बजट का स्त्री पक्ष

आवरण कथा , , बृहस्पतिवार , 29-03-2018


Budget of Woman favor

मोनिका शर्मा

हालिया सालों में महिलाओं की भूमिका घर और बाहर दोनों ही जगह पर महत्वपूर्ण हुई है. आर्थिक विकास में महिला वर्ग की भूमिका की अहमियत भी बढ़ी है. यही वजह है आम बजट से आधी आबादी को भी बड़ी उम्मीदें रहती हैं. लेकिन आगामी वित्त वर्ष के बजट में इस बार महिलाओं के लिए कोई खास घोषणाएं नहीं हुई हैं. हालाँकि ग्रामीण पृष्ठभूमि की गरीब महिलाओं के लिए जरूर सोचा गया है. सरकार ने 8 करोड़ ग्रामीण महिलाओं को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन देने का प्रावधान किया है. बजट में 4 करोड़ गरीब घरों को सौभाग्य योजना से बिजली कनेक्शन देने का भी प्रावधान है. साथ ही महिलाओं की गरिमा को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2018-19 में  गांवों में स्वच्छ भारत मिशन के तहत 1.88 करोड़ नए शौचालय बनाने की बात भी की गई है. वर्ष 2018-19 में ग्रामीण क्षेत्रों में 51 लाख आवास बनाने की भी योजना है जिससे महिलाएं भी लाभान्वित होंगी. हमारे यहाँ औरतें खेती किसानी से भी बड़ी संख्या में जुड़ी हुई हैं. ऐसे में बजट में प्रावधान है कि आर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए ‘महिला स्वयं सहायता समूह’ भी बनाये जायेंगे. साथ ही इस साल के बजट में महिला स्वयं सहायता समूह के लिए ऋण बढ़ाने की भी बात की गई है. सेल्फ हेल्प ग्रुप के लिए ऋण सहायता 2019 तक बढ़ कर 75,000 करोड़ रुपये हो जाएगी. ध्यान देने वाली बात है कि महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए ऋण 2016-17 में बढ़कर लगभग 42,000 करोड़ रुपये हो गया था. पिछले साल की तुलना में इसमें 37 फीसदी का इजाफा हुआ है. गौरतलब यह भी है कि व्यापार शुरू करने के लिए ‘मुद्रा योजना’ के तहत 76 फीसदी कर्ज लेने वाली महिलाएं ही हैं. बजट में ग्रामीण महिलाओं को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, दोनों ही तरह से लाभ दिए जाने की कोशिश की गई है. आज भी गांवों में महिलाएं बड़ी तादाद में खेती के साथ-साथ पशुपालन से भी जुड़ी हुई हैं. बजट में मछली व पशुपालन पर भी  खास जोर दिया गया है. इसके लिए 10 हजार करोड़ रुपये का फंड बनाये जाने का प्रावधान किया गया है. 2018-19 में ‘राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन’ के लिए आवंटन राशि बढ़ाकर 5,750 करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव भी शामिल है. इसके लाभार्थियों में भी महिलाओं की संख्या ज्यादा है. 

महिलाओं  को सशक्त बनाने के लिए उनका आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना आवश्यक है. बजट 2018 में सरकार ने महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ाने और कामकाजी महिलाओं के आंकड़ों में इज़ाफ़ा करने के लिए भी कदम उठाए हैं. पहली बार नौकरी शुरू करने वाली महिलाओं के लिए एक बड़ी घोषणा की गई है. संगठित क्षेत्र में कामकाजी महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए सरकार भविष्यनिधि अधिनियम 1952 में बदलाव करने जा रही है. इस बदलाव से उनके हाथ में आने वाले वेतन में इज़ाफ़ा होगा. बढ़ी आमदनी के चलते महिलायें अब ज्यादा बचत कर पाएंगी. इसके लिए पीएफ में नौकरी के पहले तीन साल के लिए महिला कर्मचारियों का अंशदान वर्तमान 12 फीसदी या 10 फीसदी से घटाकर 8 फीसदी करने की बात कही गई है. जबकि नियोक्ता के अंशदान में कोई बदलाव नहीं होगा. महिलाओं के लिए सुखद कदम यह भी है कि अब मातृत्व अवकाश 12 हफ़्तों से बढ़ाकर 26 हफ्ते कर दिया गया है. साथ ही दफ्तर में बच्चों के लिए क्रेच सुविधा दिए जाने पर भी विचार किया जायेगा. स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करते हुए 1.5 लाख मेडिकल सेंटर खोलने का एलान किया गया है. इसका भी महिलाओं को फायदा तो जरूर मिलेगा. गौरतलब है कि हाल ही में वित्त मंत्री ने संसद में इकोनॉमिक सर्वेक्षण 2018 पेश किया था जिसमें साफ़ संकेत किया दिया गया था कि बजट में ज़ोर निवेश पर रहेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए कई घोषणाएं हो सकती हैं. संभवतः यही वजह है कि शहरी और कामकाजी महिलाओं को लेकर कोई बड़ी योजनायें सामने नहीं आईं हैं. जबकि इस बार इकोनॉमिक सर्वे गुलाबी रंग की फ़ाइल में था जो महिला सशक्तीकरण को समर्पित था. सर्वे में लैंगिक असमानता पर भी चिंता जताई गई थी. इससे यह माना जा रहा था कि इस बार महिलाओं की सुरक्षा और उन्हें अधिकार संपन्न बनाने की दिशा में कोई खास घोषणा की जाएगी.  

गांवों से लेकर शहरों तक आधी दुनिया की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए बजट में कुछ कल्याणकारी योजनाओं और महिला सशक्तीकरण को लेकर सोचा जरूर गया है पर आधी आबादी से जुड़ी कई अहम बातों की अनदेखी भी हुई है. खासकर महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सेनिटेशन के विषय पर और ध्यान दिए जाने की जरूरत थी. यकीनन, शौचालयों के निर्माण, उज्जवला योजना के तहत गरीब महिलाओं के गैस कनेक्शन और मुद्रा योजना के तहत कारोबार के लिए ऋण मुहैया कराना, महिलाओं की बेहतरी के लिए उठाये गए कदम हैं. लेकिन ये पहले से मौजूद योजनाओं में फेरबदल करने जैसा भर लगता है. बजट 2018 से यह उम्मीद की जा रही थी कि महिलाओं की सुरक्षा पर भी सरकार कुछ न कुछ जरूर करेगी. महानगरों से लेकर गांवों तक बढ़ रहे दुष्कर्म और शोषण  के आंकड़ों पर गंभीरता से विचार किया जायेगा. लेकिन इस मामले में यह यूनियन बजट वाकई निराश करता है. हालिया सालों में हमारे यहाँ कामकाजी महिलाओं की संख्या भी तेज़ी से बढ़ी है. देखने में आ रहा है कि कार्यस्थल पर भी महिलाओं के साथ ना केवल दुर्व्यवहार के मामले सामने आ रहे हैं बल्कि घर से दफ्तर तक पहुँचने में भी असुरक्षा का महौल बना हुआ है. ऐसे में सुरक्षित वातावरण के बिना महिला सशक्तीकरण की सारी बातें बेमानी सी लगती हैं. सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर गंभीरता से ना सोचा जाना वाकई देश की आधी आबादी को निराश करने वाला है.  

दरअसल, सरकार के इस आख़िरी पूर्ण बजट को लेकर महिलाओं के पास आशाओं की एक लंबी सूची थी. महिलाओं के लिए सुरक्षा और विकास के साथ-साथ रसोई का खर्च भी मायने रखता है. ऐसे में बढ़ती महंगाई के दौर में महिलाओं को सरकार से दैनिक ज़रूरतों वाली वस्तुओं की कीमत नियंत्रित करने की भी आशा थी. महिलाओं के नजरिये से देखा जाये तो इस बजट में घर गृहस्थी की उपयोगी चीज़ों के मूल्यों पर लगाम लगाने से लेकर सशक्तीकरण तक, प्रभावी कदम उठाए जाने की दरकार भी थी. हाल ही में पीएम मोदी ने भी ‘मन की बात’ कार्यक्रम में महिला सशक्तीकरण और हर क्षेत्र में आधी आबादी की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करने वाली बात कही थी. लेकिन बजट में महिलाओं की कई उम्मीदें अधूरी रह गईं हैं. ‘बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ’ का नारा देने वाली सरकार से बेटियों के लिए उच्च शिक्षा हेतु सहयोग और सुरक्षा के पहलू पर अहम कदम उठाने की वाजिब सी उम्मीद थी. साथ ही महिलाओं की सेहत और स्वच्छता से जुड़े होने के चलते सैनेटरी पैड्स पर से जीएसटी हटाने की भी मांग की जा रही थी. अफ़सोस कि इसे पूरा नहीं किया गया. इस पर ध्यान दिया जाना जरूरी था क्योंकि यह महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा अहम पहलू है. 

यह आज के समय की दरकार है कि रोज़गार, उच्च शिक्षा और कौशल विकास जैसे विषयों पर कुछ इस तरह से सोचा जाये कि इनमें महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जा सके. विशेषकर युवतियों की. क्योंकि हालिया सालों में बेटियों के शिक्षित होने के आंकड़े तो बढ़े हैं पर असुरक्षा, असामनता और दोयम दर्जे से जूझते हुए वे करियर की दौड़ में कहीं पीछे छूट जाती हैं. हर विसंगति से लड़कर शिक्षा पाने वाली आज की स्त्रियाँ खुद के लिए पर्याप्त रोजगार के मौके भी चाहती हैं और सम्मान के साथ काम करने का माहौल भी. क्योंकि अब दोहरी जिम्मेदारी निभाते हुए भी वे खुद को साबित कर रही हैं. सरकारी संस्थानों से लेकर निजी कंपनियों तक, वे ऊंचे ओहदों पर विराजमान हैं और अपनी कार्यकुशलता का परिचय दे रही हैं. इसके लिए बजट में सुरक्षा और रोज़गार से जुड़ी जो महिला योजनाएं हैं उन्हें और बेहतर बनाये जाने पर  विचार होना चाहिए था.  

अफ़सोस कि हमारे यहाँ महिलाओं से जुड़ीं अधिकतर योजनायें सही ढंग से लागू ही नहीं हो पातीं. इतना ही नहीं आधी आबादी की सुरक्षा से जुड़े पहलू को नज़रअंदाज़ करते हुए उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाने की बात बहुत अव्यावहारिक लगती है. अच्छे स्वास्थ्य और भयरहित  परिवेश के बिना आधी आबादी का सशक्तीकरण नहीं किया जा सकता. सुरक्षित माहौल और समान अवसर, आज स्वयं सिद्धा महिलाओं की अहम् मांगें हैं. ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि नए वित्त वर्ष की घोषणाओं में महिलाओं  के हाथ खाली रह गए .


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