बंगाल की पटचित्र कला

कला , , चयन करें , 01-08-2017


Bangal ki patchitra kala

प्रकाश पाण्डेय

पश्चिम बंगाल के पटचित्र यहां की लोक कला व संस्कृति का प्रतीक हैं. कपड़े पर रंगों से खींची जाने वाली सांस्कृतिक व दैविक आकृतियों को पटचित्र  कहा जाता है और चित्रकार को पटुअस. आमतौर पर पटुअस प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करते हैं जो पेड़, पत्तों, फूलों और मिट्टी से बनते हैं. तूलिका गिलहरी या नेवले की पूंछ के बालों से बनती है. चित्रों की बाहर की रेखाएं काले और लाल रंग से बनाई जाती हैं. फिर इनमें प्राकृतिक रंग भरे जाते हैं. पटचित्रों में धर्म और रोजाना की जिंदगी से जुड़े किस्से होते हैं. 

पटचित्र कलाकार चित्रकारी के अलावा पाटेर गीत भी गाते हैं जो यहां की अपनी अनूठी परम्परा है. चित्रकारी के दौरान कलाकारों की जुबान पर लोक गीत हुआ करते हैं जिनमें सामाजिक संदेश और समकालीन घटनाओं का जिक्र रहता है. इस परम्परा को पाटमाया कहा जाता है. 

पटशिल्प के जानकार बताते हैं कि सबसे पहले संथाल आदिवासियों ने इसकी शुरुआत की. यह संथाल, होस, मुंडा, जुआंग्स और खेरिया जनजातियों काफी लोकप्रिय था. किंवदंतियों के अनुसार इनके पूर्वज माने जाने वाले पिल्छू हराम और पिल्छू बुरही के सात बेटे और सात बेटियां थीं जिन्होंने आपस में ही शादी कर ली. उस दौरान बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव से ज्यादातर पटुअस ने बौद्ध धर्म भी अपनाया था.

 पश्चिमी मेदिनीपुर जिले का नया गांव पटचित्रकारी के लिए विश्‍व स्तर पर विख्यात है. यहां लोक कला संसाधन केंद्र भी है जिसे चित्रातरू के नाम से जाना जाता है और यहां उन चित्रों व उत्पादों को प्रदर्शन के लिए रखा जाता है जिसे स्थानीय कलाकार बनाते हैं. दरअसल पटचित्र कला यहां के लोगों के लिए आजीविका का जरिया है. हालांकि परंपरागत रूप से पटचित्र का प्रदर्शन पुरुष कलाकार और उनके परिवार के बच्चे ही करते थे और महिलाएं केवल उनके यात्रा की व्यवस्थाओं में लगी होती थी. लेकिन आज महिलाएं भी चित्रकारी कर रही है. 

कोलकाता के साल्ट लेक स्थित पूर्व क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र के परिसर में 8 से 11 जुलाई तक आयोजित हस्तकला प्रदर्शनी के दौरान पटचित्र बनाने वाले तपन चित्रकार से मुलाकात हुई जो पश्‍चिमी मेदिनीपुर के नया गांव पिंगला के रहने वाले हैं. अपने सरनेम चित्रकार के बारे में उनका कहना था कि चित्रकारी हमारा पेशा है और उनके पूर्वज भी इसी सरनेम को लगाते रहे हैं. इसके पीछे वजह यह रही है कि इससे ऊंच-नीच की भावना खत्म होती है. तपन के परिवार में सात लोग हैं और सभी इस काम में लगे हुए हैं. कमाई निर्धारित न होने की वजह से समस्या भी होती है. उनके गांव के ज्यादातर लोग इसी काम में लगे हैं. गांव के विकास के लिए संस्कृति विभाग काम कर रहा है. तपन ने यह भी कहा कि उनसे उन्हें हर माह एक हजार रुपए भी मिलता है. कई बार सांस्कृतिक कार्यक्रमों में पटचित्र के साथ गायन के लिए भी उन्हें पैसे मिलते हैं. तपन ने कहा कि पटगायन परम्परा उन्हें उनके पूर्वजों से हासिल हुई है और जिसमें वे रामायण, महाभारत की कथा को गीत के रूप में लोगों के सामने रखते हैं. गांव में 50 से ज्यादा मुस्लिम परिवार हैं जो रंगों और कपड़ों का व्यवसाय भी करते हैं. 

मौइना चित्रकार पूर्व मेदिनीपुर के चंडीपुर स्थित हीबी चौक गांव की रहनी वाली हैं. उनके गांव में करीब 150 परिवार पटचित्रकारी में लगे हैं. आर्थिक पक्ष को लेकर सवाल पूछे जाने पर मौइना ने कहा कि लाभ की दृष्टि से वे यह काम नहीं करती हैं, बल्कि इस काम में उनका मन रमता है. यह कला उन्हें विरासत में मिली और वे इसे आगे बढ़ाने में लगी हुई हैं. मौइना ने ओडिशा के पटचित्रकारी और पातचित्रकारी के बारे में भी बताया. ओडिशा के पुरी स्थित रघुराजपुर नामक कस्बे में आज भी उनके नाते-रिश्तेदार है जो इस काम में लगे हुए हैं. वहां करीब 150-200 परिवार इसी काम को करते हैं. रघुराजपुर में पातचित्र की परम्परा रही है जिसमें चित्रकारी के लिए पत्तों का इस्तेमाल किया जाता रहा है. शुरुआत में पटचित्र ताड़ के पत्तों पर बनाए जाते थे. हालांकि बाद में कपड़े पर बनाए जाने लगे और अब तो हस्तनिर्मित कागज पर भी बनाए जा रहे हैं. 


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Vandana yadav :: - 01-29-2018