खो गयी सुरों को गुँजाने वाली देह

व्यक्तित्व , , सोमवार , 13-11-2017


Lost souls Echoing body

राजेन्‍द्र शर्मा

गिरिजा देवी इस साल भी दशहरा के अवसर पर बनारस आयीं. लेकिन लौटते वक्त अपने शिष्यों-शिष्याओं और पड़ोसियों से अनायास ही कह गयीं कि ‘अब हम काशी में ही रहेंगे. पन्द्रह दिन के अंदर वापिस आ रहे हैं हमेशा के लिए.’ और इस कथ्य के ठीक पन्द्रहवें दिन वापिस लौटीं, परन्तु अपनी अवचेतन देह के साथ हमेशा के लिए काशी में समा जाने के लिए, 

8 मई 1929 को वाराणसी के निकट सकलडीहा में जमींदार रामदेव राय के घर जन्मी और 24 अक्तूबर 2017 को देह त्यागने वाली गिरिजा काशी की शास्त्रीय परंपरा में रसूलनबाई, बड़ी मोतीबाई, सिद्धेश्वरी देवी के बाद वृत्त दीप-पुंज थीं. उनके प्रभुधाम प्रस्थान से ठुमरी और दादर के साथ चैता और टप्पा में गुल, बैत, नक़्श, रुबाई, धरू, कौल कलवाना और राग रागिनियों की अनगिनत मोतियों की माला बिखर गयी. गिरिजा के प्रोफाइल में पद्मश्री (1972), पद्मभूषण(1989), पद्मविभूषण(2016), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1977), संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप(2010) के अलावा अनगिनत पुरस्कार/सम्मान सम्मिलित है, हालांकि बकौल लता मंगेशकर वह भारत-रत्न थीं. 

धान की बेशुमार खेती के चलते आर्थिक रुप से सम्पन्न सकलडीहा के जमींदार राय परिवार दो बेटियों के बाद बेटे की चाहत रखता था. परन्तु तीसरी बेटी के आने पर पिता रामदेव राय ने इसका दिल खोलकर स्वागत किया और सौरी कराने आयी नाऊन को नेग देकर कहा कि ‘जाओ, गांव भर को बता आओ कि धान के कटोरे में सरस्वती आयी है.’ शौकिया तौर पर पेटी (हारमोनियम) बजाने वाले रामदेव ने तीसरी बेटी का नाम ‘गिरिजा’ रखा. दो साल की गिरजा का पेटी देखते ही मचल जाना उनको आह्लादित करता था. जब गिरिजा पांच बरस की हुई तो उन्होंने अपनी बेटी को संगीत की विधिवत तालीम दिलवाना तय किया और इसके लिए बनारस के कबीरचौरा आ गये. उस समय बनारस में पंडित सरयू प्रसाद मिश्र का बड़ा नाम था. उन्होंने पंडित जी से अपनी बेटी को गवैया बना देने का आग्रह किया. पंडित सरयू प्रसाद मिश्र, पंडित श्रीचंद की गंडा-बंध शिष्या गिरिजा ने उस दिन से जो रियाज प्रारम्भ किया, वह जीवन भर अनवरत चलता रहा. गिरजा की इस यात्रा में उनकी आवाज का जादू देश-विदेश तक फैलता गया और वे गिरजा से 'अप्पा जी' हो गयीं. 

गिरिजा से 'अप्पा जी' हो जाने का यह सफर इतना आसान नहीं है, यह गिरिजा की गहन साधना के साथ पिता रामदेव राय और पति मधुसूदन जैन की प्रतिबद्धता की अद्भुत कहानी है जिन्होंने घर-परिवार के विरोध को दरकिनार करते हुए गिरिजा का हर क़दम भरपूर साथ दिया. उस दौर में लड़कियों का संगीत सीखना अच्छा नहीं माना जाता था. तब पिता रामदेव राय ने घर-परिवार और समाज की तमाम लानत झेलते हुए बेटी को प्रोत्साहित कर संगीत की तालीम दिलवाई. गिरिजा की दादी तक को उनका गाना-बजाना नहीं सुहाता था. इस बीच बनारस में घड़ियों की खरीद-फरोख्त के व्यवसायी और संगीत प्रेमी मधुसूदन जैन की गिरिजा से नजदीकियां बढ़ती गयीं और महज सत्रह साल की उम्र गिरिजा दाम्पत्य-जीवन में बंध गयी. विवाह के बाद टिपिकल जैन परिवार में सास ने हिदायत दी कि गाना-बजाना घर में ङी ठीक है, बाहर नहीं. मधुसूदन माँ की हिदायतों के चलते गिरिजा का टूटना-बिखरना सहन नहीं कर पाये. उन्होंने गिरिजा को इस वादे के साथ प्रोत्साहित किया कि वे राज-दरबारों में कभी नहीं गायेंगी. सारनाथ में एक छोटा-सा घर लिया गया. इस बीच गिरिजा का घर-आंगन उनकी बेटी सुधा (मुन्नी दीदी) की किलकारियों से चहका. बेटी को अपनी मां के पास छोड़ गिरिजा संगीत साधना में दुबारा जुटीं. छोटे-मोटे आयोजनों से लेकर रेडियो तक के कार्यक्रमों में उनकी आवाज का जादू बिखरने लगा और अन्ततः अपनी गहन साधना के दम पर गिरजा 'अप्पा जी' हो गयीं. 

1975 में पति मधुसूदन जैन का निधन गिरिजा के जीवन का ऐसा वज्रपात रहा कि वह लगभग टूट गयीं. जीवन में अकेलेपन के इस दौर में गिरिजा को संगीत से भी विरक्ति हो गई. अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा है कि मैंने अपने जीवन के सबसे दर्दनाक क्षणों में से एक का सामना किया, मैंने अपना पति खो दिया. उस समय तक मुझे अपने दम पर जीवन का प्रबंधन कभी नहीं करना पड़ता था. यहां तक कि साधारण चीजें, जैसे बिलों का भुगतान मेरी जिम्मेदारी नहीं थी. अचानक यह जिम्मेदारियां मेरी थीं, मैंने प्रदर्शन रोक दिया. साल बीत गए, लेकिन मेरे दोस्तों और प्रशंसकों को मेरा इस तरह से पीड़ित होना नहीं देखा गया. उन्होंने मुझे प्रदर्शन करने को किसी तरह आश्वस्त किया. तब मंच पर वापस आई और फिर मैंने गायन में कविता व गीतों के महत्व को समझने के लिए खुद को समर्पित किया. रस, भावना की अभिव्यक्ति, मेरी रचनाओं का प्राथमिक ध्यान बन गया. मैंने प्यार के विभिन्न रूपों को अपने कठिन परिश्रम से गायिकी के रूप में प्रस्तुत किया. कृष्ण की कहानियों पर आधारित मेरी ठुमरी मेरे अभ्यास का केंद्र बिंदु बन गया. मैंने ठुमरी गायन के पूरे रंग को बदलने का फैसला किया. ठुमरी को एक माध्यम के रूप में सोचा था, जिससे मैं खुद को अभिव्यक्त कर सकती हूं. प्रेम, लालसा और भक्ति की भावनाएं ठुमरी का एक अभिन्न हिस्सा हैं और मैंने सोचा कि सही प्रकार के संगीत के साथ, मैं गीत को जीवित कर सकती हूं. यह संभव है कि गानों को एक भौतिक रूप दिया जाए.

बाद में अपने शुभचिंतकों के सलाह पर कलकत्ता में संगीत नाट्य अकादमी में सक्रिय रही. अपने जीवन के उत्तरार्घ के 39 वर्षों का अधिकांश समय भले ही गिरिजा ने कलकत्ता में गुजारा, परन्तु मन से वह खांटी काशीमय बनी रहीं. खुद में समग्र बनारस ही तो थीं वह. गिरिजा के खुद में समग्र बनारस होने का इससे अधिक सम्मान और क्या हो सकता है कि अयोध्या में विमला देवी फाउंडेशन द्वारा उनके 75वें जन्मदिन पर आयोजित समारोह में उनके हमउम्र नामवर सिंह ने भावुक होकर उनके चरण छू लिये थे.

पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने गिरीजा देवी की मुलाकात ख्यात लेखक यतीन्द्र मिश्र से 1998 में कराई थी. उस मुलाकात में ही गिरिजा ने पुत्र के रुप में यतीन्द्र को पा लिया था. यतीन्द्र मिश्र की फेसबुक वाल पर की तस्वीर बयाँ करती है कि वे यतीन्द्र के साथ होती थीं तो कितना खुश होती थीं. इन पंक्तियों के लेखक से 1 सितम्बर  2017 को उनकी शिष्या सुनंदा शर्मा के निवास पर हुई मुलाकात में उन्होंने अपनी इच्छा व्यक्त की थी कि मैं मोहित (यतीन्द्र मिश्र) का विवाह देखना चाहती हूँ. यतीन्द्र भी स्वीकारते हैं कि गिरिजा देवी से मिला स्नेह उनके जीवन की थाती है. अप्पा के प्रभुधाम प्रस्थान के तुरन्त बाद वह लिखते हैं कि 'आपकी डोलिया कौन उठा पायेगा अप्पा जी? चारों कहार मिलकर उठाएं भी, तो भी ठुमरी, दादरा, कजरी और चैती को कौन उठा पायेगा? किसमें सामर्थ्य कि मणिकर्णिका से कह सकें,थोड़ा कम बहा कर ले जाना. थोड़ा सा छोड़ देना हमारी गिरिजा मां को. शायद अग्नि और जल मिलकर थोड़ा छोड़ दें अपनी लीक पर ज्योति की मानिंद ठुमरी के सनातन प्रवाह को.....'

देह रुप में गिरिजा देवी चली गयीं, परन्तु जब तक सृष्टि है, तब तक सुर रहेंगे और जब तक सुर है, गिरिजा रहेंगी सुरों की दुनिया में. गिरिजा ने शास्त्रीय संगीत का घर-आंगन सूना नहीं छोड़ा है. जीवन भर साधनारत रहीं गिरिजा पांच सौ से अधिक गंडा-बंध शिष्य/शिष्याये छोड़ गयी हैं, जो देश-विदेश में गिरिजा की शान को बढ़ा रहे हैं और बढ़ाते रहेंगे. उनकी गंडा बंध शिष्या पद्मश्री मालिनी अवस्थी बताती है कि वह गजब की पारखी थीं. भातखंडे में अंतिम वर्ष में मालिनी अवस्थी का नटबिहाग सुन कर ही उन्होंने इच्छा व्यक्त की थी वे उन्हें कलकत्ता ले जाना चाहेंगी, उन दिनों मालिनी का विवाह तय हो चुका था, तब यह अवसर नहीं मिल सका. परन्तु यह ईश्वर की कृपा ही रही कि मालिनी को उनकी शिष्या बनने का अवसर 1998 में मिला. उन्नीस बरस से अपने संबंधों को बयाँ करती मालिनी बताती है कि यह उनका व्यक्तित्व ही था कि गुरु कब मां में बदल गई, मैं जान ही न सकी. जाना तो केवल इतना कि उनकी गोद में सिर रखकर निश्चिन्त हुआ जा सकता है, उनका हाथ कांधे पर हो तो साहस अनुभव किया जा सकता है और संगीत के सुरों के साथ साड़ियों के रंगों पर भी घण्टों बात की जा सकती है. इसी की ताकीद उनकी प्रिय शिष्या सुनंदा शर्मा करती है. वे बताती है कि वह ममता से भरी थी, गुरु से कब माँ बन गयी ,पता ही नहीं चला. 

इन पंक्तियों के लेखक को अप्पा के इस रुप को देखने को सौभाग्य मिला है. दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित ठुमरी महोत्सव में भाग लेने आयी अप्पा सुनंदा शर्मा के नोएडा स्थित घर पर रुकी थीं. 1 सितम्बर 2017 को सुनंदा ने अपने घर मालिनी अवस्थी सहित मुझे भी भोजन के लिए आमंत्रित किया था. सुनंदा के ड्राइंगरुम में अप्पा से गपशप के बीच सुनंदा की छोटी बहन ने सूचना दी कि भोजन तैयार है, बस फुल्के सेकने बाकी है. तभी अप्पा जी उठीं और किचन में जाकर खुद दो फुल्के बनाकर सुनंदा के पति जयशंकर की थाली में स्वयं परोसते हुए कहीं कि हमारे धर्म शास्त्रों में कहा गया कि दामाद को अपने हाथ से बनाकर खिलाना सास का धर्म है. 

अप्पा की अन्तिम-यात्रा में बनारस मानों श्रद्धा में डूब गया था. नाटीइमली स्थित उनके घर से उनकी शवयात्रा प्रारम्भ होने पर अपनी सुधबुध खोयी उनकी शिष्यायें भी अंततोगत्वा उन्हें अहसास कराने में पीछे नहीं रहीं कि वे उन्हीं की बेटियां है. मालिनी अवस्थी, सुनन्दा शर्मा और रीता देव रोये जा रहीं थीं और कोरस में साथ-साथ भैरवी में अपनी गुरु को अंतिम प्रणाम गाकर कर रहीं थीं ..... 'बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए.'

 


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