शास्त्रीय गायन में पहचाना नाम सुनंदा शर्मा

व्यक्तित्व , , शुक्रवार , 01-09-2017


Sunanda Sharma The re-known name in classical singing

राजेन्‍द्र शर्मा

पूरी दुनिया में हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की खुशबू बिखेरने वाली सुनंदा शर्मा की साधना एक कहानी जैसी है. हिमाचल प्रदेश के कांगडा जिले के गांव डाह में जन्मे पिता सुदर्शन शर्मा अपने माता-पिता से उस दौर के बड़े-बड़े संगीतज्ञ के किस्‍से-कहानी सुनते-सुनते कब वायलिन बजाने में पारंगत हो गये पता ही न चला. पत्‍नी सुदेश शर्मा भी मिलीं तो संगीत की बेहद कद्रदान. शर्मा दम्पती के संगीत प्रेम को देखकर ही शायद मॉ शारदा प्रसन्न हुई और उनका ही आशीष सुनंदा शर्मा के रुप में प्रतिफलित हुआ.

पिता के वायलिन से निकलते सुरों ने सुनंदा को रिझाया. पांचवीं कक्षा में पहली बार संगीत का आस्वाद जुबां पर महसूस करने के बाद से ही पिता के साथ वे जगह-जगह स्टेज पर प्रस्तुतियां देने लगीं. स्कूल का होमवर्क पूरा करने के बाद जैसे ही फुरसत मिलती, वे पिता के पास बैठकर संगीत सीखतीं. सुदर्शन शर्मा पिता से ज्यादा गुरु होते गये. सुनंदा बताती हैं कि यद्यपि मेरे पहले गुरु पिता ही हैं, परन्तु मुझे गढ़ने में माँ की भूमिका भी अहम रही. सर्दी हो,गर्मी हो या बरसात, मॉ सुबह पांच बजे जगा देतीं और कहतीं कि चलो रियाज करो. इंटर करने के बाद सुनंदा ने संगीत को बेहतर ढंग से साधने की प्रक्रिया में संगीत से स्नातक किया. उसके बाद 1990 में पंजाब विश्वविद्यालय से संगीत में स्नातकोत्तर के लिए दाखिला लिया.

अपने गायन के लिये पंजाब विश्वविद्यालय का गोल्ड मैडल जीता, जिसकी चमक ने सुनंदा के सपनों में पंख लगा दिये. पंजाब विश्वविद्यालय ने उन्हें जालंधर में प्रतिवर्ष होने वाले बाबा हरिवल्लभ संगीत सम्मेलन में प्रतिनिधित्व के लिए भेजा. पिता सुदर्शन शर्मा के साथ बाबा हरिबल्लभ संगीत सम्मेलन के लिए जालंधर जा रही सुंनदा की उनींदी ऑखों में बस एक ही सपना चहक रहा था कि वह राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गायें. परन्तु यह सब बिना योग्य गुरु के संभव ही नहीं था. सुनंदा रास्ते भर माँ सरस्वती को स्मरण करती रही कि उसे तराशने के लिये कोई गुरु मिल जायें. संयोग से हरिबल्लभ संगीत सम्मेलन में शास्त्रीय संगीत की साम्राज्ञी गिरिजा देवी भी आयी थीं. सुनंदा का गायन सुन गिरिजा जी आहलादित हो उठीं और मंच से ही घोषणा कर दीं कि वे सुनंदा को बनारस ले जा रही हैं. यह सुन कर पिता सुदर्शन शर्मा की आँखें नम हो गयीं.

इस तरह 1991 में सुनंदा बनारस आ गयीं गुरु मॉ गिरिजा देवी के यहां, जिनको वह आदर से ‘अप्पा जी’ पुकारती हैं. बनारस घराने में शामिल होने का अर्थ यह नहीं कि बस आप जलेबी-दही-कचौड़ी खायें और घराने के हो जाएं. बनारस घराने का पहला कायदा है कि बनारसमय हो जाना. बनारसी खान-पान,बनारसी भाषा, बनारसी विरासत - इन सब से मात्र रूबरू होना ही काफी नहीं, इन्हें साधना होता है जीवन में. पंजाब घराने की सुनंदा के लिए यह काम मुश्किल तो था परन्तु उन्होंने बनारस को अपने भीतर उतारते हुए नौ वर्षों तक अप्पा जी के चरणों में बैठकर रियाज किया और जब पहली बार तानसेन सुर सम्मेलन में गायन का अवसर मिला तो उसके बाद तो सुनंदा के गायन की सुगन्धि फैलती चली गयी. आज सुनंदा राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पर प्रतिष्ठित शास्त्रीय गायिका के रूप में शुमार की जाती हैं. वे नेहरु सेंटर कंसर्ट (मुंबई), पंचम निषाद (मुंबई), गंगा महोत्सव (वाराणसी), प्रयाग संगीत समिति (इलाहाबाद), सप्तक फेस्टीवल (अहमदाबाद), श्रुति मंडल कंसर्ट (जयपुर), वर्ल्ड पीस कंसर्ट (दिल्ली), संगीत नाटक अकादमी कं‍सर्ट, बाबा हरिबल्लभ संगीत सम्मेलन (जालं‍धर), तानसेन संगीत सम्मेलन (ग्वालियर), चंडीगढ़ संगीत सम्मेलन एवं प्राचीन कला केन्द्र कं‍सर्ट जैसे संगीत समारोहों में जाने-माने संगीतज्ञों के साथ जुगलबंदी करने जा चुकी हैं और विदेश के बहुत सारे छात्र उनसे शास्त्रीय संगीत की तालीम ले रहे हैं. विदेश में भी सुनंदा शर्मा कई संगीत समारोहों में अपने गायन का जलवा बिखेर चुकी हैं. रायल एकादमी आफ म्यूजिक लंदन में वह तेरह वर्षों से निरं‍तर गा रही हैं. वे लंदन की एक यूनिवर्सिटी में विजिटिंग टीचर भी हैं जहां वह विदेशी, खास कर इतालवी छात्रों को हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तालीम देती हैं .

अप्पा जी की शागिर्दी में सुनंदा ऐसी रमी कि बनारस जैसे उनका मायका हो गया. वे कहती हैं कि ‘उमंग, उल्लास, रिश्तों की मिठास अगर कहीं है तो वह काशी में है.' नोएडा में रह रही सुनंदा मानती हैं कि वे “मुंबई में रहे या नोएडा में, काशी उनका घर है, बनारस जाने का बस एक बहाना चाहिए और यह बहाना मिल जाये तो मैं दौड़ी चली जाती हूँ.’’ 

ख्यात गायिका गिरिजा देवी बताती हैं कि उनके गुरु सरयू प्रसाद मिश्र ने दीक्षा के समय गंगाजल हाथ में लेकर सौगं‍ध दिलायी थी कि वह अपना ज्ञान उसे ही देंगी जो पात्र होगा. अपने गुरु के पौत्र राहुल मिश्र व रोहित मिश्र की गुरु माँ गिरिजा देवी कहती हैं कि सारा जीवन संगीत को ही ओढ़ा-बिछाया, सीखा-सुना, गुना-गाया फिर उसे ऐरे-गैरे को क्यों दूँ. सुनंदा भाग्यशाली थीं कि उन्हें गुरु माँ के रुप में वे मिलीं. बनारस घराना मिला. सुनंदा ने नौ बरसों तक अप्पा जी की कठोर दीक्षा में और उसके बाद अनवरत रुप से की गयी साधना के बल पर वह मुकाम हासिल किया है जो कम लोगों को हासिल होता है. सौभाग्य से सुनंदा जैसी शिष्या ने बनारस घराने की गायकी को और समृद्ध कर अप्पा का मान बढ़ाया है.

गिरिजा देवी की शिष्याओं में से सुनंदा अकेली ऐसी शिष्या हैं जिसने चार पटों की गायिकी की तालीम पायी है और उनकी तरह वह ख्याल, दादरा, ठुमरी, टप्पा, कजरी, छोटी, चैती, भजन सब गाती हैं. सुनंदा के चार कैसेट स्वर संचय, धरोहर, पंजाबी वैडिग सांग और हरी आ चुके हैं. जल्दी ही उनका पाचवां नया कैसेट सुर गंगा टाईम्स म्यूजिक से आने वाला है, जिसमें सुनंदा शर्मा ने ख्याल, दादरा, ठुमरी, टप्पा, कजरी, छोटी, चैती, भजन सब गाए हैं.

सुनंदा के जादुई गायन का ही प्रभाव है कि नार्वे निवासी जयशंकर, जो डाक्टर और तबला वादक दोनों हैं, उनकी गायकी से आकृष्ट हुए. जयशंकर को लगा कि जिस तरह के जीवन साथी की उन्हें तलाश है वह सुनंदा ही हैं. दोनों में सहमति भी बनी पर सुनंदा ने नार्वे में बसने से मना कर दिया तो लगा कि बात यहीं पर खत्म; पर जयशंकर ने सुनंदा से कहा कि कोई बात नहीं, तुम नार्वे मत बसो, मैं ही भारत आ जाया करूंगा. उनके इस उत्तर ने सुनंदा को अभिभूत कर दिया. इस सुखद दाम्पत्य की परिणति जयशंकर-सुनंदा के घर आयी नन्ही बिटिया है, जिसका नाम सुनंदा ने अपने प्रिय राग केदार को ध्यान में रखकर केदारा रखा है. पति जयशंकर की पसंदीदा जैज म्यूजिक के साथ सुनंदा जिस तरह तालमेल बिठा लेती हैं, डॉ जयशंकर गृहस्थी में उनका हाथ वैसी ही कुशलता से बँटाते हैं. 


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Sharad :: - 08-13-2018
You are established at your well deserved level, can you help to a singer which have been gifted by the God but in different profession so doesn't know about opportunities to become a predominant play back singer. I assure you