सामाजिक न्याय के लिए दलित संघर्ष

आवरण कथा , , बुधवार , 16-08-2017


Dalit conflict for social justice

राम पुनियानी

जुलाई 2017 में गुजरात के मेहसाणा में राष्ट्रीय दलित अधिकार मंच के बैनर तले जुलूस निकाल रहे दलितों को गिरफ्तार कर लिया गया. यह जुलूस उना में दलितों के विरूद्ध पवित्र गाय के मुद्दे पर की गई भयावह हिंसा के एक वर्ष पूरा होने पर निकाला जा रहा था. उना की घटना के बाद से ही, युवा नेता जिग्नेश मेवानी व उनके साथी, दमितों को दलित अत्याचार लाड़ात समिति (दलितों के विरूद्ध अत्याचार से लड़ने के लिए समिति) के झंडे तले लामबंद करने के प्रयास कर रहे हैं. उनका नारा है, ‘‘हमें ज़मीन दे दो, गाय की पूंछ तुम पकड़े रहो’’. उन्होंने पहले मृत मवेशियों को ठिकाने लगाने से इंकार कर दिया था और मृत गायों के शवों का ढेर कलेक्टर के कार्यालय के सामने लगा दिया था. इस आंदोलन के नेताओं का कहना है कि दलितों को गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए ज़मीन चाहिए. 

यह आंदोलन, दमित जातियों के संघर्ष के इतिहास में मील का पत्थर है. इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वाधीनता के बाद से दलितों की स्थिति में सुधार हुआ है. परंतु यह सुधार कछुए की गति से हो रहा है. इस परिवर्तन की राह में कई रोड़े हैं, जिनमें से प्रमुख है दलित नेतृत्व की असफलता. हिन्दू राष्ट्र की पैरोकार सरकार के सत्ता में आने के बाद से, पिछले कुछ वर्षों में दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में वृद्धि हुई है. ऊँची जातियों के लोग आक्रामक हो उठे हैं, जैसा कि सहारनपुर में देखने को मिला. वहां ऊँची जातियों के ठाकुरों ने अंबेडकर की मूर्ति नहीं लगने दी. इसके विरोध में दलितों ने यह धमकी दी कि वे बौद्ध धर्म अपना लेंगे. 

हाथ से मैला साफ करने की प्रथा देश में अब भी जारी है. साफ-सफाई के कार्य में लगे लोगों की हालत बद से बदतर हो गई है. भारत सरकार का स्वच्छता अभियान केवल नेताओं और अधिकारियों के झाडू हाथ में लेकर फोटो खिचवाने तक सीमित रह गया है. साफ-सफाई से जुड़ी समस्याओं के गहराई से अध्ययन और उनका समाधान खोजने के प्रयास नहीं हो रहे हैं. गरीबी, और जाति की संस्कृति, जो समुदाय के एक विशिष्ट हिस्से को साफ-सफाई के काम में लगाए रहना चाहती है, सफाईकर्मियों की बदहाली के लिए ज़िम्मेदार है. वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद से, दलितों की महत्वाकांक्षाओं को कुचलने की प्रवृत्ति तेज़ी से बढ़ी है. आईआईटी मद्रास में पेरियार स्टडी सर्किल पर प्रतिबंध लगाया गया और रोहित वेम्युला की संस्थागत हत्या हुई. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्य इन स्थितियों का मुकाबला करने और दलितों की सामाजिक-आर्थिक हालत को सुधारने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहा है. 

समाज को बांटने और सांप्रदायिक राजनीति को मज़बूत करने के लिए गोहत्या और गोमांस का मुद्दा उछाला जा रहा है. इस अभियान के निशाने पर मुसलमान तो हैं ही, इससे दलितों का एक बड़ा तबका और सभी समुदायों के गरीब किसानों को भी भारी नुकसान हुआ है. उना की घटना तो एक उदाहरण मात्र है. इसने दलितों में व्याप्त असंतोष और क्रोध को सतह पर ला दिया है. रोहित वेम्युला की मृत्यु के बाद यह विरोध सड़कों पर आने लगा. पारंपरिक दलित नेतृत्व के पास इन मुद्दों के लिए समय ही नहीं है. रोहित वेम्युला की आत्महत्या के बाद से दलितों पर अत्याचार के मुद्दे उठाना ‘राष्ट्रविरोधी’ कहा जाने लगा. अब दलितों का एक नया और युवा नेतृत्व सामने आया है, जो दलितों की मुक्ति के अभियान को नए ढंग से चला रहा है. 

अंबेडकर और जोतिराव फुले उस आंदोलन के अगुआ थे, जिसने सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में दलितों की बराबरी का मुद्दा उठाया. भारतीय संविधान ने दलितों को समान दर्जा दिया. आरक्षण की व्यवस्था से उनकी स्थिति में सुधार आया है. परंतु केवल आरक्षण, दलितों के लिए सर्वरोगहर औषधि नहीं है. भारत में सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के उदय ने दलितों को अपने पैरों पर खड़े होने में मदद की. सन 1980 के दशक के बाद से इस प्रक्रिया को कमज़ोर करने के प्रयास हो रहे हैं और इसके लिए पहचान से जुड़े मुद्दे जैसे राममंदिर, पवित्र गाय, घर वापसी, लवजिहाद इत्यादि उठाए जा रहे हैं. मंडल आयोग की रपट को लागू किए जाने को जाति व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा गया और प्रतिक्रिया स्वरूप, राममंदिर आंदोलन को और ज़ोरशोर से चलाया गया. इस तरह के मुद्दों पर मचे शोर ने सामाजिक बदलाव के मूल एजेंडे को हाशिए पर डाल दिया है. 

हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति ने पहचान की राजनीति को बल दिया है. हिन्दू राष्ट्रवादियों ने उदित राज, रामविलास पासवान और रामदास अठावले जैसे नेताओं को अपने साथ ले लिया. इनमें से अधिकांश को केवल कुर्सी से प्यार है. अब आरएसएस द्वारा प्रशिक्षित एक दलित, रामनाथ कोविंद, को भारत का राष्ट्रपति नियुक्त कर दलितों को रिझाने का प्रयास किया जा रहा है. सोशल इंजीनियरिंग के चतुराईपूर्ण उपयोग से दलितों के एक बड़े तबके को दक्षिणपंथी अभियानों का हिस्सा बना लिया गया है. यहां तक कि वे हिन्दू राष्ट्रवादियों की ओर से सड़कों पर खूनखराबा भी करने लगे हैं. दलितों के महानायकों के जीवन और कार्यों को इस तरह से प्रस्तुत करने के प्रयास हो रहे हैं मानो वे दक्षिणपंथी सोच के प्रति सहानुभूति रखते थे. 

सामाजिक स्तर पर सामाजिक समरसता मंच जैसे संगठन, दलितों को अन्य जातियों के साथ जोड़ने का काम कर रहे हैं. यह कहा जा रहा है कि जातिगत ऊँच-नीच मुस्लिम आक्रांताओं के साथ देश में आई. यह कहना अंबेडकर की इस अवधारणा के विपरीत है कि जाति प्रथा की जड़ें हिन्दू धर्मग्रन्थों में हैं और ये धर्मग्रन्थ मुसलमानों के देश में आने से पहले ही नहीं बल्कि इस्लाम के जन्म से भी पहले लिखे गए थे. अंबेडकर के अनुसार दलित राजनीति का अंतिम लक्ष्य जाति का उन्मूलन होना चाहिए. हिन्दुत्ववादी, समरसता के नाम पर जाति के उन्मूलन और समता के लक्ष्य से दलित आंदोलन को भटकाने का प्रयास कर रहे हैं. दलित आंदोलन को उसके मुख्य लक्ष्य - समता और जाति का उन्मूलन - से दूर कर दिया गया है. 

रोहित वेम्युला की मौत और उना की घटना के बाद शुरू हुए आंदोलनों और अभियानों से ऐसी आशा जागी है कि दलित आंदोलन फिर से अपनी पटरी पर वापस आएगा और ये नए आंदोलन और अभियान फुले और अंबेडकर की राह पर चलकर जाति के उन्मूलन के लिए काम करेंगे. दलितों का नया नेतृत्व केवल पहचान से जुड़े मुद्दों और आरक्षण की घिसीपिटी मांग के इर्दगिर्द नहीं घूम रहा है. वे दलितों के लिए भूअधिकार चाहते हैं और वे उन्हें गरिमापूर्ण जीवन देना चाहते हैं. ये मुद्दे लंबे समय से दलित आंदोलन से गायब थे. 

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 


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