हल औद्योगिक विकास में है

आवरण कथा , , बृहस्पतिवार , 29-03-2018


Solution is in industrial development

आलोक पुराणिक

बजट में घोषणा की गयी कि किसानों को उनकी फसलों की लागत का डेढ़ गुना देने का इंतजाम किया जायेगा समर्थन मूल्य की शक्ल में, यानी फसलों की उपज का समर्थन मूल्य उनकी लागत से पचास प्रतिशत ज्यादा होगा. इस घोषणा के लिए बजट की जरुरत नहीं थी. यह घोषणा बजट के बाहर भी की जा सकती थी. पर बजट में इसकी घोषणा का अर्थ है कि सरकार अपने किसान-हितचिंतक होने की घोषणा एक बड़े इवेंट में ही करना चाहती थी. पर समझने की बात यह है कि सिर्फ समर्थन मूल्य का मसला नहीं है. समर्थन मूल्य की घोषणा के बाद भी किसानों को अपनी फसलें समर्थन मूल्य से कम में बेचनी पड़ती हैं. इस स्थिति के निराकरण के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने एक और स्कीम निकाली है - भावांतर स्कीम - यानी अगर बाजार मूल्य समर्थन मूल्य से कम होगा, तो उस अंतर की भरपाई मघ्यप्रदेश की सरकार  करेगी. समर्थन मूल्य के ऊंचे होने भर से हल नहीं निकलता, इसके लिए कई बार भावांतर जैसी स्कीम भी राज्य सरकारों को लानी होगी. केंद्र की इस बजट घोषणा के बाद सरकार यह बात आसानी से कह सकती है कि यह किसान-प्रिय सरकार है. इस बात के राजनीतिक निहितार्थ हैं.

हाल में आये आर्थिक सर्वेक्षण में साफ किया गया था खेती का विकास मुश्किल से साल में दो प्रतिशत हो पा रहा है और दूसरी तरफ शेयर बाजार में सेनसेक्स एक साल में बीस परसेंट से ऊपर चला गया. औद्योगिक विकास की दर करीब चार प्रतिशत रहने के अनुमान हैं. पर गिरी हुई हालत में भी सेनसेक्स एक साल में बीस प्रतिशत से ऊपर की बढ़ोत्तरी दिखा रहा है. मतलब गिरी हुई हालत में भी, यानी 6 फरवरी 2018 को जब सेनसेक्स हाहाकारी तरीके से गिरकर 34,195.94 बिंदुओं पर बंद हुआ था, तब भी इसके रिटर्न एक साल में बीस प्रतिशत से ऊपर बैठ रहे थे. साल में बीस प्रतिशत विकास तो हाल के सालों में कभी खेती का ना हुआ. करीब दो फीसदी की विकास दर खेती में होगी 2017-18 में, ऐसा अनुमान हाल में आये आर्थिक सर्वेक्षण ने लगाया है. खेती दो प्रतिशत से विकास करे साल में और शेयर बाजार बीस परसेंट विकास करे एक साल में, यह बात ठीक नहीं है. यह न तो अर्थव्यवस्था के लिए ठीक है और न ही शेयर बाजार के लिए, और न ही लोकतंत्र के हित में है. संदेश यह जाता है कि कोई तो बहुत ज्यादा कमा रहा है और कोई बिलकुल भी नहीं कमा पा रहा है. उद्योग जगत के विकास की रफ्तार सिर्फ चार प्रतिशत है, जो बिलकुल ठीक नहीं है. वैसे स्टाक बाजार के हाहाकारी गिरावट का मतलब यह नहीं है कि सब डूब गया है. स्टाक बाजार कृत्रिम तौर पर ऊपर जा रहा है. ऐसी चेतावनी पहले भी लगातार दी जाती रही थीं. 

आर्थिक  सर्वेक्षण 2017-18 के पहले खंड के बाक्स नौ में भारतीय और अमेरिकन स्टाक बाजारों की चढ़ाई की तुलना की गयी है. सर्वेक्षण बताता है कि दिसंबर 2015 के मुकाबले अमेरिका का सूचकांक स्टेंडर्ड एंड पुअर सूचकांक 45 प्रतिशत ऊपर जा चुका है और भारतीय सेनसेक्स 46 प्रतिशत ऊपर जा चुका है. आर्थिक सर्वेक्षण चिन्हित करता है इस अवधि में अमेरिका की अर्थव्यवस्था की विकास दर ऊपर गयी भारत की विकास दर नीचे आयी. भारत में कंपनियों का कमाई अनुपात सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले लगातार कम हुआ है. अभी यह सिर्फ 3.5 प्रतिशत है. यानी सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात के बतौर कारपोरेट सेक्टर सिर्फ 3.5 प्रतिशत कमा रहा है. अमेरिका में यह 9 प्रतिशत है. अमेरिका में ब्याज की दरें भारत में ब्याज की दरों के मुकाबले कम हैं. सर्वेक्षण का आशय यह था कि इस जबरदस्त तेजी पर सतर्क रहने की जरुरत है. सेनसेक्स कुछ हफ्तों में ही हजार बिंदु पार कर ले रहा है, उस पर ध्यान से निगाह रखने की जरूरत है. यानी औद्योगिक विकास, कंपनियों की कमाई में रफ्तार नहीं आ रही है, फिर भी सेनसेक्स की रफ्तार में थोड़ी रुकावट आयी है, उसके बाद भी बीस परसेंट की ऊंचाई है वहां.

खेती का अर्थ और उद्योग जगत के मायने
उम्मीद है कि 2017-18 में विकास दर 6.75 प्रतिशत होगी. पहले कयास थे कि यह 6.50 प्रतिशत से ऊपर ना जायेगी. आने वाले सालों में उम्मीद और मजबूत होती दिखती है. सर्वेक्षण के मुताबिक 2018-19 में यह बढ़कर 7 से 7.5 प्रतिशत तक हो जायेगी. यानी भविष्य बेहतर है इस साल के मुकाबले.
2017-18 में कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्रों में क्रमश: 2.1 प्रतिशत, 4.4 प्रतिशत और 8.3 प्रतिशत दर की वृद्धि होने की उम्मीद है. खेती में सबसे कम विकास यानी 2.1 प्रतिशत और फिर उद्योगों में ज्यादा यानी 4.4 प्रतिशत विकास और सबसे ज्यादा सेवा क्षेत्रों में यानी 8.3 प्रतिशत विकास दर से साफ होता है कि ‘मेक इन इंडिया’ के नारों के बावजूद उद्योग जगत पांच प्रतिशत का आंकड़ा भी विकास में पार नहीं कर पा रहा है. समूची अर्थव्यवस्था को पांच प्रतिशत से ज्यादा विकास करवाने में सेवा क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है. सेवा क्षेत्र का विकास बहुत अच्छी बात है पर सेवा क्षेत्र में रोजगार उन्हीं को उपलब्ध हो पाता है जिनके पास ज्ञान और कौशल का एक न्यूनतम स्तर होता है. जबकि औद्योगिक जगत में कई मामलों में अशिक्षितों को भी रोजगार हासिल हो जाता है. सेवा क्षेत्र पर ही  आने वाले सालों में दारोमदार रहना है, यह बात फिर साफ होती है.
सर्वेक्षणों में साफ हुआ कि हाल के सालों में खेती पर निर्भर युवाओं की तादाद बढ़ गयी है. 2004-05 में खेती में लगे 15 साल से 29 साल की उम्र के युवाओं की संख्या करीब 8 करोड़ सत्तर लाख थी. यह 2011-12 में गिरकर 6 करोड़ 10 लाख हो गयी थी. 2011-12 के बाद फिर खेती पर निर्भर युवाओं की तादाद बढ़ी. 2011-12 से 2015-16 तक करीब दो करोड़ चालीस लाख युवा खेती में बढ़ गये. यानी करीब आठ करोड़ पचास लाख युवा खेती में है. पढ़ाई लिखाई बढ़ रही है,महत्वाकांक्षाएं बढ़ रही हैं फिर भी युवाओं की तादाद खेती में बढ़ने का एक साफ संकेत है कि वैसे रोजगार उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं जहां युवाओं को और खासतौर पर खेती में लगे युवा को खेती से हटाकर लगाया जा सके. कुछ नहीं से खेती भली, इस तरह का भाव ग्रामीण युवाओं में घर कर रहा है.
ऐसे रोजगार अवसर पैदा नहीं हो रहे हैं, जिनसे खेती से उद्योग जगत में या सेवा क्षेत्र में नौजवानों को लाया जा सके. सेवा क्षेत्र में नौकरियों के लिए विशिष्ट प्रशिक्षण की जरुरत होती है, जबकि औद्योगिक जगत में खासकर मैन्युफेक्चरिंग में अपेक्षाकृत कम पढ़े लिखों को भी रोजगार मुहैया कराया जा सकता है.
मैन्युफेक्चरिंग और मेक इन इंडिया
औद्योगिक विकास के आंकड़ों के अध्ययन से साफ होता है कि मैन्युफेक्चरिंग क्षेत्र यानी क्षेत्र जहां तमाम आइटमों का निर्माण होता है, का विकास 2015-16 में 10.8 प्रतिशत रहा इसके अगले साल 2016-17 में गिरकर 7.9 प्रतिशत हुआ. इसके अगले साल यानी 2017-18 में इसके करीब चार प्रतिशत रहने की संभावना है. चार प्रतिशत विकास होगा मेन्युफेक्चरिंग में तो खेती से लाखों लोगों को उद्योग जगत में खपाना मुश्किल होगा. 
‘मेक इन इंडिया’ यानी भारत में बनाकर बेचने से रोजगार के अवसर बढ़ेंगे. पर जमीन पर ऐसा होता नहीं दिखता. मोबाइल निर्माण का उदाहरण लें. मेक इन इंडिया की यह कहानी ऊपर से बहुत सफल दिख रही है. 2014 में दो थे भारतीय मोबाइल निर्माता, यह अब बढ़कर 123 हो गये हैं. पर ये कर क्या कर रहे हैं. इनमें से अधिकांश चीन से पुर्जे आयात करके नट-बोल्ट कसकर भारतीय मोबाइल बना रहे हैं. मोबाइल के कल-पुरजों का आयात 2014 में 1.4 अरब डालर का था, 2016 में यह बढ़कर 6.8 अरब डालर का हो गया और 2017 में यह बढ़कर 9.2 अरब डालर का हो गया. 2018 में इसके बढ़कर 11.4 अरब डालर होने का अनुमान है. जब तक कल-पुरजे भी भारत में ही नहीं बनने लगेंगे तब तक असल मेक इन इंडिया नहीं होगा. कर पुरजे भारत में बनें, तब ही रोजगार के अवसर बढ़ेंगे. यह समझना मुश्किल है कि जो देश मंगल यान बनाने की तकनीक रखता है, वह देश मोबाइल के कल पुरजों के लिए क्यों आयात पर निर्भर है.

‘मुद्रा’ के बावजूद
बड़े उद्योगों में बड़ा रोजगार नहीं मिलता. छोटे उद्योग बड़ा रोजगार देते हैं. जिस पकौड़े का इधर बहुत मजाक बन रहा है, उस पकौड़े का छोटे से छोटा खोमचा भी कम से कम दो लोगों को रोजगार दे देता है. पर छोटे कारोबारी कि दिक्कत है कि उसके पास वैसे संसाधन नहीं हैं जैसे होने चाहिए. हालांकि सरकार की ‘मुद्रा योजना’ का दावा है कि करीब 10 करोड़ मुद्रा कर्ज छोटे कारोबारियों को दिये हैं.
इसके बावजूद आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि लघु उद्योगों को अपने कारोबार के विस्तार के पर्याप्त पूंजी मिलने में दिक्कतें पेश आ रही हैं. बैंकों द्वारा दिये गये कर्जों के बारे में उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि नवंबर 2017 तक जितना कर्ज दिया गया है, उसमें करीब 83 प्रतिशत बड़े कारोबारों को ही गया है, सिर्फ 17 प्रतिशत छोटे कारोबारियों को गया है. जाहिर बैंक बड़े प्लांट, बड़े ब्रांड को कर्ज देने में सुरक्षित महसूस करते हैं. हालांकि गारंटी वहां भी नहीं है. ‘किंगफिशर’ बहुत बड़ा ब्रांड था विजय माल्या का. विजय माल्या दस हजार करोड़ रुपये लेकर बैंकों के उड़ गये हैं. पर बैकिंग व्यवस्था में छोटे उद्यमों के प्रति सकारात्मक भाव नहीं है. हालांकि आर्थिक सर्वेक्षण का दावा है कि दिसंबर 2017 तक छोटे उद्यमों पर फोकस प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत 10.01 करोड़ लोगों को  कर्ज दिये जा चुके हैं, इनमें से 7.6 करोड़ कर्ज महिलाओं को दिये गये हैं. मुद्रा योजना आंकड़ों के आईने में बहुत कामयाब योजना लग रही है. इसकी जमीनी सचाई क्या है, इस पर शोध होना बाकी है. अगर छोटा बड़ा उद्योग सब मिलाकर चार प्रतिशत की रफ्तार से ही विकास करेगा तो फिर इस मुल्क में रोजगार की समस्या को थामना असंभव है. सेवा क्षेत्र में रोजगार गिने चुने हैं और कम लोगों के लिए हैं. उद्योग जगत ही महत्वपूर्ण आसरा है. यहां कुछ ठोस परिणाम लाने की जरुरत है. 

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