ग्‍वालियर के पंडित घराने की पहली गायिका मीता पंडित

व्यक्तित्व , , सोमवार , 02-10-2017


Mita Pandit the first women singer of Gwalior Pandit Gharana

राजेन्‍द्र शर्मा

पद्म भूषण कृष्णराव शंकर पंडित की पौत्री व पंडित लक्ष्मण राव कृष्णराव की पुत्री डा. मीता पंडित को संगीत विरासत में मिला. 3-4 साल की मीता अपनी मां आभा पंडित के आंचल में छिपकर शास्त्रीय संगीत की तानें और तराने सुनती और आह्लादित हो उठती. संगीत ने उनके दिलो-दिमाग़ में कब घर कर लिया, इसका अहसास उन्हें खुद भी नहीं. बचपन से ही गायिकी की ख्वाहिश से सराबोर मीता को किसी और क्षेत्र ने कभी नहीं लुभाया. वह खुद मानती है कि उन्हें गायक ही बनना था. अपने दादा जी व पिता जी से संगीत की बरीकियों का ज्ञान लेकर 1985 में भोपाल के भारत भवन में मीता ने मात्र 9 वर्ष की अवस्था में अपनी पहली प्रस्तुति दी. रही बात संगीत के अलावा कुछ और करने की तो उन्होंनें अपनी पढ़ाई लेडी श्री राम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से पूरी की परन्तु विरासत में मिली सं्‍पदा का यह असर था कि गणित की क्लास में उनके दिमाग में राग हमीर घूमता था. 27 साल की अवस्था में ही भारतीय शास्त्रीय संगीत में मीता ने डॉक्टरेट की. 

मीता ख्याल गायकी के जिस ग्वालियर घराने की पहली महिला गायिका है उसकी एक समृद्ध एवं गौरवशाली परंपरा रही है. उनके परदादा शंकर पंडित ग्वालियर घराने के संस्थापक हद्दू खां-हस्सू खां के शिष्य और अपने समय के शीर्षस्थ गायक थे. दादा कृष्णराव पंडित की गिनती बीसवीं शताब्दी के दिग्गज गायकों में होती है और पिता लक्ष्मण पंडित भी ग्वालियर घराने की पंडित परंपरा के सुविख्यात प्रतिनिधि हैं. ग्वालियर घराना अपनी बेज़ोड़, बेमिसाल और अद्भुत गायन शैली के लिये मशहूर है. गायन में यह घराना अन्य घरानों की जननी माना जाता है. यहीं से ध्रुपद शैली आई. राजा मानसिंह तोमर जो कि ध्रुपद गायन शैली के पितामह माने जाते हैं, ग्वालियर घराने से ही थे. इसी घराने से प्रेरित होकर ही सारे गायन की बंदिशें बनी हैं. राग की शुद्धता, टप्पा, तानों के प्रकार प्रचुर मात्रा में इसी घराने में देखने को मिलते हैं. ग्वालियर में बंदिशों का ख़जाना है. अलग-अलग तालों का मिलन तिलवाड़ा, आड़ा, चौताला, एकताल, तीनताल की अपनी एक अलग पहचान है. 

अपने पुरखों के इस विरासत को बनाये रखने, बचाये रखने की जिम्मेदारी मीता पंडित के भाई तरुण पंडित की थी परन्तु 1994 में एक दुर्घटना में तरुण पंडित की आकस्मिक मृत्यु से उपजी रिक्तता को भरने की जिम्मेदारी मीता पंडित पर आन पडी. मीता ने इस जिम्मेदारी को अपनी गहन साधना से बखूबी अंजाम दिया, साथ ही अपने स्वर्गीय भाई के स्वप्न को भी पूरा किया. गौरतलब है कि जिस समय तरुण पंडित की दुर्घटना में मृत्यु हुई, उस समय वह ग्वालियर घराने का हिन्दुस्तान संगीत में योगदान विषय पर पी एच डी कर रहे थे. मीता ने संगीत की गहन साधना के साथ उक्त विषय पर ही डाक्टरेट कर एक तरह से अपने भाई को श्रदाजंली दी. आज मीता पंडित को ग्वालियर घराने की ख्याल गायिकी की पंडिताईन कहा जाता है .

ख्याल गायिकी की अपनी तालिम के बारे में मीता बताती है कि एक पिता के रुप में लक्ष्मण पंडित बहुत स्नेहशील पिता रहे परन्तु गुरु के रुप में  बहुत सख्त गुरु. किसी भी स्थिति में रियाज न करने की कोई छूट नहीं थी. यहां तक कि गर्मी की छुटि्टयों में अगर घूमने जा रहे हों तो तानपुरा साथ ही जाता था.  कॉलेज में और उसके पहले जब मैं सेंट मेरी स्कूल में पढ़ती थी, मैं किसी से भी अपने घर के अनुभव के बारे में बात नहीं कर सकती थी. घर में स्कूल के अनुभवों के बारे में कोई बात नहीं होती थी, सिर्फ संगीत ही संगीत. लेकिन अब लगता है कि यदि ऐसा न होता तो मैं ठीक से न सीख पाती .

‘द गोल्डन वॉइस ऑफ इंडिया’, ‘सुर मणि’, ‘युवा ओजस्विनी’, ‘युवा रत्न’ और ‘उस्ताद बिस्मिलाह खां अवार्ड’ जैसे कई पुस्कारों से नवाजी जा चुकी मीता ने ‘वर्ल्ड स्पेस रेडियो’ पर ‘स्वर श्रृंगार’ नामक संगीत कार्यक्रम की प्रस्तुति भी की है. 2015 में मीता को ‘सामापा अवार्ड’ में ‘सोपोरी एकेडमी ऑफ म्यूज़िक एंड पर्फार्मिंग आर्ट्स’ द्वारा ‘युवा रत्न सम्मान’ भी हासिल हुआ है. ‘फुटस्टेप्स’, ‘यंग मास्ट्रोज़’ ‘अर्पण’ और ‘तानसेन’ जैसे कई एलबम्स के ज़रिए मीता को काफी ख्याति मिली है. शास्त्रीय संगीत के अलावा अन्य देशों की संस्कृतियों को जानने का शौक रखने वाली मीता को यात्रा करना बेहद पसंद है. दूसरे देशों के संगीत को जानना और सुनना भी उन्हें बहुत अच्छा लगता है. वह इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में सलाहकार भी हैं. 

मीता पंडित मानती है कि साधना कला की आत्मा है, संगीत के लिए दुनिया में कोई भी सीमा नहीं है. इसीलिए संगीत के माध्यम से दुनिया को एक सूत्र में बांधना सबसे आसान है.  

मीता घंटों रियाज करती है. एक कलाकार को अपनी कला जिंदा रखने के लिये कठोर साधना करनी ही पड़ती है. ख्याल और टप्पा गायन शैली को सबसे पसंदीदा बताने वाली मीता पंडित को भजन, ठुमरी और ग़ज़ल गायन भी लुभाता है. बचपन में अंग्रेजी गानों का शौक रखने वाली मीता की आवाज़ ने देश ही नहीं विदेशी श्रोताओं पर भी जादू किया है.

बचपन से ही स्टेज शो करने वाली मीता एक दिलचस्प वाकया बताती है. एक स्टेज शो के लिये वह अपनी मां के साथ  पहुंची तो आयोजकों की ओर से जो हमें लेने आए थे, उन्होंने सारे हार मेरी मां के गले में डाल दिए. लेकिन जब कार्यक्रम के समय मैं तैयार होकर मंच पर पहुंची, तो उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ. उन्होंने बाद में माफी भी मांगी और कहा कि उन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि जिस गायिका का इतना नाम हो रहा है वह उम्र में इतनी छोटी है. मीता पंडित कहती हैं कि उस दौर में लोग उन्हें ऐसे कपड़े पहनने की सलाह दिया करते जिसमें वह बड़ी और शास्त्रीय संगीत गायिका की तरह दिख सकें परन्तु वे यह सलाह नहीं मानीं. उन्होंनें लोंगों की इस अवधारणा को तोड़कर शास्त्रीय संगीत को युवा 

वर्ग तक पहुंचाने का प्रयास किया. मीता साफ कहती है कि मैं लोगों तक संगीत द्वारा पहुंचना चाहती हूं न कि अपने पहनावे के द्वारा.


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