कृषि व किसानों के लिए सेमल का फूल

आवरण कथा , , बृहस्पतिवार , 29-03-2018


Semal flower for agriculture and farmers

राजा राम त्रिपाठी

एक कहावत गांव-गिराव में आम है कि क्या ‘सेमल के फूल’ हो गये हो. दरअसल सेमल के फूल न तो पूजा के काम आता है और ना हि किसी सजाबट के. इसी तरह केंद्र सरकार द्वारा पेश किया गया बजट 2018-19, जिसे ग्रामोन्मुख व खेती-किसान के प्रति समर्पित बजट कहा जा रहा है, वह सेमल का फूल जैसा हो गया है. आंकड़ों की कलाबाजी से ना तो किसानों की आमदनी दो गुनी होनी की उम्मीद दिखती है और ना ही यह भरोसा जगता है कि अब किसानों की आत्महत्याएं कम होने जा रही है. बजट में केवल सब्जबाग दिखाकर लोगों को दिग्भ्रमित करने का काम किया गया है. सरकार के ग्रामीण विकास की वादे तथा दावे खोखले लगते हैं और इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है. 

बजट में कृषि ऋण में 11 लाख करोड़ का इजाफा करने की सरकार मौखिक घोषणा करते हुए वाहवाही लूटने की कोशिश की है, जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि इस घोषणा का लाभ लघु व सीमांत किसानों को मिलने के बजाय बड़े किसानों व कृषि व्यवसाय से संलग्न लोगों को होगा. वैसे भी अतीत की स्थितियां बयां करती है कि ऋण सीमा बढ़ाने से किसानों का भला होने के बजाय इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. किसान कर्ज के मकड़जाल में उलझ जाते हैं और अंततः आत्महत्याओं की संख्या बढ़ जाती है. वहीं जहां किसानों को उनके उपज की लागत का न्यूनतम समर्थन मूल्य का डेढ़ गुना देने की बात कही गई है, तो मजे कि बात यह है कि जो लागत तय करने का सरकारी तंत्र है, वह तंत्र ही भ्रमित है तो जब लागत ही सटीक रूप से तय नहीं हो पाती है तब  न्यूनतम समर्थन मूल्य का डेढ़ गुना देने की बात हवा हवाई ही है और यह उपज की खरीद भी अगले वर्ष से होगी. अर्थात अभी तुरंत किसानों को कोई लाभ नहीं मिलने वाला है. 

दूसरी बात की सरकार ने बजट में 42 फूड पार्क बनाने की घोषणा की है, जबकि बीते वर्ष के बजट में जो 35 फूड पार्क बनाने की घोषणा की गई थी, वह अभी भी आधा-अधूरा ही है. वैसे में यह घोषणा केवल लोकलुभावन ही है. सरकार की गंभीरता का इस बात से भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि लघु व कुटीर उद्योगों के विकास के लिए 200 करोड़ और स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए दो लाख 40 हजार करोड़ रुपये आवंटित की गयी है. उल्लेखनीय है कि देश की 68.84 फीसदी आबादी गांवों में निवास करती है तथा उनकी आजीविका में लघु व कुटीर उद्योगों का काफी महत्व है ऐसे में 200 करोड़ रुपये इस क्षेत्र के लिए नाकाफी तो है ही. ऐसी स्थिति में ग्रामीणों का पलायन होगा और खेती-किसानी पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा. वित्तमंत्री ने खाद्य प्रसंस्करण के लिए 1400 करोड़ रुपये आवंटित की है, जब कि प्रतिवर्ष खाद्य प्रसंस्करण के अभाव में 92 हजार करोड़ रुपये मूल्य के फल और सब्जियां सड़ जाती है और फेंकी जाती है. सिंचाई को लेकर कोई दूरगामी योजना नहीं दिखी. जैविक खेती को बढ़ावा देने की बात की जा रही है लेकिन रसायनिक खाद के मद की कितनी राशि को जैविक खेती के लिए हस्तांतरित किया जाएगा, इस पर स्पष्ट कुछ नहीं कहा गया है. वहीं जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगाया गया है. ऐसे में जैविक खेती को कैसे बढ़ावा मिलेगा. यह एक बड़ा सवाल है. अगर इस सरकार की कृषि और किसानों की प्रति इतनी ही गंभीरता होती तो वह आंकड़ों की शक्ल में हमारे सामने होती, लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि सरकार वित्त वर्ष 2018-19 में कृषि विकास दर 4.1 फीसदी तक होने का दावा कर रही थी लेकिन कृषि विकास दर 2.1 फीसदी ही रहा. स्वास्थ्य बीमा के तहत देश के 10 करोड़ लोगों को लाने का लक्ष्य रखा गया है, इनमें भारी संख्या में लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा की बुनियादी ढांचे की स्थिति बदहाल है ऐसे में यह ग्रामीणों के लिए कम और बीमा कंपनियों की हितों को ज्यादा लाभ पहुंचायेगा. केंद्र सरकार द्वारा पेश किया गया बजट कृषि व किसानों के लिए निराशाजनक ही रहा है,  अगर सरकार इससे संबंधित हितधारकों के साथ विचार विनिमय कर बजट के प्रारूप को अंतिम रूप देती तो निश्चित रूप से परिणाम अलग व सकारात्मक होते. कृषि बजट तैयार करने के पूर्व किसानों से सुझाव लिया जाना चाहिए था. सरकार किसानों के नाम पर उन लोगों के सुझावों को वरियता देती है, जो टीवी के परदे पर बहस करते दिखते है लेकिन वास्तव में जो खेती किसानी में संलग्न है, उनसे उनके दुख-दर्द को सुना जाना चाहिए. बजट में 2400 करोड़ रुपये आवंटित किया गया, जो कि नकाफी है, वहीं जल संरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं की गई है. जब कि भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है. बड़े किसान तो मशीनों का उपयोग कर खेती कर रहे हैं. लेकिन छोटे किसानों को भी मशीनों के उपयोग के लिए कम लागत वाली मशीनें विकसित की जानी चाहिए. सुखा झेल रहे किसानों की भरपायी कर्जे से नहीं की जा सकती, इसके लिए सरकार ने कोई ठोस उपाय नहीं किये है. किसानों को कर्ज के मकड़जाल से निकालने की सरकार की नियत नहीं दिख रही है. बजट केवल चुनावी नफा-नुकसान को देख कर तैयार किया जा रहा है, जबकि दीर्घकालिक योजनाएं बनाये जाने की जरूरत है. अगले 50 वर्षों की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर कृषि नीति बनाने की जरूरत है. किसानों की फसल 

लागत का डेढ़ गुना देने की बात फिलहाल सिर्फ शिगूफा ही दिखता है. किसानों को बजट से कोई फौरी राहत नहीं मिल रही है. कुल मिला कर यह बजट देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में कम तथा वोटरों को लुभाने में अपनी अहम भूमिका निभायेगा. 


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