युवा आकांक्षाओं को ठेंगा!

आवरण कथा , , बृहस्पतिवार , 29-03-2018


Young Aspirations will choke

श्रीराजेश

केंद्र सरकार ने बजट 2018-19 पेश करते हुए गांव, युवाओं और खेती को संरक्षण दिए जाने का दावा किया है और वर्तमान परिस्थिति में इस पर सहज ही विश्वास नहीं किया जा सकता है क्योंकि पेश किया गया बजट दर्शाता है कि भारत सरकार देश की अर्थव्यवस्था और समाज व्यवस्था के बीच के संबंधों को समझने में एक बार फिर से नाकाम साबित हुई है.

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के 2017 के आंकड़ों के अनुसार भारत में आधिकारिक रूप से बेरोजगारों की संख्या 6.8 करोड़ हैं, जिनमें अधिकांश युवा हैं. श्रम और रोजगार मंत्रालय की बीते साल की रिपोर्ट बताती है कि संगठित क्षेत्र में रोजगार, कुल रोजगार का सिर्फ 10.1 फीसद है, जबकि हमारे 60 करोड़ से अधिक कामगारों को असंगठित क्षेत्र में रोजगार मिला हुआ है, जहां सीमित सामाजिक सुरक्षा मिलती है और न्यूनतम वेतन का बमुश्किल पालन होता है. अर्नेस्ट एंड यंग की रिपोर्ट बताती है कि एक दशक के अंदर भारत में विश्व का सबसे बड़ा कार्यबल होगा. इसमें रोजगार पाने की उम्र के 4.7 करोड़ युवा सरप्लस होंगे, जबकि वैश्विक आंकड़ा 5.65 करोड़ का है. मौजूदा समय में ग्रामीण और शहरी भारत में औसत दिहाड़ी पारिश्रमिक की दर काफी कम है. एक किसान धान की बुवाई कर प्रति एकड़ प्रति माह 2,400 रुपये कमाता है, जबकि गेहूं से 2,600 रुपये कमाता है. खेतिहर मजदूर प्रति माह 5,000 रुपये कमाता है (भारतीय सांख्यिकी, 2016). खेती के पेशे में औसत दिहाड़ी काफी कम है- जुताई के काम में शारीरिक रूप से सक्षम एक मजदूर वर्ष 2016 में रोजाना 280.50 रुपये कमाता था, जबकि महिला सिर्फ 183.56 रुपये कमा रही थी. शहरी काम में- इलेक्ट्रीशियन और निर्माण मजदूर औसतन क्रमशः 367.16 और 274.06 रुपये रोजाना कमाते हैं, जबकि गैर-कृषि मजदूर 237.20 रुपये कमाता है. इस कमाई का भी एक हिस्सा उपभोक्ता मुद्रास्फीति निगल जाती है. 

बजट 2017-18 के वक्तव्य के तहत कहा गया है कि वर्ष 2019 तक एक करोड़ परिवारों को गरीबी से बाहर ले आया जाएगा और 50 हजार पंचायतें गरीबी से मुक्त होंगीं. यह वायदा उस स्थिति में किया गया है, जिसमें गरीबी की परिभाषा ही तय नहीं है. गरीबी का सबसे गहरा जुड़ाव बेरोजगारी और आजीविका के संकट से है. राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो के प्रतिवेदनों के मुताबिक भारत में वर्ष 2001 से 2015 के बीच 72333 लोगों ने गरीबी और बेरोजगारी के कारण आत्महत्या की. जनगणना 2011 के मुताबिक भारत में काम खोज रहे लोगों (जिनके पास कोई काम नहीं था) की संख्या 6.07 करोड़ थी, जबकि 5.56 करोड़ लोगों के पास सुनिश्चित काम नहीं था. इस प्रकार 11.61 करोड़ लोग सुरक्षित और स्थायी रोजगार की तलाश में थे. अनुमान बता रहे हैं कि यह संख्या वर्ष 2021 में बढ़कर 13.89 करोड़ हो जाएगी.

हर साल 60 लाख युवा स्नातक शिक्षा पूरी करते हैं, उन्हें भी रोजगार चाहिए. उनके लिए कौशल विकास के लिए 3500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. यह तय है कि भारत सरकार देश के युवाओं को कमजोर मानती है क्योंकि उनके पास बाजार के अनुरूप कौशल नहीं है, वह यह नहीं जानना चाहती है कि जो कौशल हमारे समाज और युवाओं में है, उसके मुताबिक भी अवसर खड़े किए जाएं. मसलन प्राकृतिक संसाधनों का पूरा हक समुदाय को देना, हस्त-कलाओं को प्रोत्साहन देना आदि. औद्योगिकीकरण के कारण स्थानीय संस्कृति, कलाएं और कौशल को आर्थिक नीतियों में “कमजोरी” ही माना जाता है.

वर्ष 1991 में जब घोषित रूप से उदारीकरण और निजीकरण की नीतियां अपनाई गई थीं, तब सबसे गहरा आघात गांव और खेती पर ही हुआ था. तब से हर सरकार ने खुलकर यह कहा है कि जब तक लोगों को गांव और खेती से बाहर नहीं निकालेंगे, तब तक आर्थिक विकास के लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सकता है. ऐसा किया भी गया. परिणाम हुआ किसानों ने खूब आत्महत्याएं की, बेरोजगारी बढ़ी और भुखमरी बढ़ी.

सरकारें यह समझ ही नहीं पाईं कि सीमित संसाधनों के कारण केवल वृहद औद्योगिकीकरण से ऊंचे वित्तीय लक्ष्य हासिल भी नहीं किए जा सकते हैं और न ही सभी को रोजगार दिया जा सकता है. माध्यम और लघु उद्योगों को संरक्षण देने की बात कही गई है, पर यह तय करना होगा कि यह उद्योग लघु उद्योगों के पूरक बनें, बड़े उद्योगों के नहीं.

सीमांत कृषि अर्थव्यवस्था कृषि श्रम बाजार में युवाओं को बड़े पैमाने पर भागीदारी करने से हतोत्साहित कर रही है, जो बेहतर क्वालिटी जॉब्स मार्केट की जरूरत को इंगित कर रही है. सरकारें हमेशा इसे प्राथमिकता देती रही हैं. सबसे पहले 1998 में एक राष्ट्रीय युवा नीति बनायी गयी, जबकि राष्ट्रीय युवा नीति (2003) में युवाओं के कौशल विकास को बढ़ावा देने की बात कही गयी, बाद में 2005 में जिसे राष्ट्रीय कौशल विकास परिषद के गठन से और मजबूती मिली. 2014 की राष्ट्रीय युवा नीति में केंद्र सरकार ने युवाओं को लक्षित करके बनी योजनाओं पर सालाना 90,000 करोड़ रुपये खर्च करने का वादा किया था. लेकिन सवाल है कि क्या यह राशि पर्याप्त है.  शिक्षा व्यवस्था को नये प्रयोगों को अपनाकर सुधार करने पर हमेशा से ही बहुत मामूली रकम (चालू वित्त वर्ष 2018 में सिर्फ 275 करोड़ रुपये) खर्च की जाती रही है. इस बजट में निजी क्षेत्र को प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई) के तहत रोजगार-योग्य कौशल के विकास के लिए प्रोत्साहित किया जाये, खासकर ऐसे माहौल में, जहां ऑटोमेशन के चलते 69 फीसदी नौकरियां खतरे में हैं. शिक्षा के लिए भुगतान योजनाओं का विस्तार किया जाना चाहिए था, जबकि राष्ट्रीय कौशल विकास परिषद को अर्थपूर्ण बजट उपलब्ध कराया जाना चाहिए था.

सरकार को स्टार्ट अप के निर्माण में मदद पर ध्यान देना देते हुए मौजूदा 'स्टार्ट इंडिया फंड' को गतिशील बनाने की दिशा में पहल करनी चाहिए थी साथ ही सुनिश्चित करने का तंत्र भी विकसित किये जाने की जरुरत है कि इस फंड का इस्तेमाल सटीक तरीके से हो. यह बजट आंत्रप्रेन्योर्स के लिए स्टार्टअप फर्म शुरू करने, उन्हें चलाने और जरूरत पड़ने पर बिना झंझट निकल सकने की आसानी पैदा करनेवाला होना चाहिए था. लेकिन ऐसा कुछ बजट में फिलहाल दिख नहीं रहा और यह नये उद्यमियों को निराश करता है.  

ऐसे समय में राष्ट्रीय रोजगार नीति तैयार करने की भी बहुत जरूरत है. सरकार को उद्यमियों और निजी क्षेत्र की कंपनियों को वित्तीय और टैक्स लाभ देकर ज्यादा लोगों को काम पर रखने के लिए प्रेरित कर संगठित क्षेत्र के हर सेक्टर में क्वालिटी जॉब्स पैदा करने के लिए रोडमैप भी पेश करना चाहिए. हमें लाखों रोजगार पैदा करने की क्षमता रखनेवाले टेक्सटाइल, कंस्ट्रक्शन, इन्फ्रास्ट्रक्चर पर नियमों का बोझ कम करने पर विचार करना चाहिए.   

हमें हर हाल में दुनिया के दूसरे देशों के मौजूदा रुख के अनुरूप अपनी नीतियां बनानी चाहिए. वैश्वीकरण के विरुद्ध बढ़ते राजनीतिक शत्रुतापूर्ण माहौल में शुल्क बढ़ाकर रुकावटें पैदा करने जैसे दूसरे देशों के कदमों को देखते हुए हमें भी कदम उठाने होंगे. भारत को किसी भी हाल में नौकरियां पैदा करनेवाले हल्के मैन्युफैक्चरिंग उद्योगों को चीन और पश्चिम से वापस अपने देश में लाना होगा. इस व्यापक परिदृश्य में हम दुनिया के स्तर पर हो रही उथल पुथल को भूल नहीं सकते हैं. हमें एक बार फिर अपनी बुनियादी अर्थव्यवस्था की तरफ लौटना होगा. 


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