बारिश में पक्षी

आवरण कथा , , चयन करें , 14-10-2017


Birds in rain

सुरेश्वर त्रिपाठी

आ दमी तो आदमी, पशु-पक्षियों को भी न तो अधिक गरमी सुहाती है और न ही अत्यधिक सर्दी. पशुओं का अपने आवास पर रहना तो बाध्यता है, पर पक्षियों की ऐसी मजबूरी नहीं है. वे अपने पंखों के सहारे अनुकूल वातावरण में रहने के लिये एक देश से दूसरे देश की हजारों किलोमीटर की यात्रा कर लेते हैं.

पक्षियों को सबसे प्रिय मौसम सर्दी का है बशर्ते पारा शून्य से नीचे जाने वाला न हो. इसी कारण ये पहाड़ी और अति ठंडे इलाकों के बजाय देश के मैदानी इलाकों को बहुत पसन्द करते हैं और ठंड के दिनों में मैदानी इलाकों के हर जल स्रोतों पर प्रवासी पक्षियों की भरमार हो जाती है. ज्योंही तापमान में बढ़ोतरी होती है ये पुनः देश के पर्वतीय क्षेत्रों या विदेशों के अपने आवास पर लौट जाते हैं. 

पक्षियों के लिये गर्मियों के दिन सबसे कठिन होते हैं. वे जिन ताल-तलैयों के पास रहते हैं वहां पर गर्मी की भयानकता के कारण यदि जल स्रोत सूख जाते हैं तो इनका वहां रहना असम्भव हो जाता है. ऐसे में ये किसी बड़े जल स्रोत के पास रहने चले जाते हैं. बारिश के शुरू होते ही यदि ताल-तलैये पानी से लबालब हो जाते हैं तो ये फिर उसके आस पास डेरा डालते हैं. किंतु यदि पानी पर्याप्त मात्रा में नहीं भरता तो ये बारिश के दिनों में लौट कर नहीं आते. पक्षी आदतन बार-बार आना-जाना नहीं चाहते. इसीलिये वे जब आश्वस्त हो जाते हैं कि जल, भोजन और आवास की व्यवस्था लम्बे समय के लिये हो गयी है तभी वे अपने पूर्व आवास पर लौट कर आते हैं.

सर्दियों के समापन और गर्मियों के आगमन के समय देश विदेश के तमाम पक्षी लौटकर कम तापमान वाली जगहों पर चले जाते हैं, किन्तु कुछ पक्षी ऐसे होते हैं जो पानी की उपलब्धता के समय तक यहीं बने रहते हैं. लेकिन जो जमीन के अन्दर रहने वाले कीड़ों मकोड़ों को खाकर अपना पेट भरते हैं, वे गरमियों में भी अधिक समय तक उसी जगह पर बने रहते हैं. कुछ बड़े पक्षी जिनका आहार अन्य छोटे पक्षी या जीव-जन्तु हैं, वे भी मौसम कैसा भी हो एक ही जगह पर बने रहना चाहते हैं जैसे गौरैया, बुलबुल, मैना, तोता, सन बर्ड, राबिन, कबूतर, फाख्ता आदि. बरसात के समय पक्षियों को किसी वृक्ष के आसपास ही रहना अच्छा लगता है. वे डालियों के पास छिपकर पानी से अपना बचाव करते हैं क्योंकि भिंग जाने पर उड़ना आसान नहीं होता. हां, जलपक्षियों के साथ ऐसा नहीं होता. 

कुछ पक्षी ऐसे हैं जो बरसात के ठीक पहले मैदानी इलाकों से पहाड़ी इलाकों में चले जाते हैं और वहीं पर प्रजनन करते हैं. इनके घोसले ऐसी जगहों पर होते हैं जहां बरसात का पानी न पहुंच सके, जहां बड़े पक्षियों या शिकारियों का खतरा न हों और जहां आहार की समुचित व्यवस्था हो. इनके आहार पर यदि ध्यान दें तो पायेंगे कि कुछ पक्षी दाना चुगते हैं जैसे गौरैया, सिल्वरबिल मुनिया, मैना आदि. तोते, हरे कबूतर आदि केवल फल खाते हैं. कबूतर, फाख्ता आदि इधर-उधर से खाने की चीजों को खोजकर खा लेते हैं. कुछ फल और कीड़े दोनों खाते हैं जैसे कोयल, बेबलर, बुलबुल आदि. कुछ दीमकों और पतंगों को खाते हैं जैसे भुजंगा, बी ईटर, फ्लाईकैचर आदि, छोटे पक्षियों और मरे हुए जीव जन्तुओं को खाने वालों में चील, गिद्ध, कौवे आदि बड़े पक्षी हैं, जल स्रोतों की मछलियों आदि पर निर्भर रहने वाले पक्षियों की सूची लम्बी है. तमाम बत्तखें, सारस, बगुले, हंस आदि प्रजाति के पक्षी जल में मिलने वाले भोजन पर ही निर्भर रहते हैं.

बारिश में पक्षियों का रहन-सहन और व्यवहार कुछ बदल सा जाता है. कुछ पक्षियों के व्यवहार से ही यह अन्दाजा लगाया जा सकता है कि बारिश होने वाली है या कितनी बारिश होने वाली है. कोयल के बारे में किसी की पंक्तियाँ हैं - 'अब तो दादुर बोलिहैं, भयो कोकिला मौन’. लेकिन पक्षी-विशेषज्ञों की मानें तो कोयल तब तक कूकती रहती है जब तक शीतकाल आहट नहीं दे देता. सारस क्रेन घोसला जमीन पर तब बनाता है जब मानसून दस्तक देनेवाला होता है. वह घोसला ऐसी जगह बनाता है जिसके चारों तरफ पानी भरा होता हो. यदि इसका घोसला कुछ ऊंचाई पर हुआ तो किसान समझ जाते हैं कि बारिश जोरदार होने वाली है. इसके उलट यदि घोसला नीची जगह पर हुआ तो इसका मतलब होता है कि इस बार बारिश कम होगी. 

वर्षाकाल आते ही बादलों को देखकर मोर अपने पंखों को फैलाकर यह सन्देश देता है कि खुशी मनाओ मेघा बरसने वाले हैं. राम ने भी लक्ष्मण से कहा था - ‘लक्षिमन देखहु मोरगन नाचत वारिद पेखि.’ 

कवियों को चातक प्रिय रहा है. इसके बारे में तमाम किस्से-कहानियां लोग सुनाते हैं. चातक विरहिणी युवतियों को भी प्रिय रहा है. वे इसको अपना दूत बनाकर अपने प्रियतम के पास भेजती रहती हैं. लेकिन यह पक्षी तो स्वयं ही विरह की आग में जलता रहता है, कहा जाता है कि चातक की प्यास केवल स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूंदों से ही बुझती है. इसीलिये चातक किसी भी बादल को देखते ही उससे जल की याचना करने लगता है. चातक के इस स्वभाव पर किसी कवि ने लिखा है - ‘रे रे चातक, सावधानमनसा मित्र क्षणं श्रूयताम्. अंभोदा बहवो बसन्ति गगने सर्वेपि नैतादृशाः. केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां, गर्जन्ति केचिद्वृथा, यं-यं पश्यति तस्य-तस्य पुरतो मा बू्रहि दीनं वचः.’ अर्थात विरहिणियां कहती हैं कि किसी भी बादल को देखकर जल की याचना मत करो, पहले जान लो कि वह बादल स्वाति-घन है या नहीं है. 

पपीहा बादलों को देखकर ‘पी कहां, पी कहां’ की रट लगाता रहता है. मराठी मानुष तो इसके बारे में यही कहते हैं कि यह ‘पाऊस आला, पाऊस आला’ कहकर मानसून के आगमन की सूचना देता है. शायर जोश मलसियानी के शब्दों में- 

जब्तेनवा के सदमें कब तक सहे पपीहा, 

मैकश चहक रहे हैं क्यों चुप रहे पपीहा, 

अब क्यों न दौरे में की रौ में बहे पपीहा, 

बरसा रही है सागर बरसात की घटायें. 

बरसात से ठीक पहले बया को सबसे ज्यादा सक्रीय देखा जाता है. इसको दुनिया के अजूबे इंजीनियर का तमगा भी हासिल है क्योंकि इसका घोसले बनाने का तरीका देखकर लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हैं. इसके घोसले की विशेषता यह है कि इसका प्रवेश द्वार हमेशा नीचे की ओर होता है ताकि बरसात में पानी भीतर प्रवेश न कर सके.

बुंदेलखण्ड में टिटिहरी के बारे में कहते हैं कि यह जितने अण्डे देती है उतने महीने बरसात होती है. कई क्षेत्रों में फसल कटने के बाद किसान इस ताक में रहते हैं कि वे देख सकें कि टिटिहरी ने कितने अण्डे दिये हैं. सारस क्रेन की तरह टिटिहरी भी जब अपने अण्डे किसी ऊंची जगह पर देती है तो इसका मतलब होता है कि बरसात ज्यादा होगी. कहना है कि टिटिहरी के अण्डों का नुकीला भाग नीचे की ओर होना जबरदस्त बरसात को इंगित करता है. 

सुनकर अजीब लग सकता है पर यह सच है कि पक्षी अपने लिये कभी घर नहीं बनाते. जब प्रजनन करना होता है तभी ये घोसला बनाते हैं. बरसात से पक्षियों को उतनी परेशानी नहीं होती जितनी बरसात से पहले होने वाली पानी की कमी की होती है. कई बार देखा गया है कि जब जल स्रोतों के सूखने से पहले ही बरसात होने लगती है तो प्रवासी पक्षियों को छोड़कर सब देर तक अपना आशियाना नहीं छोड़ते हैं. कई बार तो ऐसा भी होता है कि विदेशों से आने वाले पक्षी तो लौटने लगते हैं परन्तु उनमें से कुछ पक्षी यहीं रह जाते हैं. मौसम के अनुकूल अपने को बनाते हुए वे फिर से अगले वर्ष अपने देशवासियों के लौट आने की प्रतीक्षा करते हैं. 


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