ी संख्या में अशिक्षित और अपर्याप्त संसाधनों वाले इस देश में डिजिटल इकॉनॉमी को बाध्यकारी बनाने का फैसला लोकविरोधी नहीं होगा?

नोटबंदी के फैसले की कड़ी आलोचना करते रहे पूर्व वित्तमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने इस रिपोर्ट के बाद एक बार फिर सरकार और आरबीआई पर कड़ा हमला किया. उन्होंने पूछा कि क्या नरेंद्र मोदी सरकार ने नोटबंदी का यह फैसला काले धन को सफेद करने के लिए लिया था? उन्होंने इसे बेहद गैरजिम्मेदाराना नीति-निर्माण का उदाहरण बताया है. अर्थशास्त्री और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इस फैसले पर संसद में बहस के दौरान कड़ी भर्त्सना की थी. राजनीतिक दलों में केवल एक जनता दल –यू के नेता नीतिश कुमार ही इस फैसले के पक्ष में थे अन्यथा अन्य सभी ने इसे अर्थव्यवस्था और देश के लिए घातक बताते हुए आलोचनाएं की थीं. 

अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक परिणामों के चौतरफा प्रमाणों के बावजूद सरकार को नोटबंदी के सकारात्मक परिणाम दिखाई दे रहे हैं. रिजर्व बैंक की रिपोर्ट से यह साफ हो जाने के बाद कि कथित काला धन इस प्रक्रिया की छननी से नहीं छना तो वित्तमंत्री ने बताया कि इससे आतंकियों को वित्तपोषण पर रोक लग सकी और काले धन पर लगाम लगी. उनका दावा है कि विमुद्रीकरण से न केवल काले धन पर करारी चोट हुई है बल्कि इससे भ्रष्टाचार की जड़ें भी हिल गई हैं. 

वित्तमंत्री का आंकड़ा कहता है कि विमुद्रीकरण की वजह से तीन लाख करोड़ रुपये पहली बार बैंकिंग तंत्र में आए. जाहिर तौर पर इसके वैध या अवैध होने की जांच तो की ही जा रही है, लेकिन इसकी वजह से आम लोगों को सीधे फायदा पहुंचा है. सच यद्यपि ऐसा नहीं है, परंतु वित्तमंत्री का दावा है कि इसके चलते बैंक लोन की दरें कम हुईं हैं. विमुद्रीकरण के चलते पहली बार इतना बड़ा पैसा सरकार की जानकारी में आया है, जिसपर टैक्स लगने से सरकार के खाते में पैसा आएगा तो साथ ही बड़ी मात्रा में काले धन का भी खुलासा होगा. 

विमुद्रीकरण की वजह से देश की अर्थव्यवस्था की सफाई का दावा करते हुए वित्तमंत्री का कहना है कि इसके चलते अब तक दो लाख फर्जी कंपनियों का पता चला है, जिससे कालेधन के लेन-देन का कारोबार चलता था. टैक्स रिटर्न में भी इसकी वजह से कई बड़ी गड़बड़ियों का पता चला तो पहली इस साल 56 लाख नए करदाता भी बने. हालांकि, नए करदाताओं की संख्या के बारे में आयकर विभाग और प्रधानमंत्री के आंकड़े वित्तमंत्री के आंकड़ों से अलग हैं. विमुद्रीकरण से कथित रूप से करीब 18 लाख ऐसे लोगों का पता चला, जिनकी संपत्ति या लेनदेन उनकी घोषित आय से ज्यादा है.

बहरहाल इस रिपोर्ट के आने के बाद वित्तमंत्री अरुण जेटली ने प्रधानमंत्री मोदी का बचाव करते हुए कहा कि नोटबंदी का उद्देश्य डिजिटलाइजेशन और आतंकवाद के वित्त पोषण पर चोट करना था. उनके मुताबिक “भारत मुख्य रूप से उच्च नकदी वाली अर्थव्यवस्था है, इसलिए उस स्थिति में काफी बदलाव की आवश्यकता है. प्रत्यक्ष कर आधार में विस्तार हुआ है और ठीक ऐसा ही अप्रत्यक्ष कर के साथ भी हुआ है, यही नोटबंदी का प्रथम उद्देश्य था. अब करदाताओं की संख्या ज्यादा है, टैक्स आधार बढ़ा है, डिजिटलीकरण बढ़ा है, सिस्टम में नगदी में कमी आई है, यह भी नोटबंदी के प्रमुख उद्देश्यों में से एक था.” 

इस आलेख की शुरुआत में मैंने जिस संदेश का जिक्र किया है, अगर उसे नोटबंदी पर जनता की प्रतिक्रिया मान लिया जाए तो इतना तो साफ है कि इस फैसले ने मुद्रा के प्रति अविश्वास को जन्म दिया है. किसी को भरोसा नहीं है कि जो नोट अभी हाथ में है, वह कल किसी काम का रहेगा या नहीं. अर्थव्यवस्थाएं ऐसे अविश्वास की भारी कीमत चुकाती हैं. बहरहाल, सालगिरह पर इस बारे में जिम्मेदार लोगों से यह पूछने का हक तो लोगों को है ही कि आपने जो किया वह क्यों किया? जो फायदे आप बता रहे हैं उन्हें सामने लाने का पूरा तंत्र तो पहले से ही था. क्या वह काम नहीं करता था? n


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pradeep Kumar shama :: - 11-07-2017
Over the period,infusion of fake currency had bcome a tool to hijack the economy.It was very convenient for a neighbouring country to just print fake Indian Currency(an art which they have perfected) for subversive uses.Even Daud had started to call him self as a " Vyapari" and was expanding business in India.Practically one key of our economy was in the hands of a neighbour.They used to infuse fake money at free will,our PM patted his back that GDP is up. Precisely in principle,economy which is one of functions of the state had become a threat to the state.Thanks for right intervention by demonetisation like a Chemo.Of course its one of side effects of Chemo that it kills harmful ,as well as helpful fast growing cells to curb the cancerous growth. Those opposing it ,I thing have a pathogenic mindset.