कैसी आजादी और किससे आजादी

आवरण कथा , , चयन करें , 01-08-2017


Kaisi Azadi Aur kisase azadi

शंभूनाथ शुक्ल

आजादी अब एक विवाद में घिर गई है. कई सारे लोग मानते हैं कि यह महज सत्ता का हस्तांतरण था. ठीक वैसे ही जैसे एक पार्टी की सरकार से सत्ता दूसरी पार्टी को मिल जाए. दक्षिणपंथी मानते हैं कि सत्ता पाने के लिए कांग्रेस ने भारत का विभाजन करवाया तथा मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते हिंदुओं को अपने ही देश में दबकर रहने को मजबूर किया. दूसरी तरफ वामपंथी मानते हैं कि आजादी के बाद सरकार पूंजीपतियों के दबाव में आ गई इसलिए देश को एक सेकुलर और समाजवादी सरकार का ढांचा नहीं मिल पाया. सिर्फ कांग्रेसी ही इस आजादी को आजादी मानते हैं. समाज में भी आजादी के कई पक्ष हैं. दलित कहते हैं कि अंग्रेजों ने उन्हें सवर्णों की गुलामी से मुक्ति दिलाई, मगर वे जल्दी ही चले गए इसलिए हमारी आजादी फीकी ही रही. सवर्णवादी मानते हैं कि आरक्षण देकर आजाद भारत की सरकार ने उनके साथ घात किया. यानी जितनी मुंह उतनी बातें. आजादी का हमारे देश में कोई सही चित्र अभी तक नहीं उभरा. हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में असंतुष्ट है. और एक प्रश्न उठता है कि आजादी मिली तो किससे? नौकरशाही यथावत है, पुलिस वैसे ही जनता का उत्पीड़न करती है. एक सामान्य नागरिक जो टैक्स देता है वह अंग्रेजों की सरकार के समय की तुलना में खुद को कहीं ज्यादा कमजोर महसूस करता है. यही कारण है कि आजादी के विरुद्ध लोग एकजुट होने लगे हैं और उनका कहना है कि 15 अगस्त 1947 मात्र सत्ता हस्तांतरण का दिन है. भारत के आजाद होने का नहीं.

जो लोग आजाद भारत का सही मतलब जानते हैं उन्हें पता है कि अंग्रेज भारत को अपना उपनिवेश बनाए थे. इस उपनिवेश के संसाधनों का पूरा लाभ उठाने के लिए उन्होंने जिन-जिन चीजों की भारत में मान्यता दिलाई वे सब अब अंग्रेजों के हाथ से निकल कर भारतीयों के हाथ में आ गई हैं. इनमें सबसे बड़ी चीज है रेल सेवा जिसने पूरे भारत में एक अनूठी क्रांति की है. रेलवे ही वह उपक्रम है जिसे भारत में लाकर अंग्रेजों ने अपने पांवों पर कुल्हाड़ी चलवा दी. हालांकि यह सच है कि रेलवे ने विलायती माल को भारत के गांव-गांव तक पहुंचाया, पर यह भी सच है कि इसने पूरे देश में एक साथ अंग्रेजों को भारत से भगाने की भावना भी पैदा की. गांधी जी जब दक्षिण अफ्रीका से आए तो पूरे भारत का एक दौरा रेलवे द्वारा ही किया और इस विशाल देश से परिचित हो पाए वर्ना वे एक सामान्य गुजराती की तरह बस गुजराती बनिया ही बने रहते. यह रेलगाड़ी ही थी जिसने गांधी जी का परिचय भारत के किसानों और उनकी गरीबी से कराया. 

इस रेलगाड़ी और उससे जुड़े जनमानस का एक किस्सा सुनाते हुए मैं यह भी बताना चाहूंगा कि किस तरह रेलगाड़ी ने एक सामान्य हिंदुस्तानी की जिंदगी बदल डाली. यह किस्सा तो कहने को है पर घटना का दृश्य सही है. कानपुर में मेरे गांव के पास से एक रेल लाइन गुजरती है जिसे झांसी लाइन कहा जाता है. उस पर झांसी और उसके आगे के दक्षिण की रेलगाड़ियां दिन-रात गुजरती हैं. बचपन में जब भी हम शहर से अपने गांव जाते तो वह रेल लाइन देखते और उस पर गुजरने वाली गाड़ियों को भी जो छुकछुक करती धुआं उड़ाती गुजर जातीं और दूर क्षितिज में उनकी परछायीं भर दिखती रहती. मैं सोचा करता कि एक दिन किसी ट्रेन में बैठकर मैं भी चला जाऊंगा दूर क्षितिज के पास. वर्षों हो गए वह सपना देखे. ट्रेनों ने भारतीयों को एक सपना दिखाया दूर-दूर तक फैले इस विशाल और वृहद देश से जुड़ जाने का. जिस किसी को भी नौकरी नहीं मिलती अथवा बार-बार के सूखे से परेशान होकर वह शहर की राह पकड़ता तो इन्हीं ट्रेनों में बैठकर चला जाता - कोई कलकत्ता, कोई बंबई और कोई-कोई दिल्ली. कभी सोचिए तो पाइएगा कि भारत में भारतीयों के पलायन के पीछे इन ट्रेनों की सम्मोहक शक्ति ने कितना बड़ा काम किया है. औसत भारतीय ट्रेन देखते ही एक ऐसे शहर की कल्पना करता है जहां गम नहीं बस खुशियां ही खुशियां हैं.

यह दक्षिण जाने वाली रेलवे लाइन थी, पर कानपुर शहर में जिस गोविंदनगर मोहल्ले में मेरा घर था वहां से यह रेल लाइन तो गुजरती ही, साथ में उत्तर भारत को पूर्वी भारत से जोड़ने वाली दिल्ली-हावड़ा रेल लाइन गुजरती. वहां एक रेलवे यार्ड था. गोविंदनगर में झांसी और मुंबई तथा दक्षिण से आने वाली ट्रेनें उस ट्रैक पर मिलती थीं जिस पर दिल्ली हावड़ा की ट्रेनें दौड़ा करती थीं. वह एक ऐसा लोको यार्ड था जहां पर गुड्स ट्रेन में माल से भरे डिब्बे जुड़कर रवाना होते थे. तब वहां असंख्य पटरियां थीं और कोयला, पेट्रोल, खाद्यान्न से भरी मालगाडिया खड़ी ही रहती थीं. गोविंदनगर से पटरियों के पार कानपुर शहर जाने वाले लोग पटरियां फांदते और वहां खड़ीं गुड्स ट्रेनों के नीचे से निकल कर गंतव्य तक पहुंचा करते. यह बहुत जोखिम भरा काम था. इसलिए यहां पर पुल बनाने का फैसला किया गया. जब वह पुल बन रहा था तब अक्सर मैं उस पुल के ऊपर जाता और पुल के नीचे से भागती ट्रेनों को देखा करता. वन अप और टू डाउन कालका मेल जब उस पुल के नीचे से गुजरतीं तो सारी ट्रेनें खड़ी हो जाया करतीं मानों उसे सलामी दे रही हों. और देती भी क्यों न भारत का भविष्य लिखने वाली वही पहली ट्रेन थी जिसने व्यापार और उद्योग की शक्ल बदल दी.

कालका मेल वह ट्रेन थी जिसने पंजाब, हरियाणा और मारवाड़ से निकले व्यापारियों को नई पनप रही भारत की राजधानी कलकत्ता में जाकर व्यापार करने को उकसाया. हालांकि यह एक प्रश्न उठता है कि भला कोई ट्रेन कैसे किसी को उकसा सकती है, पर यह भी कटु सत्य है कि पलायन को ट्रेनें बाकायदा उकसाती हैं. वे एक छोर को दूसरे छोर से जोड़ती हैं. 1866 में जब यह ट्रेन शुरू हुई तब ईस्ट इंडिया कंपनी का सारा ध्यान भारत में अपना माल खपाने और यूरोप के उत्पादों के लिए नया बाजार तलाश करने का था. उन्हें भारत में सस्ते मजदूर मिल रहे थे और बिचौलिये व्यापारी भी तथा हर तरह के उद्योगों को विकसित करने के लिए अनुकूल वातावरण भी. भारत का एक बड़ा हिस्सा समुद्र तटीय है और ऊष्ण कटिबंधीय इलाका है जो जूट और कपड़े के लिए मुफीद है. इसके अलावा मैदानी इलाके कृषि के लिए खूब उपजाऊ हैं, फलों की पट्टी है खासकर आम के लिए तो यह क्षेत्र स्वर्ग है. एक तरह से भारत में कृषि उत्पाद और बागवानी की भरपूर संभावनाएं उन्होंने देखीं और नया माल खपाने हेतु बाजार भी. एक तरफ तो खूब धनाढ्य राजे-महाराजे थे और बड़े से बड़े व्यापारी जिनके पास न तो पैसे की कमी थी न उनके शौक कमतर थे. यही कारण रहा कि ईस्ट इंडिया कंपनी के डायरेक्टरों और अफसरों ने एक तरफ तो इन राजा-महाराजाओं और व्यापारियों को यूरोपीय माल खपाने की जिम्मेदारी सौंपी तो दूसरी तरफ मजदूरों को इतनी कम पगार पर रखा कि वे सिवाय पेट भरने के और कुछ सोच ही न पाएं.

अंग्रेजों को व्यापार बढ़ाने के लिए इस कालका मेल ने अपना बड़ा रोल अदा किया. इससे एक तरफ तो मारवाड़ी और खत्री व्यापारी आए तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूर. यही कारण है कि यह पहली ट्रेन थी जिसमें ढेर सारे जनरल कोच और पर्याप्त संख्या में फर्स्ट और सेकंड तथा इंटर व थर्ड क्लास के कोच जोड़े गए ताकि हर एक को इसमें चलने में सुविधा रहे. यह वह ट्रेन थी जिसमें वायसराय सफर करता था और जब भी गर्मी में राजधानी कलकत्ता से शिमला शिफ्ट होती पूरी अंग्रेज सरकार इसी गाड़ी में बैठकर चलती. यही कारण रहा कि यह ट्रेन भारत का भाग्य बदलने में बड़ी अहम रही. तब कलकत्ता में जूट उद्योग पनप रहा था और बंगाल का तटवर्ती इलाका जूट के लिए मुफीद था पर इसके लिए खूब मजदूर चाहिए थे तथा कारखानों को लगाने के लिए खूब जमीन. यह सब बंगाल में मिला इसीलिए पूरे बंगाल में जूट उद्योग पनपा तो उसके साथ ही जूट के दलाल भी. चाय उद्योग पनपा और पूरे देश में उसका बाजार तैयार हुआ. मगर इन उद्योग-धंधों को पनपाने के लिए किसान को दर-बदर कर दिया गया. दरअसल किसान से नकदी में लगान वसूली के चलते बंगाल के किसान कलकत्ता आकर मजदूरी करने लगे और इतने कम पैसों पर कि ईस्ट इंडिया के एक सामान्य किरानी के पास भी दस-दस नौकर हुआ करते थे. कलकत्ता मजदूरों की मंडी बनता चला गया.

जब गोविंदनगर मोहल्ले में रेलवे ब्रिज बना तब मैं अक्सर उसके ऊपर चढ़कर नीचे से गुजरती कालका मेल को देखा करता था. उस समय भी उसमें जो लोग सफर करते थे वे कोई आम यात्री नहीं होते थे. या तो बड़े व्यापारी अथवा अधिकारी या मंत्रीगण. मगर तब तक रेलवे को हवाई सेवाओं ने पस्त कर दिया था. लेकिन रेलवे के जरिये माल ढुलाई सस्ती पड़ती थी. इसलिए व्यापारी चाहते थे कि गुड्स ट्रेनें तो चलें पर पैसेंजर ट्रेनों की आवाजाही कम की जाए. लेकिन आजादी के बाद कोई भी रेलमंत्री यह करने का साहस नहीं कर सका क्योंकि ऐसा करने से उसकी लोकप्रियता शून्य पर आ जाती. यही कारण रहा कि माल की ढुलाई की बजाय पैसेंजर ट्रेनों को वरीयता तो दी गई लेकिन उनके किराये बढ़ाने पर भी जोर नहीं दिया गया. नतीजतन रेल घाटे में आती चली गई और माल ढुलाई मंहगी होती गई. इसका लाभ व्यापारियों को मिला. उन्होंने माल की कमी का रोना रोकर दाम बढ़ाए. यह एक ऐसा व्यतिक्रम था जिसने भारत में रेल सेवा को अपरिहार्य तो बना दिया मगर उसके घाटे से उबरने का कभी कोई प्रयास नहीं किया गया. शायद यही वजह है कि रेलवे में अब पिछले दरवाजे से किराया बढ़ाए जाने की पहल की जा रही है.

मगर रेल का किराया बढ़ जाने का असर उन लोगों पर पड़ेगा जो किसी शहर में जाकर अपने रोजगार को जमाना चाहते हैं, मजदूरी करना चाहते हैं या जो लोग घूमने की ललक रखते हैं. बेहतर होता कि रेलवे जनसाधारण ट्रेनें भी चलाता जिन पर चढ़कर एक गरीब व्यक्ति भी अपनी इच्छा पूरी कर पाता. 

(लेखक सुपरिचित संपादक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं.)


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