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आवरण कथा , kolkata, शुक्रवार , 02-02-2018


 specials of aap became general

श्रीराजेश

जब पहली बार अरविन्द केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता में आई तो उस समय अखबारों की सुर्खियां ‘एके 49’ हुआ करती थी, लेकिन समय बीतने और दिल्ली की सत्ता पर दुबारा प्रचंड बहुमत से काबिज होने के बाद अब ये केवल ‘एके 46’ हो कर रह गये हैं. दरअसल, आम आदमी पार्टी के दिल्ली विधानसभा में सदस्यों की संख्या 67 थी, जिनमें से एक विधायक पंजाब से चुनाव लड़ने के लिए पहले ही इस्तीफा दे चुके थे, इसके बाद दिल्ली विधानसभा में आप के 66 विधायक थे और अब आम आदमी पार्टी के बीस विधायकों को अयोग्य करार दिये जाने के बाद आप विधायकों की संख्या 46 रह गई है. हालांकि चुनाव आयोग की सिफारिश को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाने पर हैरानी नहीं है, क्योंकि वह इस सिफारिश को मानने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य थे. विधायकों को अयोग्य करार दिये जाने को लेकर आम आदमी पार्टी भले ही कुछ भी तर्क-वितर्क करे, लेकिन पार्टी के हालिया रवैये ने यह साफ कर दिया कि यह भी अन्य राजनीतिक दल से कोई जुदा नहीं है, जैसा कि वह अपने बारे में आरंभ से ही नई राजनीति करने का दावा करती रही है. अगर अतीत को स्मरण करें तो 2011 में दिल्ली की सड़कों पर दिखे आक्रोश के गर्भ से निकले कुछ विद्रोहियों की जमात ने वर्तमान राजनीति को नए सिरे से ककहरा सिखाने के जज्बे को लेकर जब एक राजनीतिक दल बना ली और आम लोगों में सपना जगाया कि वह बीते ढाई दशक से रोज मैली होती राजनीति के इस दमघोटू माहौल से बाहर निकाल कर देश को एक नई फीजा में सांस लेने वाली राजनीति देगी. जहां लोककल्याण के सपने पूरे होंगे. लोकतंत्र में वास्तव में लोक होगा, तंत्र मात्र साधन होगा तो इन सपनों को देखने में दिल्ली ने कभी कोई कोताहीं नहीं की. इस सपने ने हकीकत को हल्की अंगड़ाई लेने की अनुमति दी और आक्रोश से जन्मी सियासी दल आम आदमी पार्टी ने बदलती राजनीति और गिरते पारंपरिक राजनीतिक सिद्धांतों के बीच एक नई लकीर खींच कर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करायी, इसी आक्रोश के नायक के रूप में एक चेहरा निखर कर सामने आया - अरविंद केजरीवाल. बीते ढाई दशक में हर नेता एक सरीखा लगने लगा था और हर राजनीतिक पार्टी सत्ता के लिये ही संघर्ष करती नजर आ रही है. विचारधारा गायब होती गई और सत्ता समीकरण लोकतंत्र का आखिरी सच बन गया है. लेकिन दिल्लीवासियों के साथ-साथ देश को तब निराशा हुई जब घुटी-घुटाई राजनीति से खुद को आम आदमी पार्टी स्वयं को अलग नहीं रख पाई. 

20 विधायकों को अयोग्य करार दिये जाने के बाद आम आदमी पार्टी के नेता और समर्थक चुनाव आयोग और राष्ट्रपति पर जिस तरह निशाना साध रहे हैं उससे यही पता चलता है कि नई तरह की राजनीति का दावा करने वाला यह दल भी अन्य राजनीतिक दलों जैसा ही है. आम आदमी पार्टी ने एक साथ 21 विधायकों को जिस तरह संसदीय सचिव बनाया उसकी कहीं कोई आवश्यकता नहीं थी. इतने अधिक विधायकों को संसदीय सचिव इसीलिए बनाया गया, क्योंकि उनकी महत्वाकांक्षा को किसी न किसी रूप में पूरा किया जाना था. यही कारण रहा कि जिस दिल्ली में पहले कभी एक संसदीय सचिव ही हुआ करता था, वहां इतनी बड़ी संख्या में विधायकों को लाभ के पद पर बैठा दिया गया. जब इस पर सवाल उठे तो एक कानून बनाकर उसे पिछली तिथि से प्रभावी बनाने की कोशिश की गई. यह कोशिश और कुछ नहीं, नियम, कानूनों और संविधान की अनदेखी ही थी. भले ही आम आदमी पार्टी के नेता अपने को सही बताने के लिए तरह-तरह के आरोप उछालकर लोगों को गुमराह करने की कोशिश करें, लेकिन इससे यह सच छिपने वाला नहीं कि उसने अन्य राजनीतिक दलों के तौर-तरीकों का कहीं अधिक ढिठाई के साथ अनुसरण किया. इस मामले में आम आदमी पार्टी की ओर से दिए जाने वाले तर्क-कुतर्क ही अधिक हैं. जब उसे अपनी गलती का अहसास करना चाहिए तब वह अपने अलावा अन्य सभी को गलत साबित करने में लगी हुई है. 

आम आदमी पार्टी के रवैये से इसी बात की पुष्टि हो रही है कि उसका राजनीतिक शुचिता से कहीं कोई लेना-देना नहीं. यही कारण है कि राजनीतिक तौर-तरीकों पर उसकी बढ़त थमती हुई दिख रही है. वह जिन मूल्यों-मान्यताओं और मर्यादाओं की बात करके राजनीति में आई थी उनकी गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है. इसके आसार कम ही हैं कि आम आदमी पार्टी को अदालतों से कोई राहत मिल सकेगी. यदि उसे कोई राहत मिल भी जाती है तो भी ऐसा लगता नहीं कि वह अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा भी फिर से हासिल कर सकेगी. आम आदमी पार्टी कुल मिलाकर अन्य दलों सरीखी ही निकली. उसने अपने आचरण से दिल्ली के साथ-साथ शेष देश के लोगों को भी निराश एवं हताश करने का काम किया है. बात केवल बीस विधायकों को अनुचित तरीके से लाभ के पद पर बैठाने के कारण अयोग्य ठहराए जाने की ही नहीं है, बल्कि इसकी भी है कि उसने किस तरह के लोगों को राज्यसभा भेजना उचित समझा. क्या यह विचित्र नहीं कि जिन लोगों की आम आदमी पार्टी को खड़ा करने में कहीं कोई भूमिका नहीं रही वे ही उसके सबसे पसंदीदा नेता बन गए? अच्छा यह होगा कि आम आदमी पार्टी अपने राजनीतिक सफर एवं तौर-तरीकों पर ध्यान दे. यदि वह ऐसा करेगी तो यही पाएगी कि वह उस रास्ते पर चल निकली जो उससे अपेक्षित नहीं था.

हाल के कुछ महीनों में आम आदमी पार्टी द्वारा किये गये कार्यों का नकारात्मक प्रभाव ही पड़ा है. यह भी एक दिलचस्प तथ्य है कि पार्टी अपने स्थापना के समय से ही विभिन्न प्रकार के अंदरुनी और बाह्य विवादों से जूझती रही है. आरंभ में तो इन विवादों को अरविन्द केजरीवाल से जनता की सहानुभूति हासिल कर कैश करने की कोशिश की गई लेकिन बाद में यह कृत्य भी सरेआम हो गया. अब राजनीतिक में शुचिता और पवित्रता की बात करने वाली आम आदमी पार्टी भी अन्य राजनीतिक पार्टियों से होड़ लेने में लग गई है. 


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